आज 27 जून 2025 को अली कांग्रेस की एक बैठक आयोजित हुई, जिसमें ज़ाकिरों, मजलिस के श्रोताओं और मजलिस के आयोजकों, सभी से अनुरोध किया गया कि वे मिमबर के सम्मान पर विशेष ध्यान दें। ज़ाकिरों से विनम्र अनुरोध किया गया कि वे मंच को अपने निजी हितों को प्राप्त करने का साधन न बनाएं और न ही इसे अपनी समस्याओं या आत्मप्रशंसा का माध्यम बनाएं। बल्कि, इसके माध्यम से ईश्वरीय संदेश, अहल-ए-बैत की सीरत और करबला के क्रांतिकारी व इस्लामी शिक्षाओं की व्याख्या करने वाले इस अद्बवैतिय और अनुपम संदेश को दुनिया में फैलाया जा सके।
मजलिस-ए-अज़ा विचारों को प्रेरित करने और मानसिक निर्माण का सबसे अच्छा साधन है, और इसकी महत्ता को समझना अत्यंत आवश्यक है। जो इस महत्ता को समझ लेगा, वह निश्चित रूप से मिमबर के सम्मान के प्रति अपनी जिम्मेदारी को महसूस करेगा और इस जिम्मेदारी से कदापि लापरवाही नहीं बरतेगा। मिमबर का सम्मान केवल ज़ाकिरों की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि मजलिस के श्रोताओं और आयोजकों की भी जिम्मेदारी है। मजलिस के आयोजकों को यह समझना होगा कि यह बात मजलिस के अन्य प्रबंधों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इसमें भाग लेने वालों को हमारी मजलिस में शामिल होकर कौन सा आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक सबक प्राप्त होगा? इसलिए ज़ाकिर का चयन करते समय यह सवाल हमेशा ध्यान में रखना चाहिए, ताकि इमाम हुसैन के अज़ा के उद्देश्य की पूर्ति संभव हो सके।
इसी तरह, मजलिस सुनने वालों की भी अपनी जिम्मेदारियां हैं कि यदि कोई बात समझ में न आए या ज़ाकिर के माध्यम से कोई ऐसी बात कही जाए जो कुरान-ए-करीम के विरुद्ध हो, तो उस संबंध में ज़ाकिर से अवश्य सवाल करें और मजलिस में बताई गई आयतों व रिवायतों की सत्यता की जांच अवश्य करें, ताकि ज्ञान सही रूप में आप तक पहुंचे।
हमारे लिए आयतुल्लाह सय्यद अली ख़ामनेई की शख्सियत एक प्रेरणादायक सबक है, जिन्होंने व्यावहारिक रूप से दुनिया को दिखा दिया कि उनकी दृढ़ता और स्थिरता का केंद्र करबला है। उनका यह संदेश उन लोगों के लिए शर्मिंदगी का कारण है, जो सत्ता में बैठे लोगों की गुलामी और चापलूसी को ही अपना राजनीतिक चेतना और उनकी निकटता को ही अपना सम्मान मानते हैं।
मिमबर का सम्मान मोमिनीन का कर्तव्य – अली कांग्रेस*



