छठ पूजा की धार्मिक मान्यताछठ पूजा सूर्योपासना का सबसे प्राचीन और कठिन पर्व है, जो मुख्य रूप से सूर्य देव (भगवान सूर्य) और उनकी पत्नी उषा (प्रातःकाल की देवी) तथा प्रत्युषा (संध्या की देवी) की उपासना के लिए मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार:सूर्य देव जीवन का आधार हैं, जो ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करते हैं।
यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, इसलिए इसे “छठ” कहते हैं।
कथा: महाभारत में द्रौपदी ने पांडवों की रक्षा और राज्य प्राप्ति के लिए सूर्य की आराधना की थी। रामायण में श्रीराम-सीता ने वनवास से लौटकर छठ किया था। एक अन्य कथा में राजा प्रियव्रत की रानी मालिनी ने संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत किया था।
कब और क्यों मनाया जाता हैकब: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को (दिवाली के 6 दिन बाद, आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर में)।
क्यों: सूर्य देव को धन्यवाद देना और उनसे संतान, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि की कामना करना।
परिवार की रक्षा और मनोकामना पूर्ति।
प्रकृति के साथ सामंजस्य – सूर्य की किरणें और जल (नदी/तालाब) में अर्घ्य देना।
मूल रूप से बिहार के लोग ही क्यों मनाते हैंऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण:बिहार (प्राचीन मगध) में सूर्यवंशी क्षत्रियों (जैसे राजा प्रियव्रत) की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
गंगा-घाघरा जैसी नदियों की प्रचुरता के कारण जल और सूर्य की उपासना आसान और प्राकृतिक।
यहाँ की ग्रामीण संस्कृति में निर्गुण भक्ति और कठोर तप की परंपरा मजबूत है।
प्रवासी बिहारी इसे जहाँ जाते हैं (झारखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मुंबई) ले जाते हैं, लेकिन मूल जड़ बिहार में है। अब यह राष्ट्रीय पर्व बन गया है।
किस देवी-देवता की उपासना और महिलाओं का व्रतउपासना: मुख्य: सूर्य देव और छठी मइया (उषा-प्रत्युषा का सामूहिक रूप, जिसे प्रकृति शक्ति माना जाता है)।
कभी-कभी भगवान गणेश और कार्तिकेय का भी पूजन।
महिलाओं का व्रत: 36 घंटे का निर्जला उपवास (नहाय-खाय से अर्घ्य तक)।
कोई अन्न-जल नहीं, सिर्फ फल और ठेकुआ आदि प्रसाद।
पुरुष भी रखते हैं, लेकिन महिलाएँ (व्रत करने वाली को “व्रती” कहते हैं) मुख्य रूप से संतान और परिवार के लिए रखती हैं।
संक्षेप में: छठ बिहार की सांस्कृतिक पहचान है, जो कठिन तप और सूर्य-प्रकृति की श्रद्धा का प्रतीक है।



