आज के दिन, 9 अप्रैल 1980 को इराक़ी स्कालर मुहम्मद बाक़िर अल-सदर को उनकी बहन सैयदा बिन्ते हुदा (जो स्वयं एक स्कालर और ऐक्टिविस्ट थीं) के साथ सद्दाम हुसैन ने क़त्ल कराया था। बाक़िर अल सदर एक इराक़ी फ़िलॉसफ़र, ऐकडेमिक और पोलिटिकल ऐक्टिविस्ट थे, और इराक़ी तानाशाह सद्दाम हुसैन की पालिसियों के सख़्त मुख़ालिफ़ थे। बाकिर अल-सदर इश्तराकियत और सरमायादारी दोनों ही नज़रियात के हर्फ़ गीर थे।
उनकी किताबें रवायती मज़हबी नज़ारयात से पुर होते हुए भी दीन में जदीद मिज़ाज की शमूलियत का इसरार भी करती थीं। एकनामिक्स पर इस्लामी नज़रिए से उनकी दो अहम किताबें इक़्तिसादुना (Our Economics) फ़लसाफ़तुना (Our Philosophy दर्शन) क़ाबिल ए ज़िक्र है। इन दोनों किताबों का मुतादिद ज़बानों में तर्जुमा हो चुका है। इन किताबों के ज़रिए वह मार्क्सवाद और सरमायादारी की तफ़सील से तंक़ीद पेश करते हुए इस्लाम को ऑल्टरनेटिव निज़ाम के बतौरपेश करते हुए अपने ख़यालात पेश करते हैं।
उनकी किताबों की इशा’त के बाद कुवैत की सरकार ने यह तख़मीना करने के लिए कि इस्लामी नज़रयात के मद ए नज़र मुल्क की तेल रीसॉर्सेज़ का इंतज़ाम कैसे किया जा सकता है, वहाँ की सरकार ने बाक़र अल – सदर को बाक़ायदा इस काम के लिये मामूर किया था। इसके बाद ही इस्लामी बैंकिंग पर काम शुरू हुआ, जो जदीद इस्लामी बैंकों की बुनयाद है।
मिस्र में इख़्वानुलमुस्लिमिन की बुनयाद के बाद दूसरे अरब मुल्कों में भी सियासी-मज़हबी तंज़ीमों की बुनयाद पड़ने लगी। इसी पसमंज़र मैं इराक़ की शिया कम्यूनिटी ने भी कुछ उलेमा की लीडर्शिप में हिज़्बुद्दअवा (पार्टी) की बुनयाद रखी। इन उलेमा में अहम नाम आयतुल्लाह बाक़िर अल-सदर का भी है। माडर्न हिस्ट्री मैं शिया कम्यूनिटी के ज़रिए इस्लामिक रेवलूशन लाने की शायद ये पहली मज़बूत और मुनज़्ज़म कोशिश थी।
बाक़र अल-सदर की यह तहरीक बाथ पार्टी की इराक़ी सरकार की नज़र में ग़ैर-क़ानूनी क़रार दी गयी जिसकी वजह से उन्हें बार-बार क़ैद किया गया जहां उन पर शदीद ज़ुल्म होता था लेकिन तमाम मसायब के बाद भी उन्होंने अपना काम जारी रखा।
1977 में जब बाथिस्टों ने अयातुल्ला अल-सद्र को गिरफ्तार किया, तो उनकी बहन अमीना सदर बिन्त अल-हुदा ने नजफ़ में कई मुज़ाहरों का इनिक़ाद किया जिसकी वजह से बाथिस्टों को अल-सदर को रिहा करने के लिए मजबूर तो कर दिया लेकिन उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया गया।
1979-1980 में, इराक के अनेक इलाक़ों में बाथ पार्टी की हुकूमत के ख़िलाफ़ तहरीक शुरू हुई तो सद्दाम और उसकी पार्टी के लोगों ने यह मशहूर करना शुरू कर दिया कि यह तमाम ऐक्टिविटीज़ ईरानी इंक़िलाब से मुतासिर हैं जिसकी वजह से इराक़ी सरकार के ज़ुल्म पर
अमरीका समेत सभी मुल्कों ने ख़ामोशी इख़्तियार कर ली। मई 1979 के यह मुज़ाहरे नौ दिन चले, लेकिन हुकूमत ने सख़्ती से दबा दिए। उसी साल जून में बाक़र अल-सदर की गिरफ़्तारी के बाद उनकी बहन, बिन्त अल-हुदा की लीडर्शिप में, मुख़ालिफ़त की एक और लहर की शुरुआत हो गयी। आर्म्ड फ़ॉर्सेज़ और मुज़ाहरीन के बीच अनेक झड़पें सामने आईं। नजफ़ को घेर लिया गया और अनेक मुज़ाहरीन मारे गए।अंततः 5 अप्रैल 1980 को उनकी बहन, सैय्यदह बिन्त अल-हुदा को भी गिरफ्तार कर लिया गया। 9 अप्रैल, 1980 को, बाक़र अल-सदर और उनकी बहन को बाथिस्टों ने शदीद तशद्दुद का निशाना बनाने के बाद क़त्ल दिया गया। बाक़र अल-सदर के सिर में लोहे की कील ठोक दी गई और फिर नजफ़ में उनके जिस्म को आग लगाने की कोशिश भी हुई। कहा जाता है कि सद्दाम हुसैन ज़ाती तौर पर उनके क़त्ल में मुलवविस था। बाथिस्टों ने बाक़र अल-सदर और बिन्त अल-हुदा की लाश को उनके चचेरे भाई सैय्यद मुहम्मद अल-सदर को सौंप दिया। और, उन्हें उसी रात नजफ़ के वादी-उस-सलाम क़ब्रिस्तान में दफ़नाया दिया गया था। इस वहशियाना जुर्म पर सद्दाम हुसैन की मग़रिब ने कोई तंक़ीद नहीं की क्योंकि तब सद्दाम हुसैन उनका एक महबूब कैरेक्टर हुआ करता था।
सद्दाम को उसके कुछ ही जरायम की सज़ा मिल सकी,,,
-असग़र मेहदी
9-4–2024




