ग़ालिब को याद करते हुए
ग़ालिब अपने ज़माने से काफ़ी आगे थे, उन्होंने ‘रुके’ हुए समाज को आगे बढ़ने की तलक़ीन की, जदीद तालीम की अहमियत को समझा और मशरिक़ और मग़रिब में तता’बक़ (समन्वय) की बात की। अवाम को सवाल करने की सिम्त मुताहरिक किया, क्या है, कैसे, क्यों है,, जैसे मौज़ू रखे.
ग़ालिब से जब सर सैयद ने आइन ए अकबरी के उर्दू इशा’त के लिये दीबाचा लिखने को कहा तो ग़ालिब ने इस रविश को ‘मुर्दा परवरी’ कहा, और दीबाचा में फ़ारसी में शेर कहे जिसमें मग़रिब से सबक़ लेने की हिदायत दी कि किस तरह वह भाप से इंजन बना रहे हैं, लगातार नयी-नयी दरयाफ़्तें सामने आ रही हैं,
वह कहते हैं,
मुर्दा परवर दुन मुबारक कार नीस्त
ख़ुद बगू काँ नीस्त जुज़ गुफ़तार नीस्त
यानी,
मुर्दे पालते रहना अच्छा काम नहीं है, ख़ुद बताओ कि वह (आइन ए अकबरी) सिर्फ़ कहानी के सिवा किया है?
इसका असर यह हुआ कि सर सैयद ने मुसलमानों को जदीद तालीम से लैस करने का अहद कर लिया। सच्चाई यह है कि सर सैयद की तहरीक मिर्ज़ा ग़ालिब की मरहून ए मिन्नत है।
ग़ालिब ने मुग़ल दौर का ज़वाल देखा, 1857 देखा,, तो बर्बादी की वजह जदीद तालीम को नज़रअन्दाज़ करने में तलाश किया, माज़ी के अफ़सानों में नहीं। उन्होंने कहा कि आज भाप से इंजन चलाए जा रहे हैं,, हम कहाँ हैं?
उधर अल्लामा इक़बाल ने क्या इलाज पेश किया, माज़ी के मुर्दों को याद करो, बहरे ज़ुलमात में घोड़े दौड़ाने की बात की। वही घिसा पिटा रोना कि मुसलमान दीन से दूर हैं,, तरक़्क़ी के असल मेयार क्या हैं? कह नहीं पाये, एक बार तक़लीद के ख़िलाफ़ ज़रूर कुछ कहा लेकिन वहाँ भी कन्फ़्यूज़न है।
पाकिस्तान के मशहूर फ़िलोसफ़र अब्बास जलालपूरी (ग़ैर शिया) को पढ़िये, जिन्होंने साफ़ तौर पर लिखा कि अल्लामा ख़िरद यानी अक़्ल, साइयन्स और फ़लसफ़े के दुश्मन थे।
लेखक असग़र मेहंदी





