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दो मोहर्रम: इमाम हुसैन (अ.स.) की कर्बला में आगमन और बलिदान की याद

**मजलिस का सार और इमाम हुसैन (अ.स.) का जिक्र:**

दो मोहर्रम, इमाम हुसैन (अ.स.) के कर्बला में प्रवेश का दिन, एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का दिन है। लखनऊ की मजलिसों में इस दिन को गहरे दुख और श्रद्धा के साथ याद किया जाता है, जब इमाम हुसैन (अ.स.) अपने परिवार और साथियों के साथ कर्बला की धरती पर पहुंचे। यह वह पल था जब इमाम ने उस जमीन का नाम पूछा, और एक व्यक्ति ने बताया कि इसे “कर्बला” भी कहते हैं। इमाम ने इसे सुनकर कहा, “बस यही, खेमे यहीं लगाओ।” इस पवित्र भूमि को खरीदकर बनी असद को वक्फ कर दिया गया, जो इमाम की सच्चाई और बलिदान की निशानी है।

कुरान और हदीस के संदर्भ में इमाम हुसैन (अ.स.) का जिक्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुरान में सूरह अल-बकरा (2:156) में कहा गया है:
**”जो लोग मुसीबत के समय कहते हैं कि हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटने वाले हैं।”**
इमाम हुसैन (अ.स.) ने कर्बला में इस आयत को जीवंत कर दिखाया, जब उन्होंने हर मुसीबत में अल्लाह की रजा को स्वीकार किया और हक की राह में अपनी जान कुरबान की।

हदीस में रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया:
**”हुसैन मुझ से हैं और मैं हुसैन से हूँ।”** (सुनन तिर्मिज़ी, हदीस नं. 3775)
यह हदीस इमाम हुसैन (अ.स.) की महानता और उनके बलिदान की पवित्रता को दर्शाती है। कर्बला की घटना न केवल एक त्रासदी थी, बल्कि हक और इंसाफ की जीत का प्रतीक भी है। इमाम हुसैन (अ.स.) ने कर्बला में अपने खेमे लगाकर और उस जमीन को वक्फ करके यह संदेश दिया कि सत्य की राह में हर कुर्बानी कबूल है।

लखनऊ की मजलिसों में दो मोहर्रम को इस घटना को याद करते हुए, अज़ादार इमाम हुसैन (अ.स.) के बलिदान और उनके कर्बला पहुंचने की याद में शुक्र अदा करते हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि सच्चाई और न्याय के लिए खड़ा होना हर मुसलमान का फर्ज है।

**दुआ:**
ऐ अल्लाह! इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों के बलिदान को कबूल फरमा और हमें उनकी राह पर चलने की तौफीक अता कर। आमीन।

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