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ईद ए ज़हरा की मुबारकबाद :लेख असग़र मेहंदी

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ईद ए ज़हरा की मुबारकबाद

“मरियम अज़ यक निस्बत ए ईसा अज़ीज़
अज़ सा निस्बत ए हज़रत ए ज़हरा अज़ीज़ “
—इक़बाल
9 रबी उलअव्वल को बतौर ए ईद ए ज़हरा मनाया जाता है। इस ईद के मनाने की मुख़्तलिफ़ वजहें बयान की जाती हैं। सबसे मशहूर यह रहा है कि यह दिन मरग ए ख़लीफ़ा सानी हज़रत उमर (र) है, लिहाज़ा यह ख़ुशी का दिन है और इसे हज़रत फ़ातिमा (स) से मनसूब कर दिया गया। यह भी सही है कि हमारे जैय्यद उलेमा शेख़ सूदूक़, इब्ने ताऊस ने 9 रबी उलअव्वल को मरग ए ख़लीफ़ा ए सानी की रवायत को अपनी कुतुब में जगह दी है, लेकिन यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम तहक़ीक़ करें कि हक़ीक़त क्या है? इन तमाम इश्तिहाबात पर अल्लामा मजलिसी की तहक़ीक़ की तरफ़ रुजु कर सकते हैं। तारीख़ी तौर पर यह मूसल्लम है कि ख़लीफ़ा सानी हज़रत उमर (र) 26/27 ज़िलहज को क़त्ल हुए। वैसे भी उनके ज़माने में फ़ातिमा ज़हरा (स) हयात नहीं थीं, लिहाज़ा ईद ए ज़हरा मनाए जाने की यह वजह नहीं मानी जा सकती।
इसके साथ एक और भी वजह बयान की जाती है कि इन अय्याम में हज़रत मुख़्तार (रअ) ने उमर इब्ने साद को क़त्ल किया था और यह वाक़िया अहले बैत में ख़ुशी का पैग़ाम लेकर आया था। लेकिन अगर ऐसा है तो उसे ईद ए ज़ैनब या ईद ए सज्जाद (अ) के तौर पर मनाया जाना चाहिए।
बाअज़ उल्मा की तहक़ीक़ के मुताबिक़ 9 रबी उलअव्वल को जनाब रसूल-ए-ख़ूदा की शादी जनाब ए ख़दीजा (र) से हुई थी और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) हर साल इस शादी की सालगिराह मनाती थीं और जश्न क्या करती थीं ,नए लिबास और अन्वा-ओ-इक़साम के खाने मुहय्या करती थीं ,लिहाज़ा आपकी सीरत पर अमल करते हुए शीया ख़वातीन ने भी ये सालगिराह मनानी शुरू की और ये सिलसिला इसी तरह चलता रहा। आप (स) के बाद ये ख़ुशी आप (स) से मंसूब हो गई और इस तरह 9 रबी उलअव्वल का रोज़ शीयों के दरमयान ईद ज़हरा के नाम से मौसूम हो गया। लिहाज़ा ईद ज़हरा की ये वजह मुनासिब मालूम होती है। चुनांचे एक शख़्स ने मुहम्मद हुसैन आल ए काशिफ़ अलग़ीता से सवाल किया कि
”मशहूर है कि रबी उलअव्वल की नौवीं तारीख़ जनाब फ़ातिमा-ज़ेहरा (स) की ख़ुशी का दिन था और है और ये इस हाल में है कि उमर के 26 ज़ी अलहजा को ज़ख़म लगा और 29 ज़ी अलहजा को फ़ौत हुआ लिहाज़ा ये तारीख़ हज़रत फ़ातिमा-ज़ेहरा (स) की वफ़ात से बाद की तारीख़ है तो फिर हज़रत फ़ातिमा
ज़हरा (स) (अपने दुश्मन के फ़ौत होने पर) किस तरह ख़ुश हुईं?
मुहम्मद हुसैन आल ए काशिफ़ अलग़ीता ने इसका तफ़सीली जवाब दिया , जिसे इख़्तिसार से यहाँ पेश कर रहे हैं। आप लिखते हैं-
”शीया पुराने ज़माने से रबी उलअव्वल की नौवीं तारीख़ को ईद की तरह ख़ुशी मनाते हैं, किताब ए इक़बाल में सय्यद इबन ताऊस ने फ़रमाया है कि 9 रबी उलअव्वल की ख़ुशी इस लिए है कि इस तारीख़ में उमर फ़ौत हुये हैं और ये बात एक ज़ईफ़ रिवायत से ली गई है जिसको शेख़ सदूक ने नक़ल किया है, लेकिन हक़ीक़त अमर ये है कि 9 रबी उलअव्वल को शीयों की ख़ुशी शायद इस वजह से है कि 8 रबी उलअव्वल को इमाम हसन अस्करी (अ) शहीद हुए और 9 रबी उलअव्वल इअमाम ज़माना (अ) की इमामत का पहला रोज़ है।
इस ख़ुशी का दूसरा एहतिमाल ये है कि 9 और 10 रबी उलअव्वल पैग़ंबर इस्लाम की जनाब ख़दीजा से शादी का रोज़ है और हज़रत फ़ातिमा-ज़ेहरा (स) हर साल इस रोज़ ख़ुशी मनाती थीं और शीया भी आपकी पैरवी करते हुए इन दिनों में ख़ुशी मनाने लगे ,मगर शीयों को इस ख़ुशी की यह इल्लत मालूम नहीं है।
( सवाल-ओ-जवाब ,सफ़ा 10-11, अज़ आल ए काशिफ़ अलग़ीता-،तर्जुमा ,मौलाना (डाक्टर)सय्यद हसन अख़तर साहिब नोगानवी,मिंजानिब उदार-ए-तब्लीग़-ओ-इशाअत नौ गा नवां सादात)
इस सिलसिला में बाअज़ हज़रात-ओ-ख़वातीन ग़लतबयानी करते हुए ये कहते हैं कि इस दिन जो चाहें गुनाह करें इस पर अज़ाब नहीं होता और फ़रिश्ते लिखते भी नहीं और ये लोग अल्लामा मजलिसी की किताब बिहार उल अनवार की उस तवील हदीस का हवाला देते हैं जिसको अल्लामा मजलिसी ने सय्यद बिन ताऊस की किताब ”ज़वाइद अलफ़वाइद” से नक़ल किया है। इस हदीस में लिखा है कि 9 रबी उलअव्वल को जो चाहें गुनाह करें उस को फ़रिश्ते नहीं लिखते और ना ही अज़ाब किया जाता है।
ज़ाहिर है कि यह हदीस क़ुरान से टकराती है कि जो साफ़ तौर पर कहता है कि “जिस शख़्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की वो उसे देख लेगा और जिस शख़्स ने ज़र्रा बराबर बदी की है तो वो उसे देख लेगा”
हमारे उलेमा ए कराम ने इस मौज़ू पर साफ़ स्टैंड लिया है और इस क़िस्म के अक़ीदे कि इस दिन के आमाल का हिसाब किताब नहीं होगा, की खुलकर मुख़ालिफ़त की है।
आयत-ए-अल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी साहिब ने इस पर एक सवाल का जवाब देते हुए लिखा कि
”ये बात (कि 9 रबी उलअव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते ) सही नहीं है और किसी भी फ़क़ीह ने ऐसा फ़तवा नहीं दिया है ,बल्कि उन अय्याम में तज़कि-ए-नफ़स और अहल-ए-बैत (अ) के अख़लाक़ से नज़दीक होने और फ़ासिक़-ओ-फ़ाजिरों के तौर तरीक़ों से दूर रहने की ज़्यादा कोशिश करनी चाहीए।”
-असग़र मेहदी
13 सितम्बर 2024

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