फातिमा शेख :-
भारत की पहली प्रमाणित मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख ना होतीं तो दलितों में शिक्षा का पहला अलख जगाने वाले ज्योती बा फूले और सावित्री फूले भी नहीं होते।
उन्नीसवीं सदी में अछूत माने जाने वाले दलितों की मदद करने वाली कौन थीं ? एक मुसलमान फातिमा शेख थीं।
जब ज्योति बा फूले को पत्नी सावित्री फूले समेत उनके घर से शैक्षणिक कार्य करने के कारण उनके पिता ने निकाल दिया तो फातिमा शेख ने उनका साथ दिया।
तब फ़ातिमा शेख़ के बड़े भाई उस्मान शेख़ ने ही समाज के तमाम विरोध के बावजूद उन्हें अपने घर में जगह दी और उसी घर को ज्योति बा फूले और सावित्री फूले को स्कूल चलाने के लिए दे दिया।
तब जब दलित अछूत थे , उस दौर में दलितों को छुआछूत का सामना करना पड़ता था , दलित घृणा के पात्र थे। उनकी परछाईं को भी लोग मनहूस समझते थे। तब फातिमा शेख ने इन्हें गले लगाया और गाँव गाँव घूम कर महिलाओं को स्कूल आने और शिक्षित होने के लिए प्रेरित करती रहीं।
संविधान सभा में बाबा साहेब डाक्टर भीम राव अंबेडकर पश्चिम बंगाल से मुसलमानों के समर्थन से ही चुनकर पहुंचे। मुसलमान समर्थन ना करते तो बाबा साहेब इतिहास ना बन कर कहीं खो गये होते।
दलितों के लिए संविधान में तमाम प्रावधान शामिल कराने के बावजूद बाबा साहेब डाक्टर भीम राव अंबेडकर कभी भी दलित बाहुल्य सीट पर भी जनता द्वारा चुने नहीं गये और दो चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा।
1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में डाक्टर अम्बेडकर उत्तरी बंबई से चुनाव हारे और 1954 में भंडारा में हुए लोकसभा उप चुनाव में डाक्टर अम्बेडकर की बुरी तरह हार हुई और वह तीसरे नम्बर पर रहे।
इसके बावजूद चाहे फातिमा शेख को भूल जाना रहा हो या मुसलमानों की बदौलत बाबा साहेब बने डाक्टर अंबेडकर द्वारा मुसलमानों और इस्लाम पर की गयी नकरात्मक टिप्पणियाँ बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं।
कांशीराम और मायावती के मुसलमानों के बारे में कहे अपशब्द पब्लिक डोमेन में उपलब्ध हैं , अखिलेश की राजनीति भी मुसलमानों से दूरी बनाए हुए ही दिखती है , इसके बावजूद कि वह मुसलमानों के समर्थन से सत्ता पाते रहे हैं।
जबकि इनकी कौम के उद्धार में मुसलमानों का सदैव साथ रहा है। उन्हीं ज्योतिबा फूले और अंबेडकर के प्रयासों से थोड़ा मज़बूत हुआ दलित और मंडल आयोग और मुसलमानों के समर्थन से ही बनी लालू-मुलायम की सरकारों में नौकरी पाकर मजबूत हुआ दलित और ओबीसी समाज आज सबसे अधिक सांप्रदायिक है।
इनकी सांप्रदायिकता उच्चजाति वर्ग से भी विभत्स है। वह मुसलमानो के खिलाफ दंगों में सबसे आगे रहता है , सोशल मीडिया पर गाली देने में सबसे अव्वल।
खैर , मुसलमानों ने भी तो कभी फातिमा शेख को याद नहीं किया, वैसे भी मुसलमान अपने महापुरुषों को याद भी नहीं करते।
ब्रिगेडियर उस्मान से लेकर वीर अब्दुल हमीद तक उदाहरण हैं।
आज याद कर लीजिए , उन्हीं महान फातिमा शेख का आज जन्मदिन है।
उनको खिराज ए अकीदत




