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इस रात की कोई सुबह नहीं।

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सुबह करो दोपहर करो शाम करो रात करो, पर इस रात की कोई सुबह नहीं दौरे हाजिर में यह बात शायद एकदम सही साबित हो रही है। 68 दिन के लाक डाउन के बाद अब ऐसा एहसास होने लगा है शायद अब इस रात की कोई सुबह नहीं और इस सरकार की कोई दवा नहीं।
पहले दूसरे तीसरे और फिर चौथे लाक डाउन में लगातार इंसान घरों में कैद है। दाएं देखो तो दीवार नजर आती बाय देखो तो दीवार नजर आती जब सर उठा कर देखो तो छत नजर आती आसमान बिल्कुल नजर नहीं आता रात के तारे नहीं दिखाई देते ऐसा लगता है कि वाकई इस रात की कोई सुबह नहीं।
जब प्रधान सेवक ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था तो जनता बहुत खुश थी के कानून भी हमारा है ऑर्डर भी हमारा है हमको अपने ऊपर लागू करना है लेकिन 25 मार्च को यह सारी चीजें खत्म हो गई ऐसा लगा कि हम अंधकार में चले गए। ऐसा लगता था कि हम अपने बचपन के दौर में पहुंच गए हैं जहां जब छोटे छोटे बच्चे स्टॉप स्टॉप (पॉज) का खेल खेलते थे तो जब एक बच्चा दूसरे को स्टॉप बोलता था तो जहां वह रहता था वही ठिठक कर रह जाता था तो जैसे ही हमारे प्रधान सेवक ने स्टॉप बोला देश की जनता जहां-जहां थी वह अटक कर रह गई। इंसान अपने घर में कैद हो गया दुकानों में ताले लग गए जो सामान जहां था वहीं रखा रह गया श्रमिक अपनी अपनी जगह पर घर से दूर कैद हो गए। लेकिन इस खेल में शैतानी यह हुई कि पाज़ करने के बाद काफी लंबा समय लिया गया और जैसे उसके बाद प्रधान सेवक ने कहा ओवर अब हिंदुस्तान में एक नया खेल शुरू हुआ जितने श्रमिक जो पाज़ या स्टॉप कहने पर रुके हुए थे वह अंधाधुन अपने घरों की तरफ भागने लगे नतीजा यह हुआ कि जो कोरोना संक्रमित एक जगह पर इकट्ठा थे वह पूरे हिंदुस्तान में फैल गये। वाकई इस रात की कोई सुबह नहीं।
हिंदुस्तान के सारे स्कूल बंद हो गए बच्चे घरों में कैद हो गए स्कूल की तरफ से ऑनलाइन क्लासेस का खेल शुरू हो गया इस ऑनलाइन क्लासेस के खेल के बहाने अभिभावकों से फीस की डिमांड होने लगी और तो और सोने पर सुहागा यह हुआ कि स्कूल बच्चों को पेरेंट्स को मैसेज करके कोरोनावायरस की मदद के लिए मास्क जैसी चीजें बनाने का प्रेशर डालने लगे इससे अभिभावक भी परेशान बच्चे भी परेशान जबकि यह बात सबको मालूम है कि मास्क बच्चे खुद नहीं बनाएंगे यह काम उनके माता-पिता ही करेंगे लेकिन स्कूल को इससे कोई लेना-देना नहीं उन्होंने आंख बंद करके आर्डर दे दिया वाकई इस बात की कोई सुबह नहीं।
अभिभावकों का सारा कारोबार बंद है जो सरकारी नौकरी पेशा है उनकी बात अलग है लेकिन जो प्राइवेट नौकरी पेशा है जो बिजनेसमैन है जो कामगार हैं जो श्रमिक हैं जो रोज कुआं खोदकर पानी पीते हैं ऐसे अभिभावकों को निर्देश दिया गया कि ऑनलाइन बच्चों की क्लासेस शुरू हो रही हैं उनके लिए किताबों का बंदोबस्त किया जाए अब सवाल फिर वही उठता है कि जब आमदनी नहीं तो मां बाप कहां से किताबों के लिए पैसे का इंतजाम करेंगे दूसरी तरफ इसके लिए अभिभावकों पर प्रेशर डाला गया लिस्ट भेजी गई कि फीस जमा कीजिए फिर वही एक सवाल उठता है कि जब आमदनी नहीं तो इतना बड़ा अमाउंट इतनी बड़ी रकम अभिभावक कहां से लाएंगे। स्कूलों का कहना यह है कि टीचर्स को तनख्वाह कहां से देंगे शिक्षकों को देने के लिए पैसा कहां से लाएंगे इसलिए अभिभावक फीस जमा करें सवाल यह उठता है कि सरकार जो इतने बड़े शिक्षा विभाग खोले हुए हैं शिक्षा अभियान चला रही है क्या सरकारी स्कूलों की मदद नहीं कर सकती कि वह शिक्षकों को तनख्वाह दें। एनजीओ ट्रस्ट संस्थाएं और सबसे बढ़कर डब्ल्यूएचओ इन सब के द्वारा जो सरकार को मदद की जा रही है जनता दान कर रही है प्राइम मिनिस्टर नेशनल रिलीफ फंड के अलावा जो कोविड केयर फंड में दान हो रहा है फिल्म जगत के तमाम सितारे दान कर रहे हैं उद्योगपति दान कर रहे हैं तो सवाल यह कि यह सब पैसा कहां जा रहा है क्यों नहीं इन पैसों में से एक हिस्सा शिक्षा के लिए सैंक्शन किया जाता है ताकि प्राइवेट स्कूल अपने शिक्षकों को तनख्वाह दे सकें। कुछ पता नहीं। हर तरफ अंधेरा है वाकई इस रात की सुबह नहीं।
करोड़ों लोग अपना रोजगार खो चुके हैं। भूखों मरने की नौबत आ चुकी है उनके पास रोजगार का कोई जरिया नहीं है लाखों श्रमिक अपने काम की जगह छोड़कर अपने घरों को जाने के लिए बेताब है और सरकार कांग्रेस के साथ बस-बस का खेल खेल रही है यह भी लॉक डॉन की एक बहुत ही चर्चित और अचंभित कहानी है कि एक पार्टी के द्वारा बसों का इंतजाम करने के बाद सरकार द्वारा उसको वापस कर दिया जाता है श्रमिक परेशान, लोग पैदल ही अपने घरों को चल दिए कई सौ किलोमीटर का फासला पैदल चलकर लोग तय करने के लिए तैयार। न जाने कितने लोगों ने अपनी जान दे दी मासूम बच्चे तड़प के मर गए लेकिन किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है वाकई इस रात की कोई सुबह नहीं।
अपनी वाहवाही लेने के लिए सरकार ने फ्री ट्रेनें चलाने की बात की तो श्रमिकों से किराया लेने की बात सामने आई यह भी एक अंधेर गर्दी है कि जो मजदूर सुबह से शाम काम करके चार पैसे कमाता है उससे किराया वसूला जा रहा है प्रधान सेवक का कथन एकदम सही साबित हुआ कि 60 साल में देश में क्या हुआ बिल्कुल सही बात 60 साल में जो नहीं हुआ वह इन 6 सालों में हो गया कि लोगों के रोजगार खत्म हो गए बेरोजगार हो गए सब घर में स्त्रियों ने जो पैसा जमा करके रखा था वह निकल गया और पैसा निकालने के लिए लंबी-लंबी लोगों ने लाइन लगाई पैसों का सिस्टम बदल दिया गया काला धन लाने के नाम पर कालेधन चोरों को हिंदुस्तान से बाहर ढकेल दिया गया जो वहां पर अपना जीवन यापन कर रहे हैं और सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता वाकई इस रात की सुबह नहीं।
60 सालों में जो कांग्रेस और दूसरी सरकार नहीं कर सकी वह प्रधान सेवक की सरकार ने कर दिया कि जो ट्रेन चलाई गई वह ट्रेनें भी रास्ता भूलने लगी जाना कहीं और पहुंच कहीं गई यह कारनामा भी बहुत ही लाजवाब कारनामा है क्या कहा जाए इस रात की कोई सुबह नहीं ।
एक ही बात समझ में आती है। प्रशासन भी लाचार वह भी मजबूर वह वही करता है जो सरकार आदेश करती उसको क्या कहा जाए इस वक्त बस एक ही चीज समझ में आती है भट्की सरकार भटका प्रशासन भटका मीडिया। इस त्रिकोण ने पूरे भारत को तोड़ कर के रख दिया।
इंसान का रहन-सहन खान-पान जीवन, दिनचर्या ,जरूरत ,शिक्षा सारी चीजें अंधकार में हैं वाकई इस रात की कोई सुबह नहीं।
जब हमारे देश में कोरोना के केसेस बहुत कम थे तब इसको रोकने के लिए लॉक डाउन लगाया गया जैसे जैसे लाक डाउन बढता रहा वैसे वैसे कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती रही और अब जब क्रोना संक्रमित लोगों की संख्या लगभग डेढ़ लाख के आसपास पहुंच चुकी है तो अब लॉक डाउन में ढील दी जा रही है लॉक डाउन हटाने की बात हो रही है यानी जो सरकार फ्रंटफुट पर खेलने उतरी थी वह अब बैकफुट पर आ गई यह भी कमाल की बात है कि दूसरे मुल्कों में जहां कोरोना को रोकने के लिए लाकडाउन लगाया गया और कोरोना में कमी आने के बाद लाकडाउन को हटाया गया वहीं हमारे देश में जैसे-जैसे क्रोना संक्रमितओं की संख्या बढ़ रही है हम लाक डाउन में ढील देख रहे हैं और अब इसे हटाने की बातें भी हो रही हैं। सरकार का क्या प्लान है यह देशवासियों को बिल्कुल नहीं पता जबकि देशवासियों को पता होना चाहिए कि सरकार आखिर इस देश और देशवासियों के लिए क्या सोच रही है सरकार के नुमाइंदों को सामने आकर सरकार के प्लान को बताना चाहिए ताकि जनता के अंदर भय का वातावरण ना पैदा हो और उन्हें भी इत्मीनान हो कि सरकार हमारे लिए आगे क्या करना चाह रही है लेकिन सरकार को इस से कोई मतलब नहीं है किसी भी चीज के बारे में जनता की परेशानी कष्ट नौकरी बेरोजगारी भूख किसी चीज के बारे में भी चर्चा करने का वक्त नहीं है बस वक्त मिलता है तो सिर्फ आदेश देने का वह भी ताली बजाओ थाली बजाओ दिया जलाओ लेकिन यह नहीं कोई बताता कि कैसे देश बचाओ वाकई इस रात की कोई सुबह नहीं।
जयहिंद।

सैय्यद एम अली तक़वी
निदेशक- यूरिट एजुकेशन इंस्टीट्यूट, लखनऊ
syedtaqvi12@gmail.com

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