लेखक असग़र मेहंदी
आज के दिन, 14 जनवरी 1551 को मध्यकालीन चिंतक, इतिहासकार, लेखक, राजनीतिज्ञ अबुल-फ़ज़ल इब्न मुबारक, जिन्हें अबुल फ़ज़ल-अल्लामी के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म हुआ था। 1579 में नियुक्ति से लेकर 1602 में अपनी मृत्यु तक अबुल फ़ज़ल मुगल सम्राट अकबर के महान वज़ीर और सदर उस सुदूर (धार्मिक ट्रस्ट के इन-चार्ज) थे।
वह अकबरनामा के लेखक थे। तीन खंडों (तीसरा खंड आइन-ए-अकबरी के रूप में जाना जाता है) पर आधारित यह कृति अकबर महान के शासन का आधिकारिक इतिहास है।अबुल फ़ज़ल का एक कारनामा बाइबिल का फारसी अनुवाद भी है। वह अकबर के शाही दरबार के नौ रत्नों में से एक थे और सम्राट अकबर के शाही कवि फ़ैज़ी के भाई थे।
अबुल फ़ज़ल अपने समय से काफ़ी आगे की सोच रखते थे, शासन में धर्म और आस्था के मिश्रण के वह आलोचक थे। सही अर्थों में सेक्युलर राज्य की परिकल्पना पेश करने वाले वह पहले व्यक्ति नज़र आते हैं- उनका नज़रिया ए “सुलह कुल” आज भी रास्ते का चिराग़ है।
अबुल फजल के अनुसार संप्रभुता किसी एक धर्म विशेष तक सीमित नहीं है। चूंकि राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था, वह समाज में मौजूद विभिन्न धर्मों में भेदभाव नहीं कर सकता था। यदि राजा जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर भेदभाव करता है तो उसे न्यायपूर्ण राजा नहीं माना जाएगा।
संप्रभुता किसी विशेष धर्म से नहीं जुड़ी थी इसलिए अबुल फजल ने विभिन्न धर्मों के अच्छे मूल्यों को बढ़ावा दिया और उन्हें शांति बनाए रखने के लिए इकट्ठा किया। उन्होंने लोगों को बंधे विचारों से मुक्त करके उन्हें राहत प्रदान की।अपने शुरुआती दौर में अकबर एक कट्टर मुस्लिम शासक था। यह अबुल फ़ज़ल जैसों का प्रभाव था कि वह अंधेरों से रौशनी की तरफ़ आया। फ़ज़ल ने अकबर को एक तर्कसंगत शासक के रूप में पेश करने की दिशा में उसके विचारों को secularise किया।
यह अबुल फ़ज़ल का प्रभाव था कि अकबर से लेकर शाहजहाँ के शासन तक “राज्य” का स्ट्रक्चर पूरी तरह सेक्युलर था।
कुछ घटनाओं का ज़िक्र ज़रूरी है-
1588 में जब शिया विद्वान मुल्ला अहमद ठठवी की लाहौर में हत्या की गयी तो अकबर ने उनके क़ातिल मिर्ज़ा फ़ौलाद को गिरफ़्तार करके मौत की सज़ा दी। जहांगीर के काल में कुछ घटनाएँ ज़रूर नज़र आती हैं लेकिन यह राजनैतिक नौवियत की थीं। इस सिलसिले में अकबर के समय के चीफ़ जस्टिस क़ाज़ी नुरूलल्लाह शुस्तारी (शहीद ए सालिस) की 1610 में हत्या का दाग़ जहांगीर पर ज़रूर है यह जुर्म कट्टरपंथियों के दबाव में उसके हाथों हुआ। जहांगीर के बाद शाहजहाँ भी सुलह कुल की नीति पर चलता रहा, और जब शेख़ अहमद सरहिंदी ने हिदुओं के विरुद्ध अभियान शुरू किया तो उन्हें एक साल के लिये क़ैद कर दिया गया।
आज ज़रूरत है कि राज्य को धर्म और आस्था से अलग रखा जाये, तभी आम आदमी तक ख़ुशहाली पहुँच सकती है।
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