इलेक्ट्रानिक मीडिया के कानून की जरूरत है क्योंकि ज्यादातर चैनल सिर्फ टीआरपी की दौड़ में लगे हैं और सनसनीखेज खबर की ओर जा रहा है। दूसरी तरफ केन्द्र ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता की हिमायत करते हुये मंगलवार को न्यायालय से कहा कि प्रेस को नियंत्रित करना किसी भी लोकतंत्र के लिये खतरा होगा।
न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह मीडिया पर सेन्सरशिप लगाने का सुझाव नहीं दे रहा है
लेकिन मीडिया में किसी न किसी तरह का स्वतंत्रता नियंत्रण होना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि इंटरनेट को नियमित करना मुश्किल है लेकिन अब इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए कानून आवश्यकता है।
न्यायालय ने सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम ‘बिन्दास बोल’ के प्रोमो को लेकर उठे सवालों पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। इस प्रोमो में दावा किया गया है कि ‘बिन्दास बोल’ कार्यक्रम में सरकारी नौकरियों में मुस्लमानों की घुसपैठ की साजिश का पर्दाफाश किया जायेगा।
न्यायालय ने कहा कि मीडिया में किसी न किसी तरह के स्वतंत्रता नियंत्रण की आश्यकता है लेकिन सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि पत्रकार की स्वतत्रंता सर्वोच्च है। मेहता ने कहा, ”किसी भी लोकतंत्र के लिये प्रेस को नियंत्रित करना खतरनाक होगा।”
अदालत ने इस कार्यक्रम की दो कड़ियों के प्रसारण पर रोक लगाते हुये कहा, ”इस समय, पहली नजर में ऐसा लगता है कि यह कार्यक्रम मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने की कोशिश है। यह कार्यक्रम प्रशासनिक सेवाओं में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों की कथित घुसपैठ के बारे में है। वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से मामले की सुनवाई करते हुये न्यायालय ने टिप्पणी की, ”अधिकांश टीवी सिर्फ टीआरपी की दौड़ में लगे हुये हैं।”
मेहता ने कहा कि कई बार आरोपियों को अपना पक्ष रखने के लिये भी कुछ चैनलों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह देखने की भी आवश्यकता है कि क्या किसी अभियुक्त को अपना बचाव पेश करने के लिये यह मंच दिया जा सकता है। पीठ ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे कि राज्य ऐसे दिशा निर्देश थोपेंगे क्योंकि यह तो संविधान के अनुच्छेद 19 में दी गई और अभिव्यक्ति की आजादी के लिये अभिशाप हो जायेगा।
पीठ ने कहा, ”प्रिंट मीडिया की तुलना में इलेक्ट्रानिक मीडिया ज्यादा ताकतवर हो गया है और प्रसारण से पहले प्रतिबंध के पक्षधर नहीं रहे हैं।” न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘मैं यह नहीं कह रहा कि राज्य को इलेक्ट्रानिक मीडिया को नियंत्रित करना चाहिए लेकिन इसके लिये किसी न किसी तरह का स्वत: नियंत्रण होना चाहिए। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया, ” अदालत ने कहा सोशल मीडिया की नहीं बल्कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के बारे में बात कर रहे हैं।
मेहता ने कहा कि किसी न किसी तरह का स्वत: नियंत्रण होना चाहिए लेकिन पत्रकार की आजादी बनाये रखी जानी चाहिए। इस पर न्यायमूर्ति जोसेफ ने सालिसीटर जनरल से कहा,”मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि कोई भी आजादी पूरी तरह निर्बाध नहीं हैं। मेहता ने पीठ से कहा कि कुछ साल पहले कुछ चैनल ‘हिन्दू आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद कह रहे थे।