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सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक…
सन 1882 में विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार सर मैक्समूलर ‘ ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अपने भाषण में कहा था कि -हम इतिहास क्यों पढ़ते हैं ? केवल यह जानने के लिए कि हमारे पूर्वज कौन थे ? यानी वे भौतिक रूप से कौन थे ? कैसे थे.?.वे क्या सोचते थे ? क्या करते थे ? उनके धार्मिक आचार -विचार और विश्वास क्या थे ? मैक्समूलर महोदय की इतिहास की इस परिभाषा को ध्यान में रखते हुए हम यह कह सकते हैं कि भारत के प्राचीन काल पर लिखा इतिहास आर्य क्षत्रिय तथा ब्राह्मणों का इतिहास बनाकर लिखा गया है,उसके बाद का राजपूतों का इतिहास भी उच्च वर्ग का इतिहास ही कहा जा सकता है,तदुपरांत मुस्लिम सम्राटों ,नवाबों का और अन्त में अंग्रेज लार्डो का इतिहास लिखा गया,मगर इस देश के मूल आदिवासी शूद्र तथा वणिकों का , जिनकी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 85 प्रतिशत है का इतिहास कभी लिखा ही नहीं गया इस प्रकार यह पुस्तक शूद्रों ( वणिक ) की उत्पत्ति व इतिहास पर लिखी गई प्रथम विश्व विशुद्ध रचना कही जा सकती है.
सन् 1856 ई .में मुल्तान – लाहौर रेलवे लाइन के 100 मील के हिस्से के निर्माण का कार्य करने वाली अंग्रेज कम्पनी ठेकेदार जैम्स विलियम वर्टल ने , निर्माण के लिए मिट्टी तथा ईंटें आदि हड़प्पा के ही खण्डहरों से प्राप्त किये ,काम करने वाले अंग्रेज अधिकारियों ने पाया वहां मिली मद्राएं ( सीलें ) ऐसी हैं जो उससे पहले कहीं नहीं देखी गई आखिर भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के महानिर्देशक जॉन मार्शल के निर्देशन में सन् 1920 – 21 में दयाराम साहनी ने खुदाई का काम आरम्भ कराया,तब तक 1826 में मेसन तथा सन् 1831 में कर्नल वर्नस द्वारा वर्णित गढ़ी ‘ तथा सन् 1857 में जनरल कनिंघम ‘ द्वारा वर्णित बहुत -सी इमारतों का नामों -निशान भी शेष न बचा था,सारी ईंटें लूट ली गई थीं,सन् 1920 में भारत सरकार ने कानून बनाकर इस लूट पर रोक लगा दी.
हड़प्पा की प्रागैतिहासिक प्राचीनता का ज्ञान उस समय हुआ जब सन् 1922 में श्री राखलदास बनर्जी को मोहनजोदड़ो की खुदाई में इस शैली की वस्तुएं प्राप्त हुई तुलनात्मक समालोचना व अध्ययन ने सिद्ध कर दिया कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यताएं न केवल परस्पर समान और एक रूप थीं बल्कि इनका सुमेरियन सभ्यता से भी घनिष्ठ सम्बन्ध था,सन् 1926 से 1933 तक श्री माधोस्वरूप वत्स तथा काशीनाथ दीक्षित ने उत्खनन का काम कराया ,मैके महोदय ने भी इस महान कार्य में हाथ बंटाया अब तक पुरातत्वीय खुदाई ने सिन्धु -घाटी सभ्यता के क्षेत्र को बहुत ही विस्तृत प्रमाणित कर दिया है,यह पूर्व में सहारनपुर जिले में बहादुराबाद ,बुलन्दशहर में भाटपुर तथा मानपुर,बनारस जिले में इलाहाबाद के निकट कौसाम्बी तक फैली थी,दक्षिण पूर्व में सौराष्ट्र तथा गुजरात में सूरत तक फैली थी जहां साबरमती घाटी में लोथल के अवशेष मिले हैं तथा नर्मदा के किनारे मेहगांव ,रेसोड ,रोजाडी तथा यादर नदी पर अडकाट,
समुद्र के किनारे पर रंगपुर तथा सोमनाथ पत्तन मिले हैं,पश्चिम में मकरान के किनारे तथा सोनमियानी के निकट वालाकोट , पासनी के निकट सोनकाकोह तथा अरब सागर के किनारे सतकानजेनदोर ,उत्तर में रोपड़ से लेकर सारे सप्तसिन्धु प्रदेश में फैली थी,पुरातत्वविद् डॉ .एच . पी .फ्रेंक्फर्ट के अनुसार ‘ उन्हें अफगानिस्तान के उत्तर पश्चिमी आंचल में सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले हैं,वे अवशेष स्थल शुर्तगई कस्बा तरबर प्रान्त में स्थित हैं जो पाकिस्तानी सीमांत से लगभग 800 कि .मी .दूर है यहां हुई खुदाई में हड़प्पा काल के एक नगर के अवशेष मिले हैं.
उपलब्ध वस्तुएं 1500 -2500 ई .पू .की हैं,डॉ.फ्रेंक्फर्ट ने यह भी कहा है कि आधुनिक पाकिस्तान इस सभ्यता का केन्द्र बिन्दु था तथा भौगोलिक दृष्टि से यह मिस्री सभ्यता से चौगुनी बड़ी थी,इस प्रकार यह महान सभ्यता उत्तर में रूसी सीमांत से लेकर दक्षिण पूर्व में बम्बई तक फैली थी,’ खोदे गए स्थान में मुख्य हैं ” – अलीमुराद , अमरी ,वालाकोट ,चन्हुदाड़ो , डावरकोट ,डेरा -वार ,कोट – डिज्जियां ,गाजीशाह ,हड़प्पा , काली बंगा ,कोटला -निहंग , लोथल ,लोहड़ी ,मोहनजोदड़ो , रोपड़ ,सीखरी सोनकाकोह , सतकानजेनदौर ,थाना बुलीखान , त्रिखान वाला डेरा ,आलमगीर , कौशाम्बी आदि,अब तक भारतीय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर जे . पी .जोशी के अनुसार लगभग 500 स्थानों की खुदाई भारतीय क्षेत्र में हो चुकी है तथा उससे कुछ कम ही संख्या है पाकिस्तान के क्षेत्र में ( वहां से ठीक आंकडे प्राप्त नहीं हुए भूमि से 50 – 60 फुट तक ऊंचे मिट्टी के विशाल चबूतरों पर बसे अधिकतर शहरों की किलेबंदी ,नगर योजना , पक्के मकान ,सीधी एक दूसरी को समकोण पर काटती हुई सड़कें व गलियां ,ढकी हुई नालियां ‘ ( Sewerage System ) इंग्लिश प्रकार की सीट वाले शौचालय ,हर घर में स्नानघर व कुएं इस सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता थी,काली बंगा में प्राप्त स्नानघरों तथा कमरों में लगी टायल की शान ” , लोथल के बन्दरगाह में जल – नियन्त्रक व्यवस्था ( Water Locking System ) को देखकर दांतों तले उंगली दबानी पड़ती है,भारत में नगर -योजना , जल -निकास की आधुनिक व्यवस्था ( Sewerage System ) फ्लश व्यवस्था वाले शौचालयों का अभी कुछ बड़े शहरों को छोड़कर स्वतन्त्रता के बाद ही आरम्भ हुआ है,अभी तक छोटों की तो बात ही दूर ,बड़े – बड़े शहर भी ऐसी उत्तम वैज्ञानि क व्यवस्थाओं से रहित हैं,बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लगभग इसी प्रकार की सुविधाएं आज से 4 – 5 हजार वर्ष पूर्व सिन्धु देश के साधारण जन को भी उपलब्ध थीं ऋग्वेद के अनुसार वहां के निवासी बहुत ही ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीते थे,उनकी नारियां दूध से स्नान करती थीं,डी .डी .कौसम्बी लिखते हैं – ‘ इतने समय पूर्व इतना शहरी संगठन और शहरों में बुद्धिमत्तापूर्ण नगर योजना के उदाहरण और कहीं नहीं मिलते मिस्री शहर बनावट के हिसाब से फरोह राजाओं की पर्वत जैसी ऊंची समाधियों तथा मन्दिरों की तुलना में कुछ भी नहीं थे सुमेरियन ,अकाद तथा बेबीलोन के शहर भी लगभग सिन्धु -घाटी की तरह पक्की ईंटों के बने
थे,मगर वे नियोजित नहीं थे केवल विकसित हुए थे,( बाहरी दीवारें भद्दी थीं अधिकतर कच्ची ईंटों की थीं ),इससे साफ सिद्ध हो जाता है कि सिन्धु देश में केन्द्रीय सत्ता को साधारण शहरियों तथा जनता के हित का पूर्ण ध्यान था, सम्भवतः वहां की शासन व्यवस्था जनकल्याणकारी रही थी,अगर यह काम स्थानीय शहरी प्रबन्धक समितियों का होता तो कुछ ही शहरों तक ऐसी सुविधाएं सीमित रहतीं ,शत -प्रतिशत शहरों तक नहीं-
सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक-8-9-10.
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सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक–
साक्ष्यों और इतिहासकारों के अनुसार सिंधुघाटी सभ्यता दुनिया की तीन प्राचीनतम सभ्यताओं मिश्र के पिरामिड तथा मेसोपोटामिया तकनीक से उच्चतम तकनीक से लैस है,सिंधुघाटी सभ्यता की जीवनशैली के आगे मिश्र की विशाल मूर्तियां और मेसोपोटामिया की सभ्यता कुछ भी नहीं है,अतः कहा जा सकता है कि सिंधुघाटी सभ्यता दुनिया की तीन प्राचीनतम सभ्यताओं में सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च थी और सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता श्रेष्ठ और महान थे,अब इस सभ्यता के विनाश के लिये उत्तरदायी ठहराए जाने वाले नार्डिक आर्यों की सभ्यता के स्तर की बात लेते हैं,रेप्सन व इजाक टेलर के अनुसार नार्डिग आर्य अर्ध -सश्य बर्बर गडरिये थे,वे देहातों में घास -फूस की बनी झोंपड़ियों में निवास करते थे उनकी भाषा में ईंट के लिए कोई शब्द न था,वे अर्ध -नग्न रहते थे या पशुओं की खाल पहनते थे शत्रुओं की खोपड़ियों का प्रयोग पानी पीने के लिए करते थे,पिगट के शब्दों में ,इन्हीं आर्य भाषाएं बोलने वाले नार्डिक लोगों ने हमला करके सिन्धु -घाटी की महान सभ्यता को उजाड़ कर रख दिया ,शहरों को आग लगा दी , पुरुषों की हत्या कर दी,इस प्रकार सिन्धु घाटी सभ्यता पर आर्यों की विजय को एक महान सभ्यता पर असभ्यों की विजय कहा जा सकता है,इस प्रकार नार्डिक आर्यों ने सिन्धु देश के निवासियों के वध के बाद उनके शेष बचे बीबी -बच्चों को अपना गुलाम बना लिया और उनसे गुलामी के घरेलू काम कराने लगे,आज भी उनमें से अधिकतर शूद्र सेवकों के रूप में अपने आर्य स्वामियों के वही काम कर रहे हैं ,जैसे – झाडू लगाना ,चौका -बर्तन करना आदि – आदि,अन्तर केवल इतना है कि वर्ण -व्यवस्था का सृजन कर उन्हें शूद्र घोषित कर दिया गया है और उनकी उत्पत्ति को ईश्वरीय बतला दिया गया है,आज भी उपनिवेशवादी विचार का बुद्धिजीवी वर्ग उसकी उक्त ऐतिहासिक महान उत्पत्ति पर पर्दापोशी कर रहा है ,और इस ऐतिहासिक बर्बर सत्य की स्थापना के रास्ते में विघ्न खड़े कर रहा है.
शूद्रों की उत्पत्ति सम्बन्धी खोज पर सर्वप्रथम शूद्रों के महान नेता डॉ.अम्बेडकर ने कलम उठाई थी उन्होंने अपनी रचना Who were the Sudras ? सन् 1947 में लिखी जिसमें उन्होंने प्रमाणित किया है कि शूद्रों की उत्पत्ति आर्य क्षत्रियों के उस सूर्यवंशी वर्ग में से हुई जिनका वैमनस्य के कारण ब्राह्मणों ने उपनयन संस्कार करने से मनाही कर दी थी,जिसका वर्णन महाभारत के शान्ति पर्व ( बारह – 60 , 38 – 40 ) में आया है,मेरा विचार है जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि शूद्रों की उत्पत्ति क्षत्रियों से ही हुई मगर वे क्षत्रिय आर्य नहीं अनार्य थे,वे सिन्ध -घाटी के वीर शासक आयुध जीवी वर्ग की सन्तान महान हड़प्पाई थे,पूर्व पाषाण युग के अंत पर ,ईसा पूर्व 10 ,000 वर्ष के लगभग असभ्य मनुष्य के मस्तिष्क में विचित्र विकास हुआ और उसने नवीन पाषाण युग में प्रवेश किया,इस युग के शस्त्रोपकरण पहले से अच्छे , सुघड़ ,घुटे हुए तथा चमकदार थे इस समय से लेकर सभ्यता के राजपथ पर कदम पड़ते ही वह तीव्र गति से उन्नति करने लगा ई . पू .छठी सहस्राब्दी के मध्य में इसने कषि करना सीखा और अस्थिर शिकारी जीवन को त्याग कर स्थायी ग्राम्य जीवन को अपनाया,कृषि के साथ ही उसने पशु -पालन तथा मिट्टी के बर्तन भी बनाना सीख लिया,कृषि की प्रगति के परिणामस्वरूप मनुष्य की आबादी बढ़ने लगी,उन स्थानों में जहां तांबे की खानें थीं ,मनुष्य ने धातु -मिश्रित पत्थरों को पिघला कर कर उनसे तांबा निकालना आरंभ कर दिया,इस प्रकार ताम्रयुग का प्रारंभ ई .पू . पंचम सहस्राब्दी के लगभग हआ यद्यपि तांबे के हथियार पत्थर के हथियारों से बहुत उत्तम थे फिर भी मानव ने पत्थर के हथियारों का प्रयोग एकदम नहीं छोड़ा, ताम्रयुग का यह प्रारम्भिक काल पुरातत्ववेत्ताओं में ‘ ताम्र प्रस्तर युग ‘ के नाम से जाना जाता है ‘ सिन्धु सभ्यता ‘ इसी युग के परिवार की सभ्यताओं में से एक है,इस युग की तीन प्राचीनतम सभ्यताओं में दजला फरात के किनारे मेसोपोटामिया ( अल उवेद ) ,नील के किनारे मिस्र ( गार्जियन ) तथा सिन्धु के किनारे हडप्पा ने जन्म लिया और खूब फली – फूलीं.
सिन्धु घाटी सभ्यता लगभग सम्पूर्ण पश्चिमोत्तर भारत में फैली थी जिसमें आज का सम्पूर्ण पाकिस्तान ,पंजाब ,हरियाणा , राजस्थान का कुछ भाग ,गुजरात तथा उत्तर प्रदेश का बहुत सा भाग आ जाता है, यह क्षेत्र मिस्र के क्षेत्र से लगभग चार गुना , मेसोपोटामिया तथा मिश्र के क्षेत्र को मिलाकर दुगने से भी बहुत बड़ा था,इसके अन्य बहुत से शहरों के अतिरिक्त मुख्य शहर मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा शहर सिन्धु तथा उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे थे अतः इसे ‘ सिन्धु सभ्यता ‘ के नाम से पुकारते हैं,हड़प्पा लाहोर के दक्षिण -पश्चिम में रावी नदी के किनारे बसा था तथा मोहनजोदड़ो करांची के उत्तर में सिन्ध के किनारे पर,मोहनजोदड़ो जिसका शब्दार्थ ‘ मुर्दो का टीला ‘ है सिन्धु के लरकाना जिले में करांची -दादू रेलवे लाइन पर डोकरी स्टेशन से सात मील की दूरी पर स्थित है,खण्डहर में कई टीले हैं,इनमें सबसे ऊंचा टीला जिसे ‘ स्तूप टीला ‘ नाम से निर्दिष्ट किया गया है 70 फुट ऊंचा होने के कारण दर्शक को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है शेष टीले इसके पूर्व में हैं और इनकी ऊंचाई आस -पास के खेतों से 40 – 50 फुट तक ऊपर उठी हुई है,टीलों से घिरा हुआ क्षेत्र 240 एकड़ के लगभग है ,परंतु इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन काल में नगर टीलों की आधुनिक सीमाओं के बाहर भी बहुत दूर तक फैला था,स्तूप टीला नगर का राजगढ़ था जिसके चारों तरफ प्रकोटा ( दुर्ग ) था जिसमें देश का सबसे बड़ा शासक निवास करता था,यहीं पर बड़ा स्नानघर तथा खम्भों पर टिका बड़ा सभागृह भी है,शेष पूर्व दिशा का टीला शहर की मुख्य आबादी का भाग था जिसमें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक मुख्य सड़कों तक गलियों का जाल बिछा था,इसके पूर्व दिशा में सिन्धु नदी बहती थी जो आज तीन मील पूर्व में है,
हड़प्पा के खण्डहर पाकिस्तान के जिला मिंटगुमरी में 15 मील दक्षिण -पश्चिम में फैले हैं,आज भी यहां इसी नाम का बड़ा गांव है सारा टीला तीन मील के घेरे में फैला है,एक टीला जो पश्चिम दिशा में स्थित है ,शहर का दुर्ग था जिसमें शासक निवास करता था यह उत्तर से दक्षिण में 460 गज लंबे तथा पूर्व – पश्चिम में 215 गज क्षेत्र में फैला है,इसके पूर्व में स्थित नगर की मुख्य आबादी थी जिसके उत्तर भाग में कभी रावी नदी बहती थी जो आज 6 मील उत्तर में बहती है.
इसी प्रकार काली बंगा के जिसे मि घोष ने सन 1985 तलाश किया था जो हनुमानगढ़ के निकट घग्घर नदी के सूखे पाट के बाएं किनारे पर स्थित है ,भी दो टीले हैं,पश्चिम का टीला दुर्ग था तथा पूर्व का टीला शहरियों का निवास स्थान था, मुख्य शहर भी एक ऊंची दीवार से घिरा हुआ था इसी प्रकार कोट -डिज्जी . सत्तकाजेनदोर के अपने -अपने दुर्ग थे ,लोथल-यह साबरमती की घाटी में अहमदाबाद से 80 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है आज यह समुद्र से बहुत दूर है मगर हड़प्पा युग में यह कैम्बे की खाड़ी से केवल 5 कि.मी. दूर था और साबरमती तथा भोगवा नदियों का बहाव इसके निकट से था,जबकि हडप्या तथा मोहनजोदड़ो के दो -दो टीले थे लोथल का टीला केवल एक ही था जो मध्य में एक बड़ा चबूतरा बनाता है तथा दक्षिण से उत्तर को इसका ढलाव है इसका दक्षिण – पूर्वी भाग जो कि शेष भाग से ऊंचा है शेष नीचे कस्बे की अपेक्षा उच्च दुर्ग -सा लगता है,पश्चिम की तरफ धसान नदी का पाट था तथा उत्तर की तरफ धसान नहर थी जिससे होकर पानी बन्दरगाह में जाता था,चन्हुदाड़ो – इसके खण्डहर मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण -पूर्व में सिन्ध के नवाब -शाहा जिले में विद्यमान हैं यह नौ एकड़ भूमि में फैला है और इसके तीन टीले हैं,परन्तु आरम्भ में यह नगर इन सीमाओं से बाहर भी फैला था,इस स्थान की उपलब्धि सन् 1931 के फरवरी महीने में श्री ननीगोपाल मजूमदार को हुई,पहला टीला सबसे बड़ा है,इसकी परिधि 10601 फुट और ऊंचाई 28 फूट के लगभग है,इसके पश्चिमोत्तर में दूसरा टीला है जो सबसे छोटा है – परिधि 450 फुट व ऊंचाई 13 फुट है,तीसरा टीला सबसे दक्षिण -पश्चिम दिशा में स्थित है तथा 150 फुट के अन्तर पर है यह 950 फुट की परिधि में फैला है , ऊंचाई 22 फूट है,तीनों टीले एक ही समय के हैं और आरम्भ में एक ही बड़े टीले के आकार में व्याप्त थे,उत्तर काल में सिन्धु नदी की प्रचण्ड बाढ़ों के कारण इनमें दरारें पड़ गईं और एक के तीन टीले दिखाई देने लगे यह मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा से बहुत छोटा था ,मगर यह नाना प्रकार की शिल्पकलाओं का केन्द्र था ,जैसे – पत्थर के मनके , मुद्राएं ,बाट तथा हड्डी शंख ,हाथी दांत की बहुत -सी वस्तुएं यहां बनती थीं,अब सिन्धु नदी 28 मील दूर बहती है जो कभी इसके निकट से बहती थी–क्रमशः…
सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक-11-18-19-20.
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सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक-
सिंधुघाटी सभ्यता की नगरीय योजना–
नगर योजना : सडकें व गलियां तथा जल निकास की व्यवस्था । सिन्धु – घाटी के शहरों की नालियां तथा पंक्तिबद्ध एक ही प्रकार के सुन्दर मकानों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि ये किसी पूर्व योजना के अधीन बनाये गए थे और लगभग सभी शहर मानव -निर्मित ऊंचे चबूतरों पर बसे थे यहां हम मोहनजोदड़ो की नगर योजना को लेते हैं कुछ अपवादों को छोड़कर यहां पर गलियां सीधी हैं और एक -दूसरे से समकोण पर मिलती हैं,छोटी – मोटी कमियों के उपरान्त यह स्पष्ट प्रकट ,है कि किसी बड़ी सत्ता के अधीन नगर का विकास हुआ है ताकि कहीं कोई टेढ़ा -मेंढ़ा निर्माण न हो सके, मोहनजोदड़ो की सभी गलियां उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को बनी हुई हैं इतनी सीधी कि पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली हवाएं उस दिशा में बनी गलियों का कूड़ा -करकट शहर से बाहर उड़ा कर ले जाती थीं और उसी प्रकार उत्तर से दक्षिण की ओर चलने वाली हवाएं उस दिशा में बनी गलियों को साफ कर देती थीं,हालांकि यह कहा नहीं जा सकता,कि नगर योजना बनाने वालों ने ऐसा जानबूझ कर किया था या स्वतः ही बन गया था,ऐसा ही बेबीलोन के बाद के कुछ शहरों में देखा गया है,शहर की कुछ मुख्य गलियां या सड़कें बहत बड़ी थीं पहली गली जो लगभग 33 फुट चौड़ी है और शायद एक खास राजमार्ग रहा होगा,बाकी नगर के बीच की गलियों की चौड़ाई 18 फुट तक होती थी,बहुत ही आश्चर्य की बात है कि हजारों वर्ष की वर्षा ,पानी और तूफान के उपरान्त भी शहर की चौड़ी गलियों के दोनों ओर अब तक 18 फुट की ऊंची पक्की दीवारें उपस्थित है,जबकि संकरी गलियों में अब भी उनकी ऊंचाई 25 फूट तक है और अभी भी इनकी नींव बहुत नीचे तक मिट्टी में दबी है छोटी गलियों के मोड़ों पर आने – जाने वाले पशुओं अथवा आदमियों के कपड़े आदि के घिसे जाने की रगड़ के चिह्न अब तक मौजूद हैं,कुछ मोड़ों पर लगी ईंटों को जानबूझ कर गोल कर दिया था, ताकि आने -जाने वालों को उनके कोने न चुभें ,ऐसा ही प्रयोग उर में भी देखा गया है.
जल निकास व्यवस्था -जल निकासी के लिए नगर में भूमिगत नालियों का जाल बिछा था -हर गली में पक्की नालियां थीं,और बड़ी नालियों में छोटी नालियां आकर मिलती थीं,नालियां ईंटों से ढकी होती थीं जिन्हें देखभाल के लिए मिट्टी उतार कर उठाया जा सकता था ,बड़ी -बड़ी नालियां भी बनी थीं जिन्हें बड़े -बड़े चूने के पत्थरों से ढका हुआ होता था, आज की तरह जगह – जगह पर मेन -होल बनाये होते थे जो ईंटों को काट कर इतने अच्छे ढंग से बनाये गए थे कि उनके जोड़ का आज भी पता नहीं चल पाता जिनमें अन्दर प्रवेश करने की सीढ़ियां लगी होती थीं जिनके द्वारा सफाई के लिए अथवा जांच -पड़ताल के लिए अन्दर जाया जा सकता था,इनकी समय -समय पर सफाई की जाती थी,जहां भी कहीं ऊंचे स्थान से आकर नाली मिलती थी वहीं पक्की ईंटों का गड्ढा बना दिया जाता था ताकि पानी उछल कर बाहर न जा सके अब से कुछ समय पूर्व भारत के किसी शहर को ये सुविधाएं प्राप्त न थीं,जितनी सिंधुघाटी सभ्यता में यह सुविधा व्यवस्थित थी,अभी आज भी कितने ही शहरों को ऐसी वैज्ञानिक सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं.
भवन -निर्माण कला – शहर के मकान ‘ कई -कई मंजिलों के बने थे तथा महल समान थे,ईंटों की लम्बाई ,चौड़ाई से दो गुनी तथा मोटाई आधी होती थी,उनका अधिकतर माप 10 .25x5x2 . 25 इंच तथा 20 . 5×8 . 5×2 . 25 इंच है,नालियों को ढकने के लिए गड़ी ईंटें अच्छी प्रकार अर्थात लाल रंग की पकी हुई हैं और उन्हें सम्भवत शहर से दूर बन्द भट्टों में लकड़ी जलाकर , धुआं निकलने की चिमनी लगाकर ,ऐसे ही पकाया जाता था जैसा कि आज भी भारत में पकाई जाती हैं,कुओं में प्रयोग के लिए ऐसी ईंटें भी बनाई जाती थीं जो एक ओर कम तथा दूसरी ओर अधिक चौड़ी होती थीं,उनका प्रयोग मेहराब बनाने के लिए कहीं भी नहीं हुआ,कारवैल प्रकार के मेहराबों का प्रयोग ही हुआ है स्नानघर आदि के फर्शों को पक्का करने के लिए ईटों को काटकर छोटा कर लिया जाता था वे इस प्रकार सटा कर फंसाई जाती थीं कि उनमें से पानी का आर -पार होना भी असम्भव था कहीं -कहीं तो उनके जोड़ तक का भी पता नहीं चलता है,
मकानों की बनावट सुन्दर थी , एक जैसी थी और मूलतः 200×400 गज के ब्लाकों में बने थे,घरों के फर्श का माप लगभग 27×30 फुट होता था, एक बड़े घर का इससे दूना माप था,घरों की दो दीवारों के मध्य एक दो फुट का स्थान रखा जाता था और वे पतली गलियां एक ओर बन्द कर दी जाती थीं,दीवारों की मोटाई प्रकट करती है कि वे बहुमंजिला होती थीं तथा कुछ दीवारों में ऊपर की मंजिल को मजबूत बनाने के लिए मोटी – मोटी कड़ियां डालने के लिए बड़े -बड़े खाली स्थान अब भी बने हैं ऊपर जाने के लिए लकड़ियों की सीढ़ियां बनी होने के चिह्न अब भी मौजूद हैं ,बरसाती पानी के नीचे बहने के लिए मिट्टी के पके हुए पाइप आज भी देखे जा सकते हैं,सम्भवतः लकड़ी के परनालों का प्रयोग भी होता था दरवाजों की जांच -पड़ताल से यह पता नहीं लगाया जा सकता कि वे कैसे बन्द किए जाते थे,शायद लकड़ी के चौखटे में किवाड़ चढ़ाए जाते होंगे,शहर में न तो कहीं मेहराब मिला है न गोल स्तम्भ हां ,चौकोर स्तम्भों का प्रयोग अवश्य हुआ है जबकि उन्हीं दिनों में सुमेर में गोल स्तम्भों का प्रयोग हुआ है.
हर घर में रसोई -घर होता था जहां कि लकड़ी के टांड़ पर ईंधन रखा जाता था, एक बड़े घर में ऊंचे बने हुए फर्श पर ईंटों का चूल्हा बना हुआ है जिसमें लकड़ी जलाई जाती थी,एक स्थान पर तंदूर प्राप्त हुआ है जिसमें लकड़ी की आग जला कर आज के पंजाब की तरह रोटी पकाई जाती थी,बूली महोदय के अनुसार ऐसे ही तंदूरों का प्रयोग उन्हीं दिनों में मेसोपोटामिया में भी हुआ है प्रत्येक घर में स्नानघर होता था उनके फर्श पक्के और ढलावदार हैं जिनका पानी मिट्टी के पक्के पाइप द्वारा बाहर गली की नाली में चला जाता था,मोहनजोदड़ो के दुर्ग में सबसे मुख्य स्थान बड़ा स्नानघर है जो सम्पूर्ण पक्की ईटों का बना है,39 फुट 3 इंच लम्बा तथा 23 फुट 2 इंच चौड़ा है,बाहरी इलाकों में स्नानागार के रूप में तालाबों का इस्तेमाल होता था,स्नान के तालाब में किसी भी ओर से सीढ़ियों के रास्ते से उतरा जा सकता था,जब तालाब को खाली किया गया तो दक्षिण -पश्चिम के कोने में एक चौकोर सुराख से पानी निकलने लगा,पश्चिम दिशा में एक और नाली थी जिसके द्वारा इसे साफ किया जाता था,तालाब के पूर्व में एक बड़े कमर में बड़ा कुआं था जिससे सम्भवतः तालाब को भरा जाता था,इसके उत्तर में आठ स्नानघर और हैं,प्रत्येक कमरे को बहुत सावधानी से पक्का किया गया था,प्रत्येक में ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियों का रास्ता था जो अब नहीं है,सम्भवतः यह वृहद् स्नानघर हड़प्पाइयों के किसी धार्मिक स्थान के रिवाज को पूरा करता होगा.
अनाज गोदाम – मोहनजोदड़ो के दुर्ग भाग में बड़े स्नानघर के निकट विशाल अनाज गोदाम , जिसका नाप 163×134 फुट है , बना हुआ था,ठीक उसी प्रकार हड़प्पा में ऐसा गोदाम दुर्ग के बाहर चबूतरे पर उत्तर दिशा में मिला है जो कि नदी के पाट की ओर स्थित था,प्रत्यक्षतः यह स्थान अनाज को नावों द्वारा लाने ले जाने के विचार से बना होगा ऐसे ही गोदाम लोथल में भी मिलते हैं.
रहन-सहन व पहनावा – पत्थर की वह अर्धमूर्ति जिसकी मूंछे तो सफाचट हैं मगर दाढ़ी है ,जो सुमेरियन प्रकार का पुरोहित है , कढ़ा हुआ अथवा रंगा हुआ साल दाएं कंधे से बाएं को ओढ़े हुए है इसी प्रकार एक अन्य मूर्ति को देखने से लगता है वह अंगरखा पहने है ” बड़ी ही विलक्षण बात है कि सुखी जीवन की हर प्रकार की सुविधाओं ,धन -सम्पदा ,कपास तथा कपड़े के आविष्कार के उपरान्त भी सिन्धु देश के लोग कमर में एक कपड़े के अतिरिक्त अधिकतर नंगे ही रहते थे,इसका कारण प्रदेश की गर्म जलवायु भी हो सकती है,अन्यथा अमीर तथा उच्च कोटि के लोग हर प्रकार की सुविधाओं से भरपूर सुखी जीवन जीते थे और उत्तम कोटि के सुन्दर वस्त्र पहनते थे,नारियां आज की दक्षिण भारत की नारियों की तरह स्कर्ट पहनती थीं–क्रमशः—
सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक-20-21-22-23-24.
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सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक–
शृंगार -सिंधुघाटी सभ्यता से प्राप्त एक बड़ी मूर्ति से स्पष्ट प्रकट है कि उनके घुघराले लम्बे -लम्बे बाल कंधे पर फैले हुए हैं,इसी प्रकार एक टूटी हुई मूर्ति जो स्टीटाइट की बनी है के बाल भी ठीक इसी प्रकार कंधे पर झूलते दिखाई देते पड़ते हैं,इसी प्रकार कांसे की बनी नर्तकी के बालों के गुच्छे गर्दन तक आते हैं,इसी प्रकार एक ताबीज पर बनी देवी की आकृति के सिर में प्लेट ( क्लिप ) बंधी है,और उसके सिर के बाल आज की भारतीय नारी की तरह बंधे हुए हैं.
बनाव भंगार की सज्जा व सामान – एक बहुत सुन्दर हाथी दांत की बड़ी कंघी प्राप्त हुई है जिसके दोनों ओर दांते हैं ,दोनों ओर सजी हुई है तथा नवयुवती की खोपड़ी के निकट पडी हुई मिली है जिससे स्पष्ट प्रकट है कि मरते समय उसके केशों में सजी हुई थी एक अन्य V आकृति की कंघी मिली है जो सम्भवतः बड़े -बड़े बालों को कंघी करने के काम में आती थी,इसी प्रकार पीतल , कांसा ,स्टीटाइट व फियास के बने बटन प्राप्त हुए हैं,तीन छोटे आकार के शीशे जो सम्भवतः बच्चों के लिए हैं पीतल के बने हैं जिनके लकड़ी के हत्थे हैं ,उनमें से एक के चारों ओर के किनारे अन्दर की ओर मुड़े हैं ताकि पालिश खराब न हो जाये मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक छोटे सन्दूक ( वैनिटी बाक्स ) में पाउडर जैसी एक वस्तु,तांबे की सुरमा डालने की सलाई तथा तांबे की कंघी मिली है,इसी प्रकार सुरमेदानियां भी मिली हैं जिनकी सहायता से सुन्दरियां अपने सुन्दर नयनों को सजाती थीं,उसी प्रकार चेहरे पर सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग कर अपनी सुन्दरता को निखारती तथा ओष्ठरंजक ( लिपिस्टिक)से अपने होठों की सुर्खी बढ़ाती थीं,ऐसे ही मर्द तथा नारियां दोनों ही बेशकीमती तथा सुन्दर विभिन्न प्रकार के गहनों से अपने आपको सजाते थे,जिनमें सोना ,चांदी ,शंख ,
सीप तथा विभिन्न प्रकार के कीमती पत्थरों के गहने शामिल हैं जिन्हें देखकर एक बार जॉन मार्शल के उद्गार इन शब्दों में फूट पड़े थे – “ ये गहने इतने सुन्दर हैं कि ऐसा लगता है कि 5 हजार साल प्राचीन नगरों के अवशेषों से नहीं ,न्यूयार्क की किसी फैशनेबल दुकान से अभी प्राप्त हुए हैं.
लोथल तथा अन्य हड़प्पाई शहरों में अमीर तथा गरीब एक ही स्थान पर और इकट्ठे रहते थे,जो स्पष्टतया वहां के महान समाज के सामाजिक समानता के सद्गुण को प्रकट करता है हां ,वहां शासक तथा शासित वर्ग में स्पष्ट अन्तर पाया गया है,शासक वर्ग तथा उनका परिवार शानदार महलों के समान बने विशाल भवनों में निवास करते थे जिन्हें जीवन की अधिक से अधिक सुविधाएं प्राप्त थीं, मगर यह अन्तर मिस्र और मेसोपोटामिया की अपेक्षा कुछ भी नहीं था जहां शासक वर्ग के सुख और शान के लिए भारी पत्थरों के विशाल महल और पर्वतों जैसे ऊंचे पिरामिडों के निर्माण में गुलामों की विशाल फौजों का प्रयोग पशुओं की तरह हुआ ,जो बैरकों में निवास करते थे शासक वर्ग के अतिरिक्त अन्य सभी जिनमें धनिक व्यापारी ,गरीब कारीगर तथा शिल्पी शामिल थे बिना किसी अलगाव के इकट्ठे ही नीचे शहर में रहते थे, यह इस बात से भी प्रमाणित हो जाता है कि दो – तीन कमरों के मकान जो ठठेरों व शंख का काम करने वाले शिल्पियों के हैं,अमीर व्यापारियों के शानदार मकानों के साथ – साथ बाजार की गली में उस काल में बने हैं जब लोथल शहर सबसे अधिक सुख और समृद्धि का जीवन जी रहा था,यहां किसी भाग ( Phase ) में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि यह समझा जा सके कि वहां गरीब शहरियों की जनसंख्या ,जिसका सम्बन्ध चमकीले लाल रंग की कुम्भ – कला से है ,समाज में व्यापारियों तथा तकनीशियनों की अपेक्षा निम्न – स्तर प्राप्त थी “.
जाति-पांति विहीन धर्म -निरपेक्ष समाज – हम देख चुके हैं कि न तो यहां लोगों की जिन्दगी धर्म द्वारा ही शासित थी न कोई पुरोहित राज्य -सत्ता थी जैसा कि मेसोपोटामिया में था और न ही ईश्वरीय राजे थे जैसा कि मिस्र में थे,राज्यों तथा शहरों पर न एक धर्म को मानने वाली शासक – शक्ति का राज्य था न ऐसी किसी केन्द्रीय सत्ता का संकेत है,उस समाज को हम न तो जाति व्यवस्था पर आधारित ही कह सकते हैं और न वर्ण – व्यवस्था ही यहां पर थी,सैनिक वर्ग की उत्पत्ति हम इस आधार पर मानते हैं कि दुर्ग के मध्य में सैनिकों के लिए बैरकें बनी हुई थीं,मगर यह कोई ऐसा पक्का प्रमाण नहीं जो हम कह सकें कि यहां पर आपात काल के लिए सैनिक रहते थे दूसरी तरफ हड़प्पा में मिले क्वाटरों में ठठेरे रहते थे.
जैसा कि मनके बनाने वाले लोथल में रहते थे , इसके अतिरिक्त हम कह सकते हैं कि श्रमिक जिनका उपयोग राजा अथवा शहर की प्रबन्धक समिति करती थी,इन बैरकों में रहते थे जिनका इतने बड़े नियोजित शहर का प्रबन्ध स्वच्छता आदि काम चलाने को अत्याशि आवश्यकता रही होगी,अगर हम उन्हें सैनिक बैरक मान लें तो हमें आश्चर्य होगा कि घरों की दो कतारों में इतनी बड़ी सैनिक शक्ति जो मोहनजोदड़ो जितने बड़े शहर की सुरक्षा की लिए काफी हो ,कैसे समाती होगी.
धार्मिक आचार विचार -सिन्धु घाटी निवासी शक्ति -माता , पशुपतिनाथ तथा बल नाम के देवताओं की पूजा करते थे जिनका विस्तृत वर्णन हम आगे अध्याय में करेंगे ,सर जॉन मार्शल का विचार है कि आज भारत के बहुत से रिवाज बहुत पूर्व युग के हैं सम्भवतः तब के हैं जब मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा के पूर्व निवास -गृह पक्की ईंटों के भी नहीं बनाये गए थे,शक्ति – माता की पूजा उदाहरण के रूप में एक बहुत पुराना रिवाज है और यहां हड़प्पा सभ्यता से पहले ही मौजूद थी,इनमें से एक रिवाज वृक्षों की पूजा का है जो हड़प्पाइयों में पीपल पूजा के रूप में प्रत्यक्ष दिखाई देता है,पशुओं की पूजा आज भी पुरानी जनजातियों में चली आ रही है दूसरी तरफ सींग वाली मानव मूर्ति भारतीय कहानियों में आज भी कहीं न कहीं दृष्टिगोचर हो जाती है ,सम्भवतः हडप्पाइयों की ही देन है और उन्हीं के साथ समाप्त भी हो गई,जहां तक आत्म ज्ञान का सम्बन्ध है भारतीय प्रायद्वीप हड़प्पाइयों का बहुत बड़ा ऋणी है आज भी उनके द्वारा दिया गया ज्ञान सारे समाज में व्याप्त है – योग विद्या अस्ति -माता की पूजा , पशु – प्रेम जो शिव तथा प्रजापति की पूजा है आदि सभी इस देश को सिन्ध सभ्यता की देन है .
लोथल में अग्नि पूजा के प्रमाण प्राप्त हुए हैं सम्भवतः आहिस्ता – आहिस्ता अग्नि पूजा ‘ के रिवाज का विस्तार हो रहा था वहां ततीय काल में सार्वजनिक रूप में अग्नि कंडों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जबकि इससे पहले नीचे के कस्बों में घरों में ही अग्नि पूजा होती थी लोथल में सम्भवतः निवासियों का एक वर्ग पशुओं की बलि भी देता था,नाग पूजा का रिवाज भी खूब था अतः यह कह देना अतिशयोक्ति न होगी कि हिन्दू धर्म का विशाल भवन सिन्धु – घाटी के धर्म की नींव पर खड़ा है —क्रमशः….
सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक- 24-25-26.
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सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक-
मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में विशाल आबादी वाले विशाल शहरों को मध्यम वर्ग की व्यावसायिक ,उद्योग -धन्धे तथा खेती पर आधारित आर्थिक व्यवस्था की आवश्यकता के प्रमाण मिले हैं,हड़प्पाई शहरों में हालांकि खेती के औजारों का कोई अवशेष नहीं प्राप्त हुआ है,
सम्भवतः लकड़ी के हलों का प्रयोग होता था,लोथल में प्राप्त एक टेराकोटा की सील पर बीज बोने का यन्त्र ( Seed drill ) दिखाई देता है,शहरों के अवशेषों में मटर व खरबूजे के बीज प्राप्त हुए हैं ,मोहनजोदड़ो में खजूर की गुठलियां मिली हैं,खुदाई से प्राप्त बर्तनों पर खजूर ,नारियल के चित्र भी मिले हैं,अन्य वृक्षों में केला सारे दक्षिण एशिया का फल माना जाता है,सबसे अधिक रोचक बात सूती कपड़े के होने के चिह्न प्राप्त होना है,इसमें से एक उदाहरण लोथल में प्राप्त हुआ है जिसके यहां बहुत पूर्व काल में होने का आभास होता है,जहां तक पशुओं का सम्बन्ध है सिन्धु -घाटी में कोहान वाले पशु ,भैंसा तथा सम्भवतः सूअर भी था जिसकी हड्डियां प्राप्त हुई हैं,शायद वे ऊंट , घोड़ा ,गधा तथा हाथी भी पालते थे,जंगली पशुओं में भारतीय जंगली भैंसा ,गैंडा ,चीता ,रीछ , सांभर ,चितकबरा -हिरन तथा बारहसिंघा होने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं,घरेलू पशुओं में बिल्ली का , जो कि अन्न चट कर जाने वाले चूहों को पकड़ने में बहुत उपयोगी है ,एक ईंट पर पंजे का निशान प्राप्त हुआ है,वास्तव में जब ईंट ढलने ( पथने ) के तुरन्त बाद धूप में सूखने को डाली गई होगी तो कुत्ते द्वारा पीछा करने पर उस ईंट से होकर दौड़ी होगी,बिल्ली के बाद कुत्ते के पंजे के चिह्न हैं और चिन्ह ऐसे हैं कि दोनों पशुओं के दौड़ने को प्रमाणित करते हैं । आज भी इस प्रदेश में लगभग इसी प्रकार के घरेलू व पालतू पशु मिलते हैं जबकि कुछ जंगली पशु मौसम के खुश्क हो जाने के कारण अन्य भागों में जा बसे हैं.
मूर्ति कला में भी उस युग में सिन्धु -घाटी का कोई सानी नहीं था भले ही मेसोपोटामिया में मूर्तियां बनी हैं तथा मिस्र में तो वे इतनी विशाल ( 80 – 90 फुट ) ऊंची हैं कि चकित होकर रह जाना पड़ता है,अधिकतर वे मूर्तियां पत्थर की हैं मगर मोहनजोदड़ो के भाग से जो साढ़े चार इंच ऊंची पीतल की ढली हुई नाचती हुई लड़की की मूर्ति प्राप्त हुई है ,भाव -भंगिमा के विचार से उसकी बराबरी उस पुरातन युग में कहीं भी नहीं और उसे एक बहुत उच्च कोटि की कला कहा जा सकता है,इसी प्रकार पत्थर की दाढ़ी वाली शिरोमूर्ति ,एक स्टीटाइट की बनी हुई टूटी 7 इंच की मूर्ति मोहनजोदड़ो के भाग में 6 फुट 7 इंच की गहराई से प्राप्त हुई है,इसी तरह और टूटी -फूटी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं,खड़िया मिट्टी के 11 .5 इंच ऊंची मानव मूर्ति प्राप्त हुई है जिस पर सम्भवतः पतले कपड़े के लिपटे होने के चिह्न हैं,ऊपर कंधे से नीचे तक शाल ओढ़ने के चिह्न हैं,ऐसे ही मद्राओं पर विभिन्न प्रकार के पशुओं तथा वृक्षों के चित्र खुदे हैं और लगभग हर स्थान से काफी मात्रा में प्राप्त हुए हैं,उसी प्रकार मिट्टी के बर्तनों पर बने चित्रों की कमी नहीं है,मिट्टी तथा धातु के बर्तनों के ढेर प्राप्त हुए हैं मिट्टी की बनी मोमबत्ती से पता लगता है कि हड़प्पाई लोग धातु की ढलाई के अतिरिक्त मोम को ढाल कर मोमबत्तियां भी बनाते थे जिससे अपने घरों को प्रकाशित करते थे सम्भवतः मिट्टी के तेल के दीयों से ,गलियों से लगे प्रकाश स्तम्भों पर रखकर गलियों को प्रकाशित किया जाता था,इतने पूर्व युग में मोमबत्ती का प्रयोग एक आश्चर्य लगता है,उद्योग धन्धे -सिन्धु घाटी सभ्यता की आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार वहां के उद्योग – धन्धे थे,राव तथा मैके के अनुसार खुदाई में प्राप्त प्रमाणों के आधार पर चन्हुदाड़ी तथा लोथल की आबादी शिल्पकारों की थी यानी वे सिन्धु देश की दो उद्योग नगरियां थीं जहां मनके बनाने वाले ,शंख का काम करने वाले , सोने -चांदी के गहने बनाने वाले , तांबे तथा पीतल के बर्तन बनाने वाले निवास करते थे, वहां शिल्पिक लोगों की कर्मशालाएं , काम करने के औजार तथा भट्टियां प्राप्त हुई हैं ,वहीं पर कच्चे अधबने अथवा तैयार किए हुए माल के ढेर प्राप्त हुए हैं,मुख्य तौर से लोथल तथा चन्हुदाड़ो में मनके बनाने का काम बहुत होता था,तैयार किए माल को लोथल जैसे बन्दरगाहों से पश्चिम में स्थित देशों बेबीलोन , मेसोपोटामिया ,अकाद तथा बहरीन ( जिसे सम्भवतः दिलमन पुकारते थे ) भेजा जाता था…क्रमशः…
सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता
शूद्र और वणिक-26-27-28.
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सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक–
सिन्ध का विशाल देश विश्व की दोनों समकालीन सभ्यताओं मिस्र तथा मेसोपोटामिया को मिलाकर दुगुने से भी अधिक क्षेत्रफल वाला था,वास्तव में हड़प्पाई विश्व के सर्वप्रथम लोग थे जिन्होंने भिन्न – भिन्न प्रकार के लोगों को एक करके शान्तिमय वातावरण वाले विशाल साम्राज्य की स्थापना की जहां सभी बराबर थे,एक-दूसरे का आदर करते थे ,आर्थिक रूप से सम्पन्न थे,सबसे बड़ी बात तो यह है कि इतने बड़े राज्य की स्थापना के लिए सम्भवतः शान्तिपूर्ण ढंग से काम हुआ लगभग 4 -5 शताब्दियों तक धार्मिक तथा राजनीतिक पहलू से किसी भी प्रकार की अशान्ति तथा युद्ध के बिना राजसत्ता चलाते रहना एक बहुत बड़ी बात थी,इसी शान्ति ने वहां सुख और सम्पन्नता के बीज बोये ,प्रगति की मंजिलें -दर -मंजिले तय की निश्चय ही उन्होंने नदियों में बांध बांध कर नहरों का सिंचाई के कृत्रिम साधनों की तरह प्रयोग कर खेती- बाड़ी की,अनाज के विशाल भण्डारों का उत्पादन किया और मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा के विशाल अनाज गोदामों को भर दिया,उन अनाज गोदामों को देखकर आधुनिक भारत में हरित क्रान्ति के बाद खड़े किए गए अनाज गोदामों की याद मुखरित हो उठती है.
उसी शान्ति के परिणामस्वरूप सारे सिन्धु देश में उद्योग -धन्धों का जाल -सा बिछ गया,इतना ही नहीं वहां चन्हुदाड़ो और लोथल जैसी उद्योग नगरियों की स्थापना भी हुई जिनका उत्पादन न केवल सिन्ध के विशाल देश के कोने – कोने में खपता था बल्कि उस युग के सभी सभ्य देशों तक जल और थल मार्ग से भेजा जाता था जिसे बखूबी व्यापार का एकाधिकार भी कहा जा सकता है,भारत में सन् 1947 की स्वतन्त्रता के बाद देश के कुछ भागों में उद्योग – धन्धों का जाल तो बिछा मगर वह स्वप्न साकार न हो पाया जो अब से 4 – 5 हजार साल पहले हड़प्पाइयों ने कर दिखाया था,वे विश्व बाजार में छा गए थे,उनकी कर्मशालाओं और फैक्टरियों में बने माल की मांग मिन के राजाओं को भी थी जो उस युग के यातायात के साधनों को देखते हुए दूर -दराज का दुर्गम्य देश कहा जा सकता है,दूसरी तरफ आज हमारी स्थिति यह है कि विश्व बाजार में कहीं भी पैर जम नहीं पा रहे,सिंधवियों के इस व्यापारिक एकाधिकार का परिणाम यह हुआ कि देश धन- दौलत से सम्पन्न हो गया,साधारण से साधारण आदमी सुखी जीवन जीने लगा,व्यवस्था ने साधारण जन के हित के लिए बड़े पैमाने पर नगर योजना तथा जल निकास व्यवस्था पर धन पानी की तरह बहाया,साधारण जन शानदार बहुमंजिले पक्के मकानों में निवास करने लगे,जहां जीवन की वे सुविधाएं ( आज की इंग्लिश प्रकार की सीट वाले शौचालय ,कुएं ,स्नानघर ,टायलों से सजे कमरे व स्नानघर ,फूलों और बेलों से सजे आंगन ) उन्हें प्राप्त थीं जो आज भी देश के गिने -चुने अमीर खाते -पीते लोगों को ही प्राप्त हैं,इससे साफ प्रकट होता है कि उनके रहन -सहन का स्तर बहुत ही उच्च था,वे घरों में लकड़ी का फर्नीचर प्रयोग करते थे,सुन्दर ,रंगदार तथा चमकीले बर्तनों में शाकाहारी तथा मांसाहारी स्वास्थ्यवर्द्धक स्वादिष्ट भोजन खाते थे,अमीर लोग, सुन्दर रंगे तथा कढ़े हुए शानदार सूती कपड़ों का प्रयोग करते थे पुरुष और नारी भिन्न -भिन्न प्रकार से अपने केशों को सजाते थे , जिनमें सम्भवतः सुगन्धित तेलों का प्रयोग किया जाता था सुन्दरियां अत्यन्त सुन्दर और बेशकीमती गहनों से अपने रूप – रंग को सजाती ,लिपिस्टिक और पाउडर जैसे पदार्थों से अपनी सुन्दरता में चार चांद लगाती थीं,सुरमे से अपने सुन्दर नयनों की कोरों को सजाती थीं,सिन्धु – घाटी के लोगों की महान प्रगति के बारे में एस.आर.राव ” अपने विचार इन शब्दों में व्यक्त करते हैं – ‘ हड़प्पाइयों ने इंजीनियरिंग में जो महान प्रगति की वह मानव सभ्यता के लिए एक बहत बड़ी प्राप्ति कही जा सकती है,कृत्रिम बन्दरगाहों का सृजन करना,उनमें पानी को कृत्रिम ढंग से नियन्त्रित करना एक ऐसा कदम था जिसे हम आज की जहाजरानी का जनक मान सकते हैं,भवन निर्माण कला का जो सेहरा अंग्रेजों के सिर पर रखा जाता है वास्तव में वह हड़प्पाइयों का कमाल था,इसके अतिरिक्त परकार और गोल आरी का आविष्कार इंजीनियरिंग के लिए उनकी बहुत बड़ी देन कही जा सकती है,इसके साथ ही अर्थशास्त्र में बालिस्त तथा अंगुल को नापने की विधा के जनक वे ही थे ,जो अब से कुछ समय पूर्व तक भारत में प्रयुक्त होती रही है हड़प्पाई लोगों ने चावल को दुनिया में सबसे पहले पैदा किया विद्वानों का विचार है कि घरों में सजावट के लिए पौधे तथा बेल आदि का प्रयोग सबसे पहले उन्होंने ही किया था.
हड़प्पाइयों का सबसे बड़ा कमाल सेवाओं तथा वस्तुओं का मानक ( Standarization of goods ) स्थापित करना है , जिसे उन्होंने जीवन के हर पहलू में अपनाया जैसे -नाप -तोल मद्राएं ,मिट्टी तथा धातु के बर्तन , हाथ के औजार ,अस्त्र -शस्त्र, खिलौने ,मकान तथा नालियों का एक जैसा होना सारे विशाल सिन्धु राज्य में पाया गया है,यह सिन्धु सभ्यता ही थी,जिसने बाद की सभ्यताओं को बतला दिया कि मानक स्थापित करने का कितना लाभ है,जिसका आज भी उद्योग -धन्धों पर आधारित सभ्यता के लिए भी उतना ही मूल्य है,आश्चर्य होता है कि इतने थोड़े समय में हड़प्पाई लोग मानव सभ्यता की प्रगति की इतनी पीढ़ियों को कैसे लांघ गये मगर हमें उस समय और भी आश्चर्य होता है जब सोचते
कि भारतीय प्रायद्वीप में सिन्धु घाटी सभ्यता के नष्ट -भ्रष्ट होने से सभ्यता का जो सूर्य अस्त हो गया था उसका वास्तविक उषा काल तब हुआ ,जब हजारों साल की परतन्त्रता के बाद 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ , जब ऐसा विधान बना जिसमें सब इंसानों के अधिकार बराबर हों , बराबरी के स्तर पर सब एक – दूसरे का मान करें जहां सरकार जन -साधारण के हित के लिए राजस्व का खर्च करे , अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि ,उद्योग -धन्धे और वाणिज्य हो,मगर अब भी यह एक स्वप्न – सा प्रतीत होता है जिसे पूर्ण होने की जन -साधारण केवल आशा लगाये बैठा है,उपर्युक्त विवेचन के बाद हम निःसंकोच कह सकते हैं कि सिंधवी लोगों ने अब से 4 – 5 हजार वर्ष पूर्व एक महान् सभ्यता का सृजन किया,वे लोग निःसन्देह ही महान थे,सारा राष्ट्र उन पर गर्व कर सकता है –
सिंधुघाटी सभ्यता के सृजनकर्ता
शूद्र और वणिक-34-35-36.
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सिंधुघाटी सभ्यता-आर्यों की बर्बरता
जानिए बर्बर आर्यों के बर्बरता की कहानी -उन्ही के वेदों की जुबानी-
दरअसल वेदों में और कुछ नहीं,आर्यों द्वारा अनार्य सिन्धुवाशियों के बर्बर दमनात्मक कृत्य के लिखित दस्तावेज हैं-
जानिए कैसे–
-हे इंद्र सोम का अभिसव न करने वाले तथा कठिनाई से वश में न आने वाले दस्युओं का वध करो,क्योंकि वे तुम्हें सुखी नहीं कर सकते,उनका धन हमको दो,तुम्हारा स्रोता धन प्राप्त करने योग्य है-
“ऋग्वेद-l-176-4.
-हे इंद्र “कीकट”लोग जो कि अनार्य हैं,वे न तो गौवो का कोई उपयोग करते ही हैं,ये न ही दुग्ध ही प्राप्त करते हैं और न ही घृत ही निकालते हैं,इसलिए हे इंद्र उनकी गौवों को हमारे पास ले आओ,अधिक धन प्राप्त करने की इच्छा से धन उधार देने वाले पणि के धनों को भी हमें प्राप्त कराओ.
-ऋग्वेद-ll-53-54.
-जिन्होंने संसार को रचा और दासों को निम्न गुफाओं में बसाया जो शत्रुओं के धनों को जीतते हैं वे इंद्र हैं-
-ऋग्वेद-VI-12-4.
-अश्व,सूर्य,गोधन रत्न और सुवर्ण आदि यह सब इंद्र के दान रूप हैं,उन्होंने पापियों का संहार कर आर्य वर्ण की सदा ही रक्षा की है-
-ऋग्वेद-ll-34-9.
-हे अग्ने तुम मित्रों को सम्मानित करने वाले हो,वशुगण नें तुम्हे बलवान बनाया है,तुमने कर्ममान पुरुषों (आर्यो)की रक्षा के लिए अपनें तेज से दस्युओं को उनके स्थान से भगा दिया है.
-ऋग्वेद-Vll-5-6.
-हे इंद्र तुम सब दस्युओं को उनके सद्गुणों से विहीन करते हो,हे इंद्र और सोम तुम दोनों ही शत्रुओं के आक्रमण कार्य में बाघ बनते हुए उनका संहार करो.
-ऋग्वेद-lV-28-4.
-अग्नि सातों प्रदेशों के मनुष्यों और सब नदियों में व्याप्त है,वे तीनों स्थानों में समान रूप से रहते हैं,उन्होंने यवनाश्व पुत्र मांधाता के निमित्त दस्युओं का नाश किया यज्ञों में मुख्य अग्नि हमारे सब शत्रुओं की हिंसा करे.
-ऋग्वेद-Vlll-37-8.
-हे इंद्र प्रबुद्ध अन्नवान दस्युओं का नाश करनें वाला,उनकी पुरियों का ध्वंस करने वाला अद्भुत कर्मा पुत्र हमें दो-
-ऋग्वेद-X-74-4.
-हे इंद्र स्तुतियों से हम तुम्हारा बल बढाते हैं और वज्र भेंट करते हैं और तुम उन दस्युओं को सूर्य के समान अपनें तेज से तुम विनष्ट करते हो.
-ऋग्वेद-ll-11-4.
-हे इंद्र तुमने पिप्र और प्रवृद्ध नामक असुरों का वध किया,तुमने विदीथ के पुत्र रिजिश्वा को बंदी बनाया और पचास सहस्र काले रंग वाले दैत्यों को मार डाला,जैसे बुढापा रूप का नाश कर देता है,वैसे ही तुमने अनार्य राजा शम्बर के नगरों का नाश कर डाला.
-ऋग्वेद–103-3.
-वज्रधारी वह इंद्र शत्रु दुर्गों को नष्ट करने के लिए जाते हैं.
-ऋग्वेद-Vl-18-5.
-तुमने अंगिराओं में युद्ध शक्ति से “बल” नामक दैत्य को मारा और उसके नगरों के द्वारों को खोला था.
-दरअसल सिधुवासी महान गुण सम्पन्न और समृद्ध थे,क्रूर और बर्बर आर्यों नें अपनी बर्बरता से सिन्धुवाशियों के कृषि,उद्योगधंधों तथा उनके व्यापार को पूर्णतया ध्वस्त कर उसपर पूर्णतया रोक लगा दी,ताकि वे पूर्णतया समाप्त हो जाएं,यही था क्रूर आर्यो का सिन्धुवासी अनार्यो के प्रति नंगा षड्यंत्र,जिसे वेदों में छुपाकर रखा गया था-
अधिकतर अशूद्र ब्राम्हणों के ग्रंथ कोरी गप्प के शिवाय और कुछ भी नहीं हैं क्योंकि अभी तक भी इनका कोई सिर पैर ही साबित नहीं हो पाया है जो मन में आया भांग खाकर लिख दिया और दुःखद की गपोड़ियों का वही गप्प मंदबुद्धियों नें बिना भेजा इस्तेमाल किये जस का तस मान लिया,और गधे,घोड़े तथा खच्चर की तरह ढोने लगे,आज ऐसे गप्प को जानना भी कितना हास्यास्पद है माननें का तो सवाल ही नहीं उठता-जानने के लिए जानिए नमूनें गपोड़ियों के कोरे गप्प के कुछ एक नमूने-
यहाँ मामला संसार और जीवों की उत्पत्ति का है जिन्हें तर्क बुद्धि विवेक और विज्ञान की एबीसीडी नहीं मालूम जो खुद क्षणभर में हवा में फूँक मारकर पैदा हो गए और समूचा ब्रम्हाण्ड फूँक मारकर हवा में ही उत्पन्न कर दिया और खुद हवा में ही ऐसे गायब हो गए जो किसी को आज तक दुबारा खभी नहीं मिले-बस मिल रही है तो ऐसे हवा हवाई गपोड़ियों की कोरी हवा हवाई गप्प-जानिए कैसे–
शतपथ ब्राम्हण-ll-१-४-११- के हवाले से–
मूरति वै प्रजापति:इमाम जनमत
भुव इत्यन्तरिक्षश्र स्वरिति !
दवयेतावद्राज्ज्इदश्र सर्व
यावदिमें लोक:सर्वेंणेंवाधीयते !!
अर्थात-
भुवः कहकर प्रजापति नें खुद को पैदा कर लिया,भुवः कहकर उसनें इस सारी दुनियाँ को उतपन्न किया,उसने भुवः कहकर सर्वप्रथम वायु को उतपन्न कर दिया,स्वाहा कहकर आसमान को उत्पन्न कर दिया,इसी प्रकार भुवः कहकर उसनें सारी दुनियाँ को उत्पन्न कर दिया,भुवः कहकर उसने प्रजापति ब्राम्हण को पैदा कर दिया,भुवः कहकर उसने क्षत्रिय को पैदा कर दिया,वहीं स्वाहा कहकर उसनें वैश्य को पैदा कर दिया,और बाद में स्वाहा कहकर अन्य सभी को पैदा कर दिया,भुवः कहकर उसनें सारी ऋतुएं पैदा कर दीं,स्वाहा कहकर पशु उत्पन्न कर दिए,इस प्रकार भुवः व स्वाहा कहकर प्रजापति नें खुद के साथ समूची दुनियाँ का निर्माण कर दिया.
वहीं मानव की उत्पत्ति के बारे में इसी शतपथ ब्राम्हण में एक और निम्न गपोड़ी कथा भी दी गयी है- जितने गपोड़े ग्रंथ उतनी गपोड़ी रचनाएं-
देखिए-शतपथ ब्राम्हण -l-८-१-१-से १० तक–
एकबार मनुजी महाराज पानी में हाथ धोने के लिए गए-तो उनके हाथ में एक छोटी मछली आ गयी,वह मछली मनुजी महाराज से बोली-कि मुझे एक घड़े में सम्हाल कर रखो,जब मैं बड़ी हो जाऊं तो दूसरे घड़े में पानी भरकर उसमें डाल देंना,परंतु जब मैं उससे भी बड़ी हो जाऊं तो मुझे समुद्र में डाल देना,फिर एक बाढ़ आएगी,तब सारे जीव जंतु बह जाएंगे,तब सिर्फ तुम बचोगे,तब तुम एक नाव में बैठ जाना,और नाव का एक रस्सा मेरे सींग में बांध देना,तब मैं तुम्हें उत्तरी पहाड़ पर ले जाऊंगी-
और एक दिन ऐसा ही हुआ अचानक बाढ़ आ गयी, बाढ़ में सभी जीव जंतु समाप्त हो गए तब केवल मनु जी महाराज बचे,जो अकेले रहकर ही धर्म कर्म करते रहे,उन्हें जब कामेक्षा हुई तो अपना वीर्य घी दूध जैसा समुद्र के पानी में डालते रहे,जिसमें से एक नारी उत्पन्न हो गयी,जिसका नाम उन्होंने इड़ा रख दिया,उसी से मानव की उत्पत्ति हुई,गपोड़िये ग्रंथकारों की तैतरेय संहिता भी कुछ इसी तरह की कोरी गप्प आज भी परोसती है-जानने के लिए पढ़ें-तैतरेय संहिता -ll-6–7-1 तथा -l-7-1-3,एवम छान्दोग्य उपनिषद-lll-११-४ तथा -Vlll-15-1-
आर्यों की बर्बरता-और सिंधु निवाशियों का बर्बरतापूर्ण दमन—
जानिए वेदों की काली हकीकत-
दरअसल वेदों में और कुछ नहीं,आर्यों द्वारा अनार्य सिन्धुवाशियों के बर्बर दमनात्मक कृत्य के लिखित दस्तावेज हैं-
जानिए कैसे–
सिंधु देश के अनार्यों का विनाश तथा उनकी धन संपदा की लूट तथा सिंधु प्रदेश पर आधिपत्य ही ऋग्वेदिक आर्यो के आक्रमणकारी युद्ध का एकमात्र सबसे बड़ा उद्देश्य रहा था,इसमें आक्रमणकारी आर्यों का सबसे पहला निशाना प्राकृतिक,आयुद्धजीवी सैनिक वर्ग,मुखिये देश की राजसत्ता के स्वामी मतलब राज परिवार तथा अन्य धनाढ्य व्यापारी वर्ग का खात्मा कर लूटपाट ही रहा था,ऋग्वेद में दिए वर्णनों से लगता है कि युद्ध में जीतने के बाद उन लोगों का नृशंस बध कर उनका सब कुछ लूट लिया गया होगा-और बचे हुए लोगों को हमेशा के लिए गुलाम बना लिया गया होगा-
ऋग्वेदिक आंकड़ों के अनुसार बर्बर आर्यों नें अचानक आक्रमण कर सिन्धुवाशियों का बेहिसाब कत्ल कर उन्हें खत्म किया-जैसे-
ऋग्वेद-Vl-16-13-के अनुसार 50,000 दस्यु मारे गए.
ऋग्वेद-IV-30-21-के अनुसार 30,000 दस्यु मारे गए.
ऋग्वेद-IV-30-15 के अनुसार 5000 दस्यु मारे गए.
ऋग्वेद-VI-26-6- के अनुसार 60,000 दस्यु मारे गए.
ऋग्वेद-VII-18-4-66,000 दस्यु मारे गए.
ऋग्वेद-VII-99-5-के अनुसार 10,000 दस्यु मारे गए.
अर्थात आर्यों के ग्रंथ ऋग्वेद के अनुसार ही कम से कम ढाई से तीन लाख सिंधु निवाशियों को क्रूर बर्बर विदेशी आर्यों नें अचानक आक्रमण कर मौत के घाट उतार दिया,इनकी नृशंस बर्बरता की काली हकीकत के लिखित दस्तावेज ही हैं इनके वेद यही वजह थी कि वेदों के पढ़ने पर रोक लगाई गई ,पर आज जरूरत है कि हम बर्बर आर्यों के काले अध्याय का हम वो काला पन्ना खोलें और जानें वह काला सच जो इन्होंने हमारे पूर्वजों पर जुल्म ढाकर अपने क्रूर ग्रंथों में अब तक छुपाकर रखा था,इस क्रूर नृशंस बर्बर आक्रमणकारी हत्याकांड में जो लोग बच गए उन्हें बलात बंदी बनाया गया और शूद्र बनाकर दासता की बेड़ियों में जकड़कर हमेशा के लिए ढकेल दिया गया गुलामी की काली गहरी अंधेरी खाई में जिसमें से सदियों बाद भी आज तक उजाला करना सम्भव नहीं हो पाया है-
-सिंधुघाटी सभ्यता-बर्बर आर्यों की बर्बरता-शुद्रों तथा दासों की ऐतिहासिक उत्पत्ति और वेदों की काली हकीकत-पृष्ठ-131-132-133,152-153,166-167.
——-मिशन अम्बेडकर.
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