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पहली जंगे आजादी 1857 ई0 के बाद फैली कुरीतियों को डा0 कल्बे सादिक साहब ने खत्म कराया

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लेखक एस.एन.लाल

मोहतरम् जनाब डा0 कल्बे सादिक साहब पर कुछ भी लिखना, वही आम मिसाल की तरह है कि जैसे सूरज को दीया दिखाना…! मै समझता हूॅं अगर डा0 सादिक साहब जैसी शख्सियत इस दुनिया के पर्दे पर न आती, तो पहली जंगे आजादी 1857 ई0 के बाद से जो गरीबी और बिना हाथ हिलाये सिर्फ अल्लाह-मौला के सहारे जीने के चलन और नये-नये रीति रिवाजों ने जगह ले ली थी वह शायद आज खत्म न होते…।, जैसे शादियों में हद से ज़्यादा दहेज़ का चलन, बीबियों की कहानियां सुनने का चलन, सुनसान मस्जिदों में जाकर जिन्नातों से मांगने का चलन, मस्जिदों में ताख भरने का चलन, नाकरी व काम-धन्धे पर न जाकर मस्जिदों में बैठकर और मातम मजलिस में सिर्फ रोज़ी-रोटी की दुआ मांगने का चलन, ऐसी बहुत सी चीजों को उन्होंने खत्म किया और सही इबादतों से रुशनास कराया, और बताया कि सबसे बड़ी इबादत रोटी कमाया और परिवार का पेट पालना है, मुसलमान हो तो नमाज़-रोज़ा और मजलिस-मातम तो करना तो फर्ज़ ही है, लेकिन रोजी-रोटी कमाना भी अज़ीम इबादत है।
मैने अपने बचपन में अपनी आंखों से देखा है कि लोगो के घरों में फटे हुए टाट के पर्दें पड़े रहते थे लेकिन लोग एक-एक पैसा जोड़कर मस्जिदे बना देते थे या घरों में बहुत ही शानदार मजलिस करते थे.., लेकिन अपने बच्चों को तालीम नही दिलवाते थे…, बस इसी को सवाब समझते और उम्मीद करते है उन्ही नेक कामों की वजह से बिना हाथ-पैर हिलाये कही अज़गै़ब से अल्लाह पैसा दे देगा।
एस.एन.लाल
जनाब के तालीम और यकजहती कामों की सबही चर्चा करते है…, डा0 साहब ने हमेशा अपनी मजलिसों और बयानात से इन्सानी यकजहती और तालीम की बात की…। जाहिल आदमी को वह जानवर से तरजी देते थे, एक बार विन चौनल पर एक बच्ची के पूछे गये सवाल कि ‘‘मेरा पढ़ाई में मन नही लगता..मै क्या करु’’! तो जनाब ने जवाब दिया कि ‘‘मै जब अलीगढ़ में पीएचडी कर रहा था तो पढ़ाई में दिल नही लगता.., फिर एक टाइमटेबल बनाया और पढ़ने की आदत डाली, फिर 17-17 घंटे पढ़ता था। इसलिए आप एक टाइमटेबल बनाये और धीरे-धीरे पढ़ाई का वक्त बढ़ाये…! वरना 4 पैर के जानवर व 2 पैर के जानवर में कोई फर्क नही रहेगा, सिर्फ टांगो के अलावा’’। वह सिर्फ शिया मज़हब के बच्चों की तालीम के लिए ही कोशा नही रहते थे, वह सभी मजहबों मिल्लत के बच्चों की तालीम के लिए कोशा रहते थे। जहां तक तालीम के बात है…वह तालीम ही नही बच्चों के पूरे मुस्तकबिल के लिए सोचते थे। अगर बच्चों को आला तालीम की पढ़ाई के लिए सरमाये की ज़रुरत होती थी, तो वह भी देते थे। लेकिन इस शर्त के साथ कि जब आप कमाओंगे तो वापस करोगे। मै जब अलीगढ़ यूनीवस्टी में 1991 में जर्नलिज्म कर रहा था, तो करीब 9 ऐसे लड़कों से मुलाकात हुई, जिनका पढ़ाई का पैसा कल्बे सादिक साहब देते थे..वैसे तो ऐसो की तादाद हज़ारों है।
उनका कहना ये था, हम मछली पकड़कर खाने के लिए नही देंगे, हम मछली पकड़ा सीखायेंगे…, जो सीखने वाला होगा, वही तरक्क़ी करेगा। आज मुझे लखनऊ के जिन घरों में टाट के पर्दे पढ़े थे.., वहां खुबसूरत दिवारे उठ गयी…, जिन घरों की औरते दस्तख की जगह हाथ का अंगूठा लगाती थी, उन घरों में आज बच्चे डाक्टर, इंजीनियर बनकर निकल रहे है। जनाब का लोगो की मद्द का तरीका भी नयाब था, कोई एहसान वाला या सामने वालो को शर्मिन्दगी हो ऐसा तरीका नही अपनाते थे।., बच्चे का इन्टरव्यूह लिया जाता या उसके पढ़ाई में कामयाबी के नम्बर देखे जाते थे…, तब उसको आगे मुस्तकबिल बनाने के लिए पैसा मिलता था।
एस.एन.लाल
मै हज़रत अली (अ.स.) की विलादत के मौके पर कव्वाली और इमाम हुसैन (अ.स.) की शाहदत यानी आशूरा के 10 दिनों में अज़ादारी पर फोटो व पेन्टिंग की नुमाइश या चेहलूम के मौके पर लाईट व साउण्ड का प्रोग्राम करता हूॅं, ताकि दूसरे मजाहिब के लोग भी उन प्रोग्रामों में शरीक होकर हज़रत अली (अ.स.) व इमाम हुसैन (अ.स.) के मरतबे को समझे…! इन प्रोग्रमों में दूसरे मौलाना जल्दी आने को तैयार नही होते थे। लेकिन जनाब कल्बे सादिक साहब आये और उन्होंने मेरी हौसला अफजाई की और कहां ऐसे प्रोग्राामों की आज जरुरत है…ताकि दूसरे मजाहिब के लोग भी इमामों की अफजलियत से वाकिफ हो।
जनाब बहुत ही दूर अन्देशी थे, ईद के चॉंद की तारीख पहले से बता देना, ये इस बात का वाजे़ सबूत है। इल्म हासिल करने को सबसे बड़ी इबादत करार देते थे। एक बयान में उन्होंने फरमाया था, कि ‘‘रोज़ा-नमाज और अज़ादारी हमारी मन्ज़िल नहीं, ये हमें मन्जिल पर पहुंचाने वाले निशान है…, जैसे कही जाने के लिए सड़कों पर निशान या ऐरो लगे होते है। लेकिन हमको मन्जिल पाने के लिए तीलीबे इल्म, खुश इकलाक, सबके साथ सीले रहम करने वाला, किसी को किसी भी तरह की तकलीफ न पहुंचाने वाला, पड़ोसियों व रिश्दारों की खबर लेने वाला बनना पड़ेगा, तभी सही मन्जिल पर पहुंचेंगे।’’
जनाब की कौन-कौन सी बातों को याद करे…, मै समझता हूॅं कि अगर सारे ओलेमा उनकी तरह होते तो आज शिया कौम के पास गुजरातियों और यहूदियों से ज़्यादा पैसा होता। एक बार जनाब मेरी चचाजाद बहन की बिस्मिल्लाह पढ़ाने मोहल्ला बजाजे़ में त’ारीफ लाये। जब बिस्मिल्लाह पढ़ाकर जाने लगे, तो मै बाते करते हुए उनको छोड़ने उनके साथ कुछ दूर गया। तो जनाब ने पूछा…‘‘साहबज़ादे आपको कहा तक जाना है…’’ मैने कहां ‘‘जनाब आपको आपके घर तक छोड़ देता हूॅं…!’’ जनाब ने कहां ‘‘मै चला जाऊॅंगा, आप जाकर अपना काम करें, वक़्त बहुत कीमती होता है।’’ जनाब को वक़्त की बहुत ही कद्र थी, दूसरों के वक़्त की इतनी कद्र की किसी को साथ नही रखते थे, 1 से 2 किलोमीटर का फासले तक तो वह पैदल और तन्हा चलते थे, ये बात मै जनाब की बीमरी से लगभग 10 साल पहले तक की बता रहा हूॅ। जनाब कोई लाहो-लश्कर का दिखावा नही करते थे।
एस.एन.लाल
मुझे बच्चों की सेहत पर होने वाले एक सेमिनार में ’ारीक़ होने का मौका मिला, वहां जब मुसलमानों के ज़्यादा बच्चों के पैदा करने पर इस्लाम पर तोहमत लगने लगी…, तो वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान बोले, ‘‘ये गल्त है इस्लाम में ऐसा नही है, आज से 20 साल पहले डा0 कल्बे सादिक साहब ने हमको बताया था,’’ कि ‘‘इस्लाम कहता है जितने बच्चों की अच्छी परवरिश कर सको, बस… उतने बच्चे पैदा करना चाहिए।’’ और आज के दौर में एक या दो से ज़्यादा बच्चों की अच्छी परवरिश करना मुश्किल है। सहाफी तो कल्बे सादिक साहब के शैदाई थे, जो पूछना होता..फोन किया और पूछ लिया…, सहाफी उनकी इस बात की तारीफ करते नही थकते थे कि जनाब खुद फोन उठाकर बात करते है..बाकी लोग तो..! जनाब ‘‘जय श्रीराम’’ का जवाब ‘‘जय सिया राम’’ में देते थे।
मैने अपनी सहाफत का आग़ाज़ जनाब के ही अखबार ‘‘हमारी तौहीद’’ से शुरु किया था, जोकि देवनागरी लिपि में पहला अखबार है जिसको सहाफी-दानिश्वर व पूर्व अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन चौधरी सिब्ते मोहम्मद नकवी साहब चलाते थे। जिसका आफिस गुफॅरानमआब में था, जहां डा0 कल्बे सादिक साहब का महीने में एक या दो बार आना-जाना रहता था, तो जनाब से मुताल्लिक बहुत सी बाते है… फिर कभी…अगर कही-कभी मौक़ा मिला तो..!
एस.एन.लाल

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