शब-ए-बारात
आज शब ए बारात है। यह त्योहार ईरानी तहज़ीब के एक मुसबत पहलू को उजागर करता है। शायद कुछ लोगों को बुरा लगे, लेकिन इस्लाम का अपना कोई कल्चर नहीं है, अलबत्ता इसके मानने वालों पर अरब कल्चर का ज़्यादा और नुमायाँ असर दिखायी देता है। यह भी एक सकारात्मक तथ्य है कि इसके साथ मुसलमानों ने उन मक़ामी रस्मों को नहीं छोड़ा जो सीधे तौर पर इस्लाम के मूल भूत सिद्धांतों से नहीं टकराती थीं।
सस्सानी (Sassanid) दौर में ईरान में अनेक त्योहार थे जिसमें नौरोज़ और जश्न ए मेहेर को ज़्यादा अहमियत हासिल थी। जश्न ए मेहर के दौरान तीन दिन तक आपस में तोहफ़ों के लेने-देन और रौशनी का इंतज़ाम किया जाता था। इस्लाम फैलने के बाद इन त्योहारों के मनाये जाने का तरीक़ा और शक्ल ओ सूरत बदल गयी। चूँकि, यह त्योहार सीधे तौर पर अरब की परम्पराओं के ख़िलाफ़ नहीं था, इसलिए इसकी ज़्यादा मुख़ालिफ़त भी नहीं की गयी, और वक़्त के साथ अवाम में क़ुबूलयत पाता गया।
“बरात” फ़ारसी शब्द है जो अरबी शब्द “बारा’त” से अलग है। ख़ुरासान के लोग बरात को चेराग़ (प्रकाश) बरात कहते थे, जिसका अर्थ है रौशनी का त्योहार। इस्लाम के आने के बाद ईरान और सेंट्रल एशिया में शब ए बरात के दिन लोग अपने बुजुर्गों की क़ब्रों और मज़ारों पर जाते और उनके लिये दुआ करते, रौशनी करते। अल-बिरूनी ने भी इसी तरह से इसका ज़िक्र किया है।
बाद में इस त्योहार को शब ए बाराअत के नाम से भी जाना जाने लगा और इसे क़ुरान के 44 वें सूरे की आयत नम्बर 3 में वर्णित “मुबारक” रात से ताबीर किया जाने लगा। लेकिन, इस व्याख्या को लेकर उलेमा में मतभेद है। सलफ़ी स्कूल आफ़ थाट (इब्ने कसीर) इसे “क़दर की रात” के रूप में पेश करता है और आज के आयोजन की अनेक वजूहात की बिना पर मुख़ालिफ़त करता रहा है। दूसरी तरफ़ उलेमा का एक तबक़ा है जो क़ुरान और हदीस की रौशनी में इस त्योहार की ताईद करता है। इस रात को क्षमा की रात या प्रायश्चित के दिन के रूप में भी जाना जाता है। मुसलमान मध्य-शाबान को इबादत और माफ़ी की रात के रूप में देखते हैं। इमाम शफ़ी, इमाम नवावी, इमाम ग़ज़ाली, और इमाम सुयुति जैसे विद्वानों ने इस रात की विशेष नमाज़ को स्वीकार्य घोषित किया है। अपने मजमू में, इमाम नवावी ने इमाम अल-शफ़ी की किताब अल-उम्म को उद्धृत किया कि दुआ के क़ुबूल होने की पांच रातें होती हैं, उनमें से एक शाबान की 15 वीं की रात भी है। अधिकांश क्षेत्रों में, यह एक ऐसी रात होती है जब किसी के मृत पूर्वजों का याद किया जाता है।
आज यह त्योहार भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, लेबनान, ईरान, अजरबैजान, तुर्की, अफगानिस्तान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और किर्गिस्तान सहित अनेक देशों में मनाया जाता है। इराक में, बच्चों को उनके पड़ोस में घूमते हुए कैंडी दी जाती है। इराक़ी कुर्दिस्तान और अफगानिस्तान में मुसलमान रमज़ान से 15 दिन पहले इस छुट्टी को मनाते हैं। इंडोनेशिया में सलफ़ी रुझान के बाद इसका असर कम है, लेकिन आचे, पश्चिम सुमात्रा और दक्षिण कालीमंतन में इसका व्यापक रूप से मनाया जाता है, मस्जिदों में “ज़िक्र” किया जाता है। उसके बाद एक आलिम के नेतृत्व में एक व्याख्यान (सेरामा) होता है। जावा और मदुरा में क्याई के रूप में जाना जाता है। दक्षिण एशिया में, मुसलमान 15 शाबान से पहले शाम को पड़ोसियों और गरीबों को दी जाने वाली मिठाई (विशेषकर हलवा या ज़र्दा) बनाते हैं। हलवा बांटने का यह रिवाज बोस्निया में शब ए बारात के साथ-साथ तीन अन्य मौक़ों पर भी प्रचलित है: लैलत अल-क़द्र, लैलत अल-मिराज और लैलत अल-रग़ैब।
शिया मत में इस त्योहार से एक और विशेषता जुड़ी है, वह है उनके बारहवें इमाम मेहदी (अ) की पैदाइश।
कल्चर का एक काम यह है कि यह काफ़ी हद तक धार्मिक कट्टरता को क़ाबू में रखता है, क़ौमों के मिज़ाज में नरमी पैदा करता है।इसलिए कल्चरल गतिविधियों को सजो कर रखने और सही दिशा देने की ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी। लेकिन इस आधार पर राष्ट्रवाद की अवधारणा का विकास करना हमेशा रीऐक्शनेरी साबित हुआ है,और फ़ासीवाद इसे एक मोहलिक हथियार के रूप में भी बख़ूबी इस्तेमाल करता है। ज़रूरत इस बात की भी है कि कल्चरल डिवर्सिटी को फल -फूलने का मौक़ा दिया जाए।
-असग़र मेहदी





