आज ऐसे अजीम शख्स की यौमे पैदाइश है जिसने मुश्किल घड़ी में #भगत_सिंह के परिवार के सदस्यों को पनाह दी थी। जब हर कोई अंग्रेजी सरकार के जुल्म से खौफ खा रहा था।
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हम बात कर रहे हैं आजादी के नायक मौलाना_हबीब_उर_रहमान_लुधियानवी की। जिनका जन्म 3 जुलाई 1892 में पंजाब के लुधियाना में हुआ। इनके बाप दादा ने भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
हबीब उर रहमान ने भी खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। जेल भी गए। उन्होंने अपनी जिंदगी के अनमोल 14 साल कैद में बिताए।
उनकी पत्नी बीबी शफ़तुनिसा, जो खुद एक स्वतंत्रता सेनानी थीं। 1929 में मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद की सलाह पर मजलिस-ए-अहरार (द सोसायटी ऑफ़ फ़्रीमेन) की स्थापना की।
फिर 1929 में जब भगत सिंह ने केंद्रीय सभा में बम फेंके, उसके बाद से कोई भी उनके परिवार के सदस्यों को शरण देने के लिए आगे नहीं आ रहा था। क्योंकि लोगों को ब्रिटिश दमन का खौफ था।
ऐसे समय में मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी ने साहस और इंसानियत का परिचय दिया। उन्होंने भगत सिंह के परिवार के सदस्यों को एक महीने तक अपने घर में जगह दी। साथ ही उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्रा बोस की भी अपने घर पर मेहमान नवाज़ी की थी।
उसी साल 1929 में जब ब्रिटिश अधिकारियों ने लुधियाना के घास मंडी चौक पर हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग पानी के बर्तन का इस्तेमाल किया। तब मौलाना ने इसका विरोध किया। उन्होंने अंग्रेजों की इस चाल को नाकामयाब बना दिया। उन्होंने एक पर्चा लगवाया ‘सबका पानी एक है’ जिसके लिए उन्हें जेल भेजा गया।
आगे 1931 में शाही जामा मस्जिद के पास लगभग 300 ब्रिटिश अधिकारियों और पुलिस की मौजूदगी में भारतीय ध्वज को फहराया, जिसके लिए उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया।
वे आख़िर तक पाकिस्तान बनने का विरोध करते रहे। लेकिन जब 1947 में विभाजन हुआ। तब उन्होंने माहौल को देखते हुए लुधियाना छोड़ दिल्ली में शरणार्थी शिविरों में शरण ली। उन्हें पाकिस्तान जाने की सलाह दी गई, लेकिन उन्होंने भारत में रहने का फैसला लिया।
आज़ादी बाद मुस्लिम दुनिया से भारत के अच्छे तालुक़ात के लिए मौलाना लुधियानवी ने बहुत योगदान दिया।
2 सितम्बर 1956 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया और जामा मस्जिद के पास के कब्रिस्तान में सुपुर्दे खाक हो गए।





