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मौलाना हसरत मोहानी अपने कलम से अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए

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मौलाना हसरत मोहानी …
एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी, जिसके क़लम की धार ने अंग्रेजों की तोप और तलवार को कुंद कर दिया …
इनका दिया नारा “इंक़लाब, जिंदाबाद” जो हर स्वतंत्रता सेनानी के दिलों से मौत का खौफ मिटा देता था, और फिर वीर बलिदानी हंसते हुए फांसी की रस्सी अपने गले में डाल लेते थे, और बेखौफ निहथे अंग्रेजों की क्लाशनकोफ के सामने डट जाते थे । आज भी हर देशप्रेमी क्रांतिकारियों के लिए यह सब से लोकप्रिय और प्रेरणादायक नारा है ।

मौलाना हसरत मोहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 , UP के उन्नाव में हुआ था । वह बेहतरीन शायर, पत्रकार, लीडर, समाजसेवक और स्वतंत्रता के निडर और बेबाक सिपाही थे । वह अपनी पत्रिका में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुल कर लिखते औऱ जवानों को आज़ादी की ललक दिलाते थे । तब ही उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को यह गोल्डन वर्ड “इंक़लाब जिंदाबाद, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद” का नारा दिया था ।
बिटिश हुकूमत इनकी लेखनी से डर कर 3 वर्षों तक जेल में कैद रखा, लेकिन इन्हें झुका न सकी ।
हसरत मोहानी साहब भी मौलाना अबुलकलाम आज़ाद की तरह बंटवारे के खिलाफ थे । इन दोनों के आव्हान पर ही देश के मुसलमानों ने सेकुलर भारत को चुना और बंटवारे के खिलाफ भारत को पसंद किया ।
मौलाना हसरत मोहानी का संपर्क भिन्न समय में देश की भिन्न राजनीतिक विचारधारा से रहा , वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की कम्युनिस्ट विचारधारा के संग भी रहे, मुस्लिम लीग का नेतृत्व भी किया, और बाद में कॉंग्रेस के साथ भी रहे ।
आज़ादी के बाद देश का संगीय ढांचा कैसा हो , इसका पूरा ब्लूप्रिंट था मौलाना के पास , जिसे धूर्त लोगों ने नहीं माना, वह खिलाफत आंदोलन के नायक भी थे, जिसे बाद में हाइजेक कर लिया गया …
संविधान गठन में मौलाना भी शामिल थे, लेकिन वह संविधान में मुस्लिमों की अनदेखी से संतुष्ट न थे, इस लिए अंत तक अपना दस्तखत नहीं किया ।
1951 में लखनऊ में मौलाना का इंतकाल हुआ …
जिसने अपनी जिंदगी ब्रिटिश से आज़ादी हासिल करने में लगा दी, आज न उनके वारिसों का पता है न ही इतिहास में वह जगह मिली ।
मुम्बई में उनके नाम की एक सड़क, दिल्ली में भी कुछ है कहीं पर, और 2014 में एक डाक टिकट , यही उनके बलिदान और संघर्ष का इनाम है ।
अब यह देश का दुर्भाग्य ही है जो बड़े नाम माफी वीरों का

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