शेख मुहम्मद अली अल अमरी
उस मजलूम आलिम को कई बार सजाए मौत सुनाई गई लेकिन किन्ही वजूहात से उसपर अमल न हो सका।ऐसा लगता था कि कोई गैबी ताकत उसे बचा रही है । उस आलिम का बस यही जुर्म था कि वह मुहिब्बे अहलेबैत था और वह हक का साथ देता था, मजलूमों के हक में आवाज उठाता था । जेल में उसपर बहुत तशद्दुद किया गया लेकिन जाबिर हुकूमत उसके हौसले को न तोड़ सकी । लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया कि यह कन्फर्म हो गया कि आज ही फांसी हो जाएगी । जेलर, डॉक्टर, जल्लाद और दूसरे जिम्मेदार लोग आ गए और फांसी की तैयारियां मुकम्मल कर ली गई, रस्सी, तख्ता और फंदे की मजबूती चेक कर ली गई । कैदी को फांसी के तख्ते पर लाया गया, गरीब आलिम के हाथ पीछे से बांध दिए गए, जल्लाद ने कैदी के चेहरे पर काली टोपी पहना दी । गले में फांसी का फंदा डाल कर टाइट कर दिया गया, फिक्स टाइम पर जैसे ही जेलर ने हाथ का इशारा किया जल्लाद ने लीवर खींच किया । कैदी का बदन हवा में झूल गया ।
35 सेकेंड तक कैदी फांसी पर लटका रहा, लेकिन यह क्या हुआ ? फांसी की रस्सी अपने आप टूट गई, कैदी का जिस्म जमीन पर आ गिरा। डॉक्टर ने जांच किया, कैदी अभी मरा नहीं था, वह अब कोमा में था और अगले 35 दिनों तक कोमा में ही रहा । उसको फिर फांसी पर नहीं लटकाया जा सका ।
होश में आने पर कैदी ने बताया कि जब गले में फांसी का फंदा डाला गया तो उसने खातून ए जन्नत बीबी फातिमा जहरा (सला) से मदद की गुहार की थी ।
कौन था यह कैदी ?
ये कैदी थे आयतुल्लाह शेख मुहम्मद अली अल अमरी जो सऊदी अरब के ही नहीं बल्कि आलमे इस्लाम के एक अजीम आलिम होने के साथ साथ एक बड़े समाज सुधारक थे । इनका जन्म 1911 में हुआ और वफात 100 साल की उम्र में 24 जनवरी 2011 को हुई। इन्होंने सऊदी अरब, नज़फ, कुम से तालीम हासिल की । इनकी जिंदगी के 45 साल जेल में बीते और जो वक्त मिला उसे अहलेबैत की तालीमात को अवाम में फैलाने में सर्फ किया ।