34 सालों बाद देश की शिक्षा नीति बदल गई। कैबिनेट के बैठक में मोदी सरकार ने देश की नयी शिक्षा नीति में बदलाव आ गया। शिक्षा नीति बदलाव के साथ ही स्कूल और कॉलेज की व्यवस्था में बड़े बदलाव आयेंगे। इसके अलावा मानव और संसाधन मंत्रालय का नाम बदल कर भी शिक्षा मंत्रालय कर दिया। नयी शिक्षा मंत्रालय के बारे में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और रमेश पोखरियाल निशंक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तृत जानकारी दी। सरकार ने शिक्षा नीति को लेकर 2 समितियां बनाई थीं। एक टीएसआर सुब्रमण्यम समिति और दूसरी डॉ. के कस्तूरीरंगन समिति बनाई गई थी. दोनों ही समितियों की रिपोर्ट के आधार पर शिक्षा नीति में बदलाव का फैसला किया गया।
नयी शिक्षा नीति से क्या फायदा होंगे इसे इस तरह समझिये। इंजीनियरिंग का कोर्स चार साल का होता है। चार साल में 8 सेमेस्टर होते हैं. पुरानी शिक्षा व्यवस्था में अगर कोई छात्र 2 साल या 3 साल में ही कोर्स छोड़ देता है तो छात्र की डिग्री अधूरी रह जाती है। लेकिन नए व्यवस्था में एक साल के बाद सर्टिफिकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा, तीन या चार साल के बाद डिग्री मिल सकेगी।
नयी शिक्षा नीति में इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है कि जो लोग किसी कारण से ड्रापआउट हो जाते हैं वो फिर से शिक्षा व्यवस्था के दायरे में आ सकें। पूरानी शिक्षा व्यवस्था में मेजर कोर्स के साथ माइनर कोर्स नहीं किये जा सकते थे। लेकिन नयी शिक्षा नीति में मेजर और माइनर की व्यवस्था की गई है. इसे इस तरह से समझिये कि फिजिक्स ऑनर्स के साथ केमिस्ट्री, मैथ्स लिया जा सकता था लेकिन इसके साथ फैशन डिजाइनिंग नहीं ली जा सकती थी। लेकिन नयी शिक्षा व्यवस्था के तहत मेजर के अलावा माइनर प्रोग्राम भी लिए जा सकते हैं. इससे अगर कोई ड्रॉपआउट हो जाता है तो वो वापस शिक्षा व्यवस्था में आ सकता है।
नई शिक्षा नीति के तहत एमफिल कोर्सेज को खत्म किया जा रहा है। पांचवी तक की पढ़ाई होम लैंग्वेज, मातृ भाषा या स्थानीय भाषा माध्यम से की जा सकती है। छठी कक्षा के बाद से ही वोकेशनल एजुकेशन की शुरुआत हो सकेगी. यूनिवर्सिटीज और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए कॉमन एन्ट्रेंस एग्जाम होंगे ।सभी सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए एक तरह के मानदंड होंगे. लीगल और मेडिकल कॉलेजों को छोड़कर सभी उच्च शिक्षण संस्थानों का संचालन सिंगल रेग्युलेटर के जरिए होगा।