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सावित्रीबाई फुले के साथ फातिमा शेख का योगदान

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आज देश सावित्रीबाई फुले जयंती मना रहा है , सोशल मीडिया में उन पर लेख लिखे जा रहे हैं और होना भी चाहिए महिला शिक्षा में उनका योगदान इस लायक़ है कि उन्हें याद रखा जाए हम दिल से उनका सम्मान करते हैं

सावित्रीबाई फुले के साथ उनके कंधा से कंधा मिलाकर चलने वाली फातिमा शेख थीं फातिमा शेख का योगदान इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि जब फुले दंपति के साथ कोई नहीं था पिता तक ने समाज के दबाव में घर से निष्कासित कर दिया था उस समय फातिमा शेख के भाई उस्मान शेख ने हर दबाव को नकारते हुए उन्हें अपना मकान स्कूल चलाने के लिए दिया था

दलित लेखकों ने फातिमा शेख की पहचान दुनिया के सामने कराई है वरना हम उन्हें नहीं जानते थे पर यह भी सच है कि जो उनका योगदान है उस से उन्हें घटा दिया जाता है उन्हें उनका वाजिबी हक़ नहीं मिल पाता है

उल्टा तमाशा यह कि मुसलमानों पर ही आरोप लगा दिया जाता है कि मुसलमान फातिमा शेख के बारे में बात नहीं करते इस लिए उन्हें उनका हक़ नहीं मिल पाता है सी मंडल साहब इस पर लिखते रहते हैं

ऐसा कहने वालों की बात में एक मक्कारी छुपी हुई है लेकिन फिर भी मैं उनकी इस बात से सहमत हूं यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने महान लोगों को याद रखें उन के संबंध में देश व दुनिया को बताएं

हालांकि कुछ मुसलमान जवाब देते हैं कि फातिमा शेख का काम मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि दलितों व हिंदू शोषित वर्ग के लिए था इस लिए उनकी जिम्मेदारी है कि वह जिस प्रकार सावित्रीबाई फुले को याद करते हैं फातिमा शेख को भी याद रखें ऐसी एक पोस्ट मैं ने देखी है बात उनकी सही है फिर भी उन से मैं सहमत नहीं हूं

क्योंकि हम वह लोग हैं जो दूसरों को सहारा देते है सहारा लेते नहीं हैं हम ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक को ख़िलाफत आंदोलन के प्लेटफार्म से भारत के घर-घर पहुंचाया था जब लोग बाबा साहेब आंबेडकर जी के लिए संविधान सभा की खिड़कियां बंद करने का ऐलान कर रहे थे उस समय हम उन्हें संविधान सभा पहुंचाने के लिए प्रयास कर रहे थे

तो फिर हम फातिमा शेख के लिए किसी का सहारा क्यों लें जो साथ दे उसका भी भला और जो साथ न दे उसका भी भला

जिन का विचार है कि यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है उन से हमारा सवाल इतना है कि हम ने अपनी जिम्मेदारी कितनी पूरी की

मेरी मालूमात की हद तक भारत में किसी भी युनिवर्सिटी की पहली महिला चांसलर नवाब सुल्तान जहां बेगम थीं और वह भी एक से बढ़कर एक काबिल लोगों के बीच चुनी गई थीं हम में से कितने लोग उन्हें याद करते हैं

नवाब सुल्तान जहां बेगम की मां नवाब शाहजहां बेगम जो खुद भी एक अच्छी कवित्री थीं शिक्षा के लिए उनके काम सिर्फ रियासत भोपाल में ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान में ही नहीं इंग्लैंड व अरब तक फैले हुए थे जिनके रिश्ते के लिए एक से बढ़कर एक नवाबों जमींदारों के रिश्ते आए थे लेकिन उन्होंने एक लेखक को पसंद किया था हम में से कितने लोग उन्हें जानते हैं और जो जानते हैं वह कितना याद करते हैं

रुकैया सखावत हुसैन वह नाम है कि उनके सामने महिला शिक्षा के लिए किसी का भी काम छोटा है उन्हें हम कितना याद करते हैं

आखिर हमें अपने लोगों को याद करने के लिए किसी के सहारे की जरूरत क्यों है ?

Khursheeid Ahmad

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