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जालिम और मज़लूम की पहचान के लिए इंसान होना जरूरी है।

जालिम और मजलूम की पहचान के लिए इंसान होना जरूरी है ज़ाहिरी तौर पर तो सभी इंसान नजर आ रहे हैं लेकिन दुनिया में वास्तव में कितने इंसान है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर वह जालिम और मजलूम के बीच के फर्क को पहचानते हैं तभी वह इंसान कहलाने लायक है और अगर वह जालिम मजलूम के बीच के फर्क को नहीं पहचानते तो वह ज़ाहिरी तौर पर इंसान जरूर दिखेंगे लेकिन हकीकत में वह जानवर से बदतर हैं।

दूसरी चीज इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसकी ज़बान से होती है अगर इंसान अपने ज़बान से सही शब्दों का इस्तेमाल करेगा तभी वह इंसान कहलाने लायक होगा लेकिन अगर वह जालिम और मजलूम के फर्क को भूलकर जालिम के लिए सम्मानित शब्द इस्तेमाल करें और मजलूम के लिए गलत शब्द का इस्तेमाल करे तो ऐसे लोग इंसान कहलाने लायक नहीं होते हैं।
कोई भी धर्म हो अत्याचार को किसी ने पसंद नहीं किया है अत्याचार करने वाले अत्याचारी को भी कोई नहीं पसंद करता है। ऐसे में अगर कोई व्यक्ति, संस्था, सरकार, देश जालिम अत्याचारी के साथ खड़े नजर आएं और उसका साथ देने के लिए खड़े हो तो यह बहुत शर्म की बात होगी। इस दौर में लोग अधर्म, असत्य का साथ देने के लिए जमा हो जाते हैं लेकिन सत्य का साथ देने के लिए कोई नहीं खड़ा होता बल्कि इस दौर में तो हालात यह हो गए हैं कि अगर सत्य का साथ देने के लिए आप खड़े होंगे तो आपके खिलाफ ही कार्रवाई की जाएगी।
अगर मीडिया की बात करें तो आज मीडिया में पढ़े-लिखी लोगों की कमी दिखाई देती है क्योंकि उनके पास ना आचरण होता है ना व्यवहार होता है ना सही शब्दों का चयन होता है या यह कहूं कि अगर यह सब होता भी है तो उनकी आत्मा या बिकी होती है या मुर्दा होती है। वह किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अभद्र और असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं बगैर यह समझे हुए कि वह इंसान कौन है और क्या है।
और अब तो इंसान क्रूरता , निर्लज्जता और जलालत के समंदर में इतना ज्यादा डूब चुका है कि उसको सही और गलत सामने दिखते हुए भी नहीं दिखाई देता है और वह गलत की तारीफ करता है और सही की आलोचना करता है। लेकिन उनको याद रखना चाहिए की 100 गीदड़ मिलकर भी एक शेर का शिकार नहीं कर सकते। हां शेर को धोखे से खत्म किया जा सकता है। और इस धोखे का शिकार सिर्फ मजलूम होता है।
आज शब्दों की आजादी, विचारों की आजादी खत्म हो गई है अगर आप सोशल मीडिया पर सच का साथ देने के लिए लिखते हैं फोटो लगाते हैं तो उसको फौरन सोशल मीडिया डिलीट करने की कोशिश करता है सवाल यह है कि सत्य से आखिर इतना डर क्यों लगता है?
सच कभी नहीं मारता है वह हमेशा जिंदा रहता है सच का सम्मान करने वालों के विचारों में दिलों में जिंदा रहता है।
सच के नाम पर अपनी जान देने वाले शहीदों के लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल होता है जब कि कातिलों के लिए सम्मान पूर्वक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है ऐसे लोगों को क्या कहा जाए। इनका जमीर मुर्दा है या इनका जमीर बिका हुआ है या फिर इनके मां-बाप ने उनकी परवरिश में कोई ना कोई कमी जरूर की है।
लेकिन बहरहाल इससे ना सच के महत्व पर कोई असर पड़ता है और ना ही गलत सही साबित होता है ना तो मजलूम की अहमियत कम होती है ना ही ज़ालिम की पहचान छुपती है।
याद रखो वक्त सबसे ताकतवर होता है।

सैयद एम अली तक़वी
पत्रकार एवं लेखक

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