मुंशी प्रेमचन्द मानवीय संवेदनाओं और साम्प्रदायिकता के पाप को उजागर करने वाले अनोखे साहित्यकार थे। जिनका हीरो हमेशा दलित पीड़ित और शोषित रहे हैं।
प्रेमचन्द जी के जन्म दिवस पर लखीमपुर खीरी में आयोजित विचार गोष्ठी के संयोजक श्री शशांक यादव पूर्व एमएलसी ने उक्त विचार व्यक्त किये। साहित्यकार सुरेश सौरभ ने कहा कि राजनेताओं को मानव संवेदना समझाने के लिए प्रेमचन्द जी का साहित्य समाज को आईना दिखा सकता है। ‘‘निर्मला, गोदान और ईदगाह, सोजेवतन‘‘ आदि साहित्यिक पुस्तकों ने मानव जीवन की गुत्थियों को शानदार तरीके से समझाया है।
साहित्यकार श्याम बेचैन ने अपने गीतों के माध्यम से समां बांधा ‘‘ कल तक जो कांच था वो कोहिनूर हो गया, वो देखते ही देखते मशहूर हो गया।‘‘ इंसानियत का देवता उसको कहा गया, जो इंसानियत से कोसों दूर हो गया।
शिक्षक सत्य प्रकाश ने नई पीढ़ी के लिए प्रेमचन्द के साहित्य को आज की राजनीति की आवश्यकता बताया।
इस अवसर पर समाजवादी पार्टी के नेता आरपी चौधरी, शेखू मिर्जा, अजय सिंह, हेमन्त भार्गव, इसरार अहमद, अमित वर्मा, अशोक वर्मा, सुभाष कश्यप, कौशल वर्मा, मनोज विश्वकर्मा, कल्लू खां सहित तमाम कार्यकर्ताओं ने गोष्ठी में भाग लिया।
समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष श्री रामपाल यादव ने मुंशी प्रेमचन्द जी के साहित्य को पढ़ने के लिए प्रेरित किया ताकि शोषण और साम्प्रदायिकता के खिलाफ समाजवादी संघर्ष जारी रहे। गोष्ठी में सर्वसम्मति से मुंशी प्रेमचन्द के जन्म दिवस को राष्ट्रीय ग्राम दिवस घोषित करने की सरकार से मांग की गई।
(राजेन्द्र चौधरी)
मुख्य प्रवक्ता
प्रेमचन्द जी का साहित्य समाज को आईना दिखा सकता है।




