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तीजे-चालिसवों का वलीमा लेखक एस,एन लाल

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पहले 60 से 80 की दाहियों में ओलेमा ऐसा करते थे, कि जहां शादी में म्यूज़िक बज रहा होता था, वहां निकाह नहीं पढ़ते को मनाकर देते थे, फिर धीरे-धीरे माशरे से ये म्यूज़िक की बिमारी ख़त्म हो गयी। तो क्या ओलेमा तीजे-चालिसवों में होने वाले वलीमे को क्यों नहीं रोक सकते।
शहर में शियों का कोई कब्रस्तान तो है नहीं, सब मौला हुसैन (अ.स.) के तुफैल में कर्बलाओं और इमामबाड़ों में दफन होते है…, अगर वहां कब्र के दाम कम नहीं हो रहे, तो ओलेमा को इन वलीमों को रोकने के लिए आगे आये, ताकि मरने वाले वारसैन पर पड़ने वाला सबसे बड़ा बोझ तो कम हो।
एस.एन.लाल
मरने वाले के इसाले सावब के लिए फातेहा, क़ुरआन-ख़ानी, मजलिस और तबर्ररुक तक तो समझ आता है…, लेकिन मरने का वलीमा समझ नहीं आता………….। पहले फातेहा के बाद सिर्फ वह खाना खाते थे, जो दूसरे कस्बों या कहीं दूर से आये हो, बाक़ी फातेहा के खाने व और सामान ग़रीब-ज़रुरतमन्द को दे दिया जाता था। बाक़ी फातेहा में शरीक लोग नज़्रेमौला (जोकि इमाम की नज़्ा्र, सिर्फ थोड़े से खाने पर होती थी) से एक-एक लुक़मा चखकर मरहूम के लिए फातेहा पढ़ते थे।…………होता अभी भी यही सब कुछ है लेकिन इसमें खाना खिलाने का चलन ऐसा बढ़ गया है कि अब कम्पीटीशन होने लगा है, ग़ैर आदमी इस माशरे में होने वाली इस दावत को देखकर ये नहीं समझ सकता कि ये चालिसवें का खाना है या वलीमे का खाना।
एस.एन.लाल
अगर ये सही है तो ओलेमा को इसको और फरोग़ देना चाहिए, नहीं तो रोकना चाहिए। रोकना इस लिए कि मान लीजिए ‘अलिफ’ के पास पैसा है उसने अपनी अम्मा के चालिसवें में वलीमा कर दिया और ‘बे’ के पास पैसा नहीं है, लेकिन उस ‘बे’ को भी अपनी अम्मा के मरने का वलीमा करना ही पड़ेगा, चाहे खाने की तआदाद कम करदे, चाहे कर्ज़ ले। इस सवाल पर भी जिम्मेदारों की खामोशी ही रहते है…क्यों।
माशरे में सारे तीजे-चालिसवें एक ही तरह से होना चाहिए हां मजलिस का तबर्ररुक आप अपनी हैसियत से बटवा दिजये…..। अगर और ज़्यादा पैसा है, तो यतीमोखानों (अनाथलयो) में जाकर उन लोगो को या ज़रुरतमन्दो को खाना खिला दे। ताकि वह लोग एक सूरे फातेहा पढ़कर मरहूम के बख़श दे।
एस.एन.लाल
वैसे हम कौन समझाने या कहने वाले होते है… माशरे में यह देखकर दुख होता है कि जिसके पास पैसा नहीं है…वह किस जतन से अपने मरहूम का तीजा-चालिसवां करता है…., ऐसे कई मनाज़िर ऑंखों के सामने से गुज़रे हैं।
इन वलीमों में खाना खाने वाले पहले से ही पेट भरे होते है, और खाने में मज़ा और बोटी ढ़ूढ़ते है…आधे लोग फातेहा भी नहीं पढ़ते…अगर मजलिस न हो, तो शायद ही कोई मरहूम का फातेहा पढ़े। मरहूम को फातेहा तो इमाम हुसैन (अ.स.) के तुफैल के ज़रिये ही पहुॅंचता है।
कुछ लोग इमाम के चालिसवें का हवाला भी दे सकते हैं…..हम इस लायक़ नहीं कि इमाम के चालिसवें से अपने मरहूम का चालिसवां मिलायें। इमाम के चालिसवें में ख़ूब खाना बनायें, खिलाये और बांटे…वह हमारी बख़्िशश का सामान और बुराई के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करने का साथ देने का अहद है। लेकिन सभी को ज़रुरी नही।

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