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हज़रत अली (अ) के एक ख़त का हिस्सा

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इस्लामी कैलंडर के अनुसार 19 रमज़ान 40 हिजरी की सुबह क़ूफे की मस्जिद में हज़रत अली (अ) पर तलवार से घातक हमला किया गया था, जिसकी वजह से आज के दिन 21 रमज़ान (28 जनवरी 661 ई) में उन्होंने (अ) जाम ए शहादत नोश फ़रमाया था। उस वक़्त आप (अ) ख़िलाफ़त की मसनद पर थे और अनेक प्रकार की बग़ावतों का मुक़ाबला कर रहे थे। हज़रत अली (अ) को अपने दौर में किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, कैसे ख़ास दोस्तों की तमा और इलीट उनके ख़िलाफ़ हो गया, तारीख़ में दर्ज है।
इस सम्बंध में सीरिया के गवर्नर माविया इब्ने सूफ़ियान का किरदार काफ़ी नकारात्मक रहा जिसकी वजह से ख़िलाफ़त जैसी संस्था ख़त्म हुई और बादशाहत अर्थात ख़ानदानी राजशाही का दौर शुरू हो गया।
यहाँ पर हम हज़रत अली (अ) के एक ख़त का हिस्सा पेश कर रहे हैं जो उन्होंने माविया के एतराज़ात के जवाब में लिखा था। इस्लामी तारीख़ की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला इस ख़त के मज़मून से उन हालात से आगाह हो सकता है जिनसे हज़रत अली (अ) को मुक़ाबला करना था।
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और तुमने लिखा है कि मुझे बैयत के लिए यूँ खींच कर लाया जाता था जिस तरह नकेल पड़े ऊँट को खींचा जाता है- तो ख़ालिक़ की हस्ती की क़सम! तुम उतरे तो बुराई करने पर थे, कि लगे तारीफ़ करने, चाहा तो यह था कि मुझे रुसवा करो ख़ुद ही रुसवा हो गए। भला मुसलमान आदमी के लिए इसमें कौन सी ऐब की बात है कि वह मज़लूम हो, जब कि न वह अपने दीन में शक करता हो, ना उसका यक़ीन डांवाडोल हो। और मेरी इस दलील का ताल्लुक़ अगरचे दूसरों से है मगर जितना बयान यहाँ मुनासिब था, तुम से कर दिया।
तुमने मेरे और उस्मान के मामले का ज़िक्र किया है, तो हाँ इसमें तुम्हें हक़ पहुँचता है कि तुम्हें जवाब दिया जाए। क्योंकि तुम्हारी उनसे क़राबत होती है। अच्छा तो फिर सच सच बताओ कि हम दोनों में उनके साथ ज़ियादा दुश्मनी करने वाला, और उनके क़त्ल का सरो सामान करने वाला कौन था? वह की जिसने अपनी इमदाद की पेशकश की और उन्हेंने उसे बिठा दिया और रोक दिया था या वह कि जिससे उन्होंने मदद चाही और वो टाल गया।और उनके लिए मौत के असबाब मुहैया किए यहाँ तक कि उनके मुक़द्दर की मौत ने उन्हें आ घेरा। हरगिज़ नहीं! ख़ुदा की क़सम! वह पहला, ज़ियादा दुश्मन हरगिज़ क़रार नहीं पा सकता। अल्लाह उन लोगों को ख़ूब जानता है जो जंग से दूसरों को रोकने वाले हैं और अपने भाई बंदों से कहने वाले हैं कि आओ हमारी तरफ़ आओ, और ख़ुद भी जंग के मौक़े पर बराए नाम ठहरते हैं। बेशक़ मैं उस चीज़ के लिए माज़रत करने को तैयार नहीं हूँ कि मैं उनकी बअज़ बिदअतों को नापसंद करता था। अगर मेरी यही ख़ता है कि मैं उन्हें सही राह दिखाता था और हिदायत करता था तो अक्सर नाकर्दा गुनाह मलामतों का निशाना बन जाया करते हैं और कभी नसीहत करने वाले को बदगुमानी का मरकज़ बन जाना पड़ता है। मैं ने तो जहाँ तक बन पड़ा यही चाहा कि इसलाहे हाल हो जाए। और मुझे तो तौफ़ीक़ हासिल होना है तो अल्लाह से, उस पर मेरा भरोसा है और उसी से लौ लगाता हूँ।

हज़रत (अ) का एक कौल क़ाबिल ए ग़ौर है,
आप (अ) फ़रमाते हैं कि लालच इंसान को उस घाट पर उतारती है जहां से वह कभी सेराब नहीं होता।

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