हम मजदूर हैं। हम मजबूर हैं!

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    आज मजदूर दिवस है। विगत वर्षों में 1 मई को हम मजदूर दिवस के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम सम्पन्न करते थे इसके अलावा मजदूर दिवस के अवसर पर लेख प्रकाशित होते थे लेकिन पिछले साल 2020 और इस वर्ष 2021 में मजदूर दिवस आने पर वाकई आभास हो गया कि हम सिर्फ मजदूर हैं यानी गड्ढा खोदें और पानी पियें।
    वर्तमान सरकार की पॉलिसी ने पूरे देश में हर चीज़ की परिभाषा बदल दी है मजदूर दिवस की परिभाषा भी बदल गई है पिछले साल लगातार लाकडाउन इस साल फिर से लाकडाउन की प्रक्रिया, दुकानें बंद, कोचिंग बंद, स्कूल बंद , आदमी बेरोजगार अब तो स्थिति मजदूर से भी बदतर हो गई मजदूर तो फिर भी दिन भर काम करके शाम को चार पैसे पाता लेकिन वह मजदूरी भी सरकार ने छीन लिया। अब मजदूर नहीं बेरोजगार मजदूर हो गया।
    सरकार किसकी है? सरकार भारत देश की है। भारत देश किसका है? भारत देश भारत में रहने वाली जनता का लेकिन सरकार देश में कितने प्रतिशत जनता को सहयोग कर रही है। अडानी और अंबानी को छोड़कर के सरकार अपने मंत्री तक की सुरक्षा नहीं कर पा रही है।
    इस वर्ष कोरोना संक्रमण की स्थिति में हालात बेहद खराब हो गये। इसमें पूरे देश में हर तरफ जनता ही सेवक के रूप में काम कर रही हैं वास्तव में जो देश का सेवक था प्रधान सेवक था वह तो चुनाव में व्यस्त था उसका काम जनता से मन की बात करना उपदेश देना है। लेकिन जनता की सेवा तो आखिर जनता ही कर रही है।
    ऐसा लगता है कि देश को चलाने के लिए सरकार की जरूरत ही नहीं है क्योंकि देश तो जनता स्वयं चला रही है। अगर अस्पताल में बेड नहीं है लोग घरों में अपना इलाज कर रहे हैं मरीजों को अगर एंबुलेंस नहीं है तो गाड़ियों में ऑटो में रिक्शा पर मरीजों को लाया और ले जाया जा रहा है दवा का बंदोबस्त कर रहे हैं। आक्सीजन का इंतेजाम कर रहे हैं। समाजसेवी संस्थाएं आकसीजन पहुंचा रही हैं लोग आक्सीजन का सिलेंडर लेकर के भरवा रहे हैं। इसमें से सरकार ने कौनसा इंतजाम किया? सरकार ने तो जो इंतजाम पहले से था उसको भी बंद कर दिया ओपीडी तक बंद कर दी। सामान्य मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह ठप कर दिया। आज हर इंसान मजदूर बन गया अपना काम खुद कर रहा है इसकी ताजा मिसाल आप देखिए कि इंसान अपने हाथ से गाड़ी ड्राइव करता हुआ हॉस्पिटल जाता है उसे वहां एडमिट कर लिया जाता है और 4 दिन के बाद पता चलता है कि वह वेंटिलेटर पर है या सीरियस है यह क्या हो रहा है?
    कोरोना की वैक्सीन पर चर्चा हो रही है एक तरफ कोरोना कि वैक्सीन का दावा किया जा रहा है दूसरी तरफ़ कहा जा रहा है कि कोरोना वैक्सीन प्रभावशाली नहीं है दो डोज देने के बाद भी लोग कोरोना संक्रमित हो रहे हैं ।कोरोना एक भूलभुलैया जैसा शब्द हो गया है जिसमें लोगों उलझ गए क्योंकि जब कोरोना की दवा नहीं है तो क्यों कोरोना के नाम पर इतनी महंगी महंगी इतनी ज्यादा पावरफुल दवाई लोगों को दी जा रही जिससे लोगों की जाने जा रही हैं। सरकारी तौर पर कोरोना की दवा सिर्फ वैक्सीन को बताया जा रहा है तो फिर अस्पतालों में यह तमाम तरीके के कोरोना के नाम पर नए-नए कैप्सूल्स जो 1000 और 2000mg के लोगों को क्यों दिए जा रहे हैं? इन्हीं दवाओं की वजह से ऑर्गन कोलैप्स होने के कारण इंसान मर रहा है।
    बहुत बड़ा सवाल पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोगों के सामने है जिस पर शायद किसी की नजर नहीं जा रही है या जा रही है तो ध्यान नहीं दिया कि सिर्फ और सिर्फ जनता कोविड-19 से त्रस्त नहीं है बल्कि इसके अलावा ब्लड प्रेशर, शुगर, ब्रेन समस्या, दर्द, हार्ट, लंग्स , एक्सीडेंटल केस, पैरालिसिस केस , डिलीवरी केस, टीबी, अनगिनत ऐसे रोग हैं जिनका इलाज नहीं हो रहा है।
    जाहिर सी बात है कि इलाज करने की जरूरत क्या है सब मजदूर हैं मजदूरों को इलाज की जरूरत नहीं है।
    जयहिंद।
    जय मजदूर दिवस

    सैय्यद एम अली तक़वी
    ब्यूरो चीफ दि रिवोल्यूशन न्यूज़

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