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रज़िया सुल्तान

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रज़िया सुल्तान

शम्सुद्दीन इलतुतमिश सुल्तान क़ुतुबउद्दीन ऐबक का तुर्क ग़ुलाम था जो अपनी क़ाबिलियत और सलाहियतों की बदौलत बिहार का सूबेदार और ऐबक का दामाद बन गया और बाद में 1211 ई में बादशाह बन गया। उस वक़्त रज़िया 6 वर्ष की थी। इलतुतमिश ने रज़िया के बचपन में ही समझ लिया था कि केवल वह ही उसके बाद गद्दी संभाल सकती है। इसीलिए ख़ास नहज और ख़ुतूत पर रज़िया की परवरिश की गयी, जिसमें तलवारबाज़ी, घुड़सवारी के साथ – साथ अच्छी तालीम का इंतज़ाम भी कराया गया।
इलतुतमिश ने जब रज़िया को अपना जानशीन घोषित किया तो तुर्कान ए चहलगानी, ख़ानदान समेत अक्सर अफ़राद को यह अमल पसंद नहीं आया। यही वजह है कि इलतुतमिश की मृत्यु के बाद उसके बेटे रुकनुद्दीन ने तख़्त पर क़ब्ज़ा कर लिया। लेकिन सात माह बाद 1236 ई में दिल्ली की जनता की मदद से रज़िया ने तख़्त पर क़ब्ज़ा हासिल कर लिया।
तख़्तनशीन होने के कुछ अरसा बाद रज़िया को कुलीन तबक़े की शदीद मुख़ालिफ़त का सामना करना पड़ा, इसकी सिर्फ़ एक वजह थी कि एक महिला का शासक होना किसी के गले नहीं उतर रहा था। इस बात से वाक़िफ़ होते हुए कि दिल्ली की जनता रज़िया की जांनिसार है, उसके विरोधियों ने दीगर इलाक़ों में साज़िशों के ज़रिए बग़ावतें फैलायीं। और, सल्तनत के अहम कुलीन लोगों ने भटिंडा के सूबेदार मलिक अंतुलिया की क़यादत में रज़िया के ख़िलाफ़ बग़ावत का एलान कर दिया। रज़िया सुल्तान उनकी बग़ावत को कुचलने के लिए दिल्ली से फ़ौज लेकर निकली लेकिन उसकी फ़ौज ने बाग़ियों का साथ दिया। रज़िया का वफ़ादार जनरल अमीर जमालुद्दीन याक़ूत मारा गया और रज़िया को गिरफ़्तार कर लिया गया। बाग़ियों ने उसके भाई मुईज़द्दीन बहराम शाह को गद्दी पर बिठा दिया।
हालात कुछ ऐसे बने कि रज़िया ने मलिक अंतुलिया से विवाह कर लिया और दिल्ली का तख़्त फिर से हासिल करने की कोशिश की लेकिन शिकस्त से दो चार होना पड़ा। रज़िया और मलिक अंतुलिया करनाल की तरफ़ चले गए जहां डाकुओं के हाथों दोनों मारे गए। सुल्तान बहराम शाह के सिपाही, जो उनकी तलाश में थे, को 14 अक्तूबर 1240 को दोनों के शव एक पेड़ के नीचे मिले जिन्हें वह दिल्ली ले आए।
यहाँ यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि रज़िया ख़ुद को रज़िया सुल्तान कहती थी और अपने लिये सुल्ताना का लक़ब पसंद नहीं करती थी क्योंकि इसका अर्थ है सुल्तान की पत्नी। सही मायेनों में रज़िया के साथ हिंदुस्तान में पोलिटिकल विमेन एम्पावरमेंट की पहली तहरीक इख़्तिताम पर पहुँची।
सर सैयद अहमद ख़ान की किताब आसार उल सनादीद: इमारत ए दिल्ली की मुसतनद तारीख़ के मुताबिक़ दिल्ली के तुर्कमान दरवाज़े के अंदर मुहल्ला बुलबुली ख़ाना में दो क़ब्रें हैं, इनको रजी सजी की दरगाह कहा जाता है। यह क़ब्रें रज़िया और उसकी बहन शाज़िया की है, जिन पर कोई तख़्ती नहीं है। हर जुमेरात को हर धर्म के लोग यहाँ आते हैं, क़ब्रों पर रौशनी करते हैं और मन्नतें माँगते हैं।
-असग़र मेहदी

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