भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी. आर. गवई, जो हाल ही में 14 मई 2025 को देश के 52वें मुख्य न्यायाधीश बने,
पहली बार अपने गृह राज्य महाराष्ट्र पहुंचे।
यह दौरा उनके लिए खास था,
क्योंकि वे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से आते हैं और देश के दूसरे दलित CJI हैं।
मुंबई में बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र और गोवा द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में उनकी अगवानी होनी थी।
हालांकि, प्रोटोकॉल के अनुसार,
महाराष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों—मुख्य सचिव सुजाता सौनिक, पुलिस महानिदेशक (DGP) रश्मि शुक्ला, और मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती—को CJI की अगवानी के लिए मौजूद रहना चाहिए था। लेकिन इनमें से कोई भी अधिकारी न तो हवाई अड्डे पर और न ही समारोह में उपस्थित थे।
इस प्रोटोकॉल उल्लंघन पर CJI गवई ने कड़ा रुख अपनाते हुए नाराजगी जाहिर की।
CJI का बयान:
बार काउंसिल के समारोह में बोलते हुए CJI गवई ने कहा, “जब महाराष्ट्र का व्यक्ति देश का मुख्य न्यायाधीश बनकर पहली बार अपने राज्य आता है, और मुख्य सचिव, DGP, या मुंबई पुलिस आयुक्त को मौजूद रहना उचित नहीं लगता, तो उन्हें इस पर आत्ममंथन करना चाहिए।” उन्होंने जोर देकर कहा कि यह प्रोटोकॉल का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों—न्यायपालिका, कार्यपालिका, और विधायिका—के बीच पारस्परिक सम्मान का सवाल है। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा, “अगर मेरी जगह कोई और होता, तो संविधान के अनुच्छेद 142 के प्रावधानों पर विचार किया जाता।” अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को पूर्ण न्याय के लिए कोई भी आदेश पारित करने की शक्ति देता है।
इस गैर-जिम्मेदारी का दोषी कौन?
प्रशासनिक चूक या जानबूझकर लापरवाही?: कुछ सूत्रों का दावा है कि यह गलतफहमी या शेड्यूलिंग टकराव के कारण हुआ हो सकता है, लेकिन राज्य प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
अधिकारियों की अनुपस्थिति: मुख्य सचिव, DGP, और मुंबई पुलिस आयुक्त की गैरमौजूदगी को गंभीर प्रोटोकॉल उल्लंघन माना जा रहा है। CJI के बयान के बाद ये तीनों अधिकारी तुरंत चैत्यभूमि पर CJI के दौरे के दौरान मौजूद थे, जहां उन्होंने डॉ. बी. आर. अंबेडकर को श्रद्धांजलि दी। इससे संकेत मिलता है कि अधिकारियों को अपनी गलती का अहसास हुआ।
जवाबदेही का अभाव: अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस चूक के लिए कौन सीधे तौर पर जिम्मेदार है। क्या यह प्रशासनिक स्तर पर समन्वय की कमी थी, या उच्च अधिकारियों की प्राथमिकता में कमी थी? इस सवाल का जवाब राज्य सरकार को देना होगा।
किसकी जवाबदेही?
महाराष्ट्र सरकार: प्रोटोकॉल सुनिश्चित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। मुख्यमंत्री और गृह मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि CJI का स्वागत उचित ढंग से हो।
शीर्ष अधिकारी: मुख्य सचिव, DGP, और मुंबई पुलिस आयुक्त व्यक्तिगत रूप से इस प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए जिम्मेदार थे। उनकी अनुपस्थिति ने न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया, बल्कि न्यायपालिका के प्रति सम्मान की कमी को भी दर्शाया।
प्रशासनिक तंत्र: यह घटना राज्य के प्रशासनिक तंत्र में समन्वय और जवाबदेही की कमी को दर्शाती है।
इस गैर-जिम्मेदारी का कारण:
संभावित गलतफहमी: कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि यह शेड्यूलिंग टकराव या गलतफहमी का नतीजा हो सकता है।
प्रशासनिक उदासीनता: कुछ एक्स पोस्ट में इसे अधिकारियों की उदासीनता और CJI के दलित समुदाय से होने के कारण जानबूझकर किया गया अपमान बताया गया है। हालांकि, ये दावे सत्यापित नहीं हैं और संवेदनशील प्रकृति के हैं।
जवाबदेही की कमी: महाराष्ट्र प्रशासन में उच्च स्तर पर प्रोटोकॉल पालन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देशों या जवाबदेही तंत्र की कमी इस घटना का कारण हो सकती है।
न्यूज और जनता की प्रतिक्रिया:
मीडिया कवरेज: अमर उजाला, न्यूज18, इंडिया टुडे, और द इंडियन एक्सप्रेस जैसे प्रमुख समाचार माध्यमों ने इस घटना को प्रमुखता से कवर किया, जिसमें CJI के बयान और प्रोटोकॉल उल्लंघन पर जोर दिया गया।
सोशल मीडिया: एक्स पर कई यूजर्स ने इस घटना को शर्मनाक बताया और इसे कार्यपालिका द्वारा न्यायपालिका के अपमान के रूप में देखा। कुछ पोस्ट में इसे CJI के दलित समुदाय से होने से जोड़ा गया, लेकिन ऐसी टिप्पणियों को सावधानी से देखने की जरूरत है, क्योंकि ये सत्यापित नहीं हैं।
निष्कर्ष:
यह घटना न केवल प्रोटोकॉल उल्लंघन का मामला है, बल्कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के बीच आपसी सम्मान और समन्वय की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। CJI गवई ने अपनी नाराजगी को संयमित और गरिमापूर्ण तरीके से व्यक्त किया, लेकिन यह महाराष्ट्र प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि ऐसी लापरवाही भविष्य में गंभीर परिणाम दे सकती है। यह सवाल उठता है कि जब देश के मुख्य न्यायाधीश के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम नागरिकों के साथ प्रशासन का रवैया कैसा होगा?




