इमामबाड़ा जन्नत मआब सैयद तकी साहब अकबरी गेट लखनऊ में अशरए मुहर्रम की सातवीं मजलिस को मौलाना सैयद सैफ अब्बास नकवी साहब ने “अहलेबैत नजात का रास्ता” विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि हर दौर में हक़ और बातिल के बीच मुक़ाबला रहा है और बातिल अलग-अलग नज़रियात और अलग-अलग शक्ल में आता रहा।
उसकी कोशिश यह रहती थी कि लोगों को हक़ से दूर रखा जाए, लेकिन जब-जब बातिल ने कोशिश की, तो खुदा ने किसी न किसी नबी या पैगंबर को इससे मुक़ाबले के लिए दुनिया में भेजता रहा, जो लोगों को गुमराही से निकालकर नजात के रास्ते पर लाते रहे।
बातिल इसी फ़िराक़ में था कि हक़ वाले कब तक आते रहेंगे, किसी न किसी दिन हम अपने मकसद में क़ामयाब हो जाएंगे। और जब हमारे नबी करीम ने 10 हिजरी में आखिरी हज का एलान किया, तो दुश्मन इस बात पर ख़ुश था कि अब हम अपने इरादे में क़ामयाब हो जाएंगे।
लेकिन जब 18 ज़िलहिज्जा सन 10 हिजरी को रसूल-ए-अकरम ने अली अलैहिस्सलाम की खिलाफत का एलान किया, तो दुश्मन मायूस हो गया और उसने खिलाफत का ही नक़ाब पहनकर हक़ के मुक़ाबले पर आ गया।
इसी लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मदीना से करबला का सफ़र किया, ताकि हक़ और बातिल दुनिया वालों पर ज़ाहिर हो जाए और दुनिया हक़ को पहचान कर नजात के रास्ते पर चल सके।
अंत में मौलाना ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भतीजे हज़रत क़ासिम अलैहिस्सलाम का करबला में शहीद होने और दुश्मनों के हाथों शहज़ादे के लाशे को पामाल करने का दिलसोज़ मंज़र पेश किया, जिसे सुनकर अज़ादारों ने शोरे गिरिया व मातम बुलंद किया।
मजलिस के बाद शबीह-ए-ताबूत हज़रत क़ासिम अलैहिस्सलाम बरामद हुआ, जिसकी ज़ियारत कराई गई और तबर्रुक तौज़ी किया गया।
सात मोहर्रम अहलेबैत निजात का रास्ता: मौलाना सैफ अब्बास



