Home / कब्र की ज़मीने या पॉश एरिया के फ्लैट,जिसपर ओलेमा की ज़बाने खामोश है।

कब्र की ज़मीने या पॉश एरिया के फ्लैट,जिसपर ओलेमा की ज़बाने खामोश है।

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लेखक एस.एन.लाल

मरने के बाद आज लखनऊ में  2 गज़ ज़मीन मिलना मुश्किल हो गया है। ख़ासकर लखनऊ में।  इन सबके जिम्मेदार लोग भी सरकार की तरह ही बात करते है…, ‘‘जैसे गांव में क्या-क्या परेशानी है, कोई चिन्ता नहीं होती, लेकिन जब किसी गांव में कोई बालात्कार या मर्डर हा जाता है, तभी कुछ समय के लिए सरकार का तीसरा नेत्र खुलता है और फिर बन्द।’’

यहां भी कब्रों को लेकर बवाल मचता है,, लेकिन फिर खामोशी…! यह हाल ख़ासकर शिया कब्रस्तानों को है, लखनऊ के कब्रस्तानों में तो यही हाल है और अगर पूरे उ0प्र0 में भी है..तो उसका जिम्मेदार कौन है…ये आप खुद समझ सकते हैं।

एस.एन.लाल

बहुत से इमामबाड़ों में (जहां कब्रस्तान है) भी कब्रे 2-2 लाख की है। कोई आदमी कब्र के लिए जाये, तो उसको मनाकर दिया जायेगा, फिर किसी के ज़रिये घूम-फिर के वहां पहुंचेगा..तो कब्रो के रेट पता चलेंगे…, अब उसके पास इतना सरमाया है तो यहां दफन होकर जन्नत में जा सकता है! वरना….!

अगर कब्रस्तान छोटे है या किसी खानवादे के है, तो साफ मनाकर दिया जाये, कि यहां हर कोई दफन नहीं हो सकता…! लेकिल अगर 2 भाई में जिसके पास पैसा है वह वहां दफन हो गया और दूसरे पास पैसा नहीं वह वहां दफन नहीं हो पाया, तो ज़रा सोचये….. इस आज के दिखावी दौर की वजह से जो दफन नहीं हो सका, उसके घरवालों के ख़ानदान में क्या….!

एस.एन.लाल

वही शहर के जो बड़े कब्रस्तान है…वहां ‘नज़रे मौला और पक्की कब्र’ के नाम पर अच्छे पैसे वसूले जा रहे है। यानि ‘नज़रे मौला’ के नाम पर पैसा ज़बरदस्ती लिया जा रहा है…, शियों में तो दफन होने के बाद तीजे-चालिसवे का खाना भी आजकल करना ज़रुरी हो गया है। सोचे आज के हालात में कोई अगर बिमारी के बाद मरता है, तो उसका इलाज का खर्चा, मरने का, फिर बाक़ी रसूमात…! उस हिसाब से बन्दा 2 से 3 लाख के बीच के लपेटे में कम से कम आ जाता है। जिसपर ओलेमा की ज़बाने खामोश है।

शबेबरात में एक कब्रस्तान गया, तो वहां एक परिवार के लोग मुंशी से उलझे हुए  थे, कि ‘‘मेरे मरहूमीन की कब्रे कहां है, ज़मीन बिलकुल बराबर कर दी गयी…,’’ वह परिवार नौकरी के सिलसिले में लखनऊ के बाहर रहता था 5 साल से लखनऊ आ नहीं सका था। तो उनकी कब्रे बराबर कर के हयाती में बेच दी गयी थी।

ज़़्यादातर क़ौम के जिम्मेदार लोग अपने-अपने मसलों को लेकर आपस में और ट्रस्ट से लड़ रहे है, लेकिन जिस क़ौम के वजूद की वजह से उनका वजूद है और ट्रस्ट है। उनकी जिन्दगी तो दूर उनके मरने तक की फिक्र नहीं है। कम से कम और मुसलमानों के कब्रस्तानों की तरह मरना तो सस्ता करदे।

कुछ कहेंगे, कि हमको फुला साहब देते है…हमको सब कुछ मिलता है, हां ….कुछ को मिलता भी जिन्दगी में भी और मरने के बाद भी बिना पैसे के कब्र भी… लेकिन पहुंच वालों को, जिनकी रसाई है…वरना बाक़ी कि तो रुसवाई होती है।

एस.एन.लाल

लखनऊ में नवाबी दौर के ख़त्म होते ही अज़ादारी भी ख़्ात्म के मुहाने पर थी, तब ये क़ौम जागी थी, फिर उस दौर में मौजूद इमानदार, दयानतदार और क़ौमपरस्त लोगो के बीच जिम्मेदारी बांटकर क़ौम खामोश बैठ गयी थी। हर 100 साल बाद बदलाओं आता है…, अब फिर क़ौम के नाम पर जो हो रहा है…वह पूरी क़ौम को देखना होगा। फोटो खिचवाना, बयानबाज़ी और अखबारों में छपने के लिए सिर्फ काग़ज़ों पर काम करने वालों से बचना होगा…वरना फुटबाल बने रहेंगे

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