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सिमा बा मज़ामीर और शख्सियत ए इस्लाम

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यह मौज़ू हम कभी न लिखते अगर बाज़ शिद्दत पसंद लोग हमें मजबूर न करते. अफ़सोस कि जहां कई फ़रोई मसाय्ल है उन्हीं में से आज जिस मज़मून पर लिखा गया है यह भी उसी सिलसिले की एक कड़ी है। जैसा कि आप को पता है कि फ़रोई मसाय्ल पर कभी भी शिद्दत इख्तियार नहीं की गई और न की जा सकती हैं। बिल्कुल इसी तरह सिमा (कव्वाली) को बगैर साज़ो के सुनना और साज़ो यानी मज़ामीर के साथ सुनने में भी सूफ़िया के दर्मियान एक इख्तिलाफ़ी मसला है। जिस वली व सूफ़ी ने जो भी नज़रिया अपनाया हम सब का एहतराम करते हैं लेकिन अपनी राय देने का हक़ सबको हासिल है बशर्त यह है कि बंदे के पास दलील हो- हम चूंकि सिमा मज़ामीर के साथ सुनना जायज़ करार देते हैं तो नाज़रीन अहले नज़र इधर भी तवज्जो करें

📜रिवायात व आसार

🟢शेख उल मोहद्दिसीन शाह अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी : जैसा कि अहले इल्म को यह पता है कि शाह साहब तमाम बर्रे सगीर के उलेमा व मोहद्दिसीन के उस्ताद हैं । तमाम मसालिक के उलेंमा की सनद उन तक ही जा मिलती हैं । वह बाज़ उलेमा के हवाले से लिखते हैं कि ,”हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर हज़रत अब्दुल्ला इब्न जाफ़र के पास गए तो देखा कि वहां एक लौंडी बरबत(बाजा ) बजा रही है तो हज़रत अब्दुल्ला इब्न जाफ़र ने हज़रत अब्दुल्ला इब्न उमर से पूँछा कि, “क्या आप इसमें कोई मुज़ायका नहीं समझते कि यह बाजा बजा रही हैं? तो उन्होंने फ़रमाया, “नहीं कोई मुज़ायका नहीं”..

नोट :-हज़रत अब्दुल्ला इब्न उमर एक फ़िक़ही सहाबी है और हज़रत उमर फ़ारूक रदि अल्लाहु अन्हु के फ़रज़ंद है और हज़रत अब्दुल्ला बिन जाफ़र रदि अल्लाहु अन्हु अहले बैत से है और हज़रत अली के भतीजे है। दोनो जलीलुल कदर हस्तियां आला ए मौसीकी सुन रहे हैं तो यह कोई आम बात नहीं.. और शाह अब्दुल हक़ मोहद्दिस देहलवी साहब ने आगे भी बहुत कई सहाबाओ के नाम दिए जो इसका सुनना जायज़ करार देते थे जैसे हज़रत अब्दुल्ला इब्न ज़ुबैर, अमीर मुआविया इब्न सूफ़ियान, हज़रत अम्र बिन अब्बास, हज़रत हिसान इब्न साबित.

🔸ताबई हज़रत अता बिन अबी रबाह : आप हज़रत इमाम ए आज़म अबू हनीफ़ा के उस्ताद और हज़रत अब्दुल्ला इब्न अब्बास के शागिर्द हैं व अहले मक्का के इमाम गुज़रे है व ताबईन में से है, एक शख्स मूसा बिन गुर्रह ने आपको बुलाया तो वहां लोग बरबत बजा रहे थे और आपके आते ही लोगों ने बरबत बजाना बंद कर दिया तो आप हज़रत अता ने फ़रमाया, “जब तक बरबत न बजाओगे और जो गाना गा रहे थे वह न गाओगे तब तक मैं न बैठूँगा, बरबत बजते ही आप बैठकर लुत्फ़ से सुनते रहे ..

हज़रत इब्राहीम बिन साद जो इमाम शाफ़ई जैसो के उस्ताद हैं उन्होंने गिना और ऊव्द खुद भी बजाया और जायज़ होने का फ़त्वा भी दिया

{मदारिजुन नबूवत जिल्द 1 हिस्सा आखिर}

🖤हज़रत इमाम अबू तालिब मक्की : आप वह इमाम है जिनकी किताब के हवाले इमाम इब्न जोज़ी, इमाम गज़ाली, शाह वलीयुल्लाह मोहद्दिस देहलवी और यहां तक कि इब्न तैमिया तक ने दिए हैं। उन्होंने अपनी तसनीफ़ में मसला ए सिमा के बाब में जहां दोनों तरफ़ के इख्तिलाफ़ नकल किए वहां लिखा कि, “हज़रत इमाम शोबा जो इमाम ए आज़म अबू हनीफ़ा के उस्तादों में है और इमान बुखारी के तीसरे उस्ताद हैं जिन्होंने ईराक़ में हदीस व उसूल ए हदीस की बुनियाद रखी. इमाम अबू तालिब मक्की जब तक तल्बा को दफ़ (आला ए मौसीकी) के साथ समा नहीं सुना देते तब तक सबक नहीं पढ़ाते थे । {कूत उल कुलूब जिल्द 2,समा के आदाब}

🟢मौलाना जलालुद्दीन रूमी रहमतुल्लाह अलैह :- एक दफ़ा आप मौलाना रूमी कोनया(तुर्की) के एक बाज़ार से गुज़रे तो वहां सलाहुद्दीन ज़रकूब की दुकान पर ज़रकूबी की खट खट की आवाज़ दिलकश नगमे की तरह आपके कान में पड़ी तो आप रक्स करने लगे और यह मंज़र की कैफ़ियत से हज़रत सलाहुद्दीन ज़रकूब भी आपके साथ रक्स में शरीक हो गए और कुछ देर तक दोनों लोग पूरी बाज़ार में रक्स करते रहे । थोड़ी देर बाद सलाहुद्दीन ज़रकूब वापस अपनी दुकान पर आ गए और मौलाना रूमी घंटों तक उसी हालत में रहे । आज भी आपकी खानकाह में ज़िक्र करते करते वज्द व रक्स साज़ के साथ होता है। आप मौलाना जलालुद्दीन रूमी के नाम से जो सिलसिला मौलविया व जलालिया है जिनकी खानकाहे मिस्र, शाम और तुर्की में मौजूद हैं वहा खास किस्म के लिबास पहनकर रक्स होता है।

{मसनवी मनावी जिल्द 1,2- उर्दू तर्जुमा मौलाना सज्जाद हुसैन साहब}

🔴इमाम गज़ाली अलैहिर्रहमा :- आपने भी दफ़ के साथ नगमा गाना जायज़ करार दिया और फ़रमाया कि अगर यह नाजायज़ होती तो हुज़ूर न सुनते {कीमियाई सादात : सिमा व वज्द के आदाब}

💛हज़रत बंदा नवाज़ गेसू दराज़ चिश्ती निज़ामी : आप फ़रमाते है कि एक दफ़ा हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने चंद लड़कियों को देखा जो सुरूद (आला ए मौसीकी) के साथ हुज़ूर की शान बयान कर रही थी.. इस बात पर हज़रत अबू बकर रदि अल्लाहु अन्हु ने मना किया तो आपने फ़रमाया, “इन्हें छोड़ दो आज ईद हैं ” {जवामि उल कलम मलफ़ूज़ात शरीफ़}

💚हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जाने जाना नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह के खलीफ़ा और हज़रत वलीयुल्लाह मोहद्दिस देहलवी साहब के खास शागिर्द जिनका नाम काज़ी सना उल्लाह पानीपती नक्शबंदी है व आपकी तफ़सीर ए मज़हरी एक इल्मी मकाम की हामिल है । आप काज़ी सना उल्लाह पानीपती ने बाकायदा एक रिसाला इस मसले पर लिखा और फ़रमाया कि, “हज़रत शाह अब्दुल क़ुद्दूस गंगोही बाकमाल इल्म ए ज़ाहिरी व बातिनी के समा मज़ामीर के साथ सुनते थे। आपकी शरह अवारिफ़ में इसकी मुफ़स्सिल बहस मौजूद हैं। {रिसाला मसलतुस सिमा}

🔴हज़रत शाह वलीयुल्लाह मोहद्दिस देहलवी साहब :- आप लिखते हैं कि हज़रत अबुल उला नक़शबंदी जो सिलसिला ए अबुल उलाइया के पेशवा है, वह सिमा बहुत शौक से सुनते थे। कभी उनका सिमा मज़ामीर के साथ होता था तो कभी बगैर मज़ामीर के साथ होता था । {अनफ़ास उल आरिफ़ीन हिस्सा आखिर}

🧡हज़रत ख्वाजा नूर मोहम्मद मुहारवी चिश्ती निज़ामी : आप हज़रत ख्वाजा फ़ख्रुद्दीन देहलवी साहब के खलीफ़ा ए आज़म है जिन्होंने पंजाब में बाबा फ़रीदुद्दीन गंजशकर के बाद सिलसिला ए चिश्तिया को उरूज बख्शा । आस्ताना गोलड़ा शरीफ़, सियाल शरीफ़, कोट मिट्ठन शरीफ़, तौंसा शरीफ़ सब दरगाहों पर आपका ही फ़ैज़ है। आपके बारे में लिखा है कि एक दफ़ा आप अजमेर शरीफ़ गए तो वहां एक हिंदू जोगी भी आया और महफ़िल ए समा जैसे ही शुरू हुई तो उस जोगी ने अपने तसर्रुफ़ से सारे साज़ व आलात बंद करवा दिए । जब ख्वाजा नूर मोहम्मद मुहारवी को खबर दी गई तो आप महफ़िल में आए और उस जोगी के साथ बैठ गए। आपके बैठते ही सारे साज़ खुद ब खुद बजना शुरू हो गए और कव्वाली होती रही । {मनाकिब़ुल महबूबीन हिस्सा अव्वल -तज़किरा ख्वाजा नूर मोहम्मद}

🤎हज़रत अब्दुर्रहमान जामी नक्शबंदी :- आप सिलसिला ए नक्शबंदिया के अज़ीम आलिम, सूफ़ी शायर और साहिब ए तसनीफ़ बुज़ुर्ग है जिनकी किताब आज दर्स ए निज़ामी में शामिल होती हैं। उन्होंने बाकायदा “रिसाला ए मौसीकी” नाम से एक रिसाला लिखा {हयात ओ खिदमत हिस्सा आखिर -मौलाना जामी}

💜हज़रत पीर महर अली शाह गोलड़वी साहब : आप अपनी सदी के मुजद्दिद है और आपको तमाम मसालिक के लोगों ने खत्म ए नबूवत में अपना इमाम माना है । आपने ही मिर्ज़ा गुलाम क़ादियानी के फ़ितने को लगाम दी थी। आप खुद भी समा मज़ामीर के साथ सुनते आपके मुरीद ने एक रिसाला भी लिखा जिसमें आपका मोक्किफ़ भी बयान किया है। {रिसाला ए सिमा – अता मोहम्मद बंदयालवी, महर ए मुनीर}

❣️अब हम आखिर में चंद दरगाहों व मशायख का ज़िक्र करेंगे जिनके आस्तानों पर सिमा उनकी हयात में भी सुना जाता था और आज भी सुना जाता है। हज़रत ख्वाजा कुतुबुद्दीन मौदूद चिश्ती, हज़रत शेख अहमद जाम, हज़रत इमाम अहमद गज़ाली, शेख ओहदुद्दीन किरमानी, ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी, मौलाना जलालुद्दीन रूमी

💕अब खानकाहे मुलाहेज़ा हो : पाकपतन शरीफ़, तौंसा शरीफ़, सियाल शरीफ़, अजमेर शरीफ़, किचौचा शरीफ़, गोलड़ा शरीफ़, मुहार शरीफ़, गुलबर्गा शरीफ़.. मज़कूरा सभी बुज़ुर्ग समा मज़ामीर के साथ सुनते थे और आज भी खानकाहों में वही निज़ाम हैं ।

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, “मेरी उम्मत गुमराही पर जमा नहीं हो सकती {सहीह मुस्लिम जिल्द 2}
तो अब देख लीजिए कि उम्मत के कौन कौन से बुज़ुर्ग मज़ामीर के साथ समा सुनाते थे । जब हुज़ूर फ़रमा रहे हैं कि मेरी उम्मत गुमराही पर इजमा नहीं कर सकती तो किसी की क्या मजाल जो इन सूफ़िया को गुमराह कहे.

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