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इस्लाम में ताज़िया रखना,फूल चढ़ाना ,मातम,रोने की इजाज़त नहीं

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                “फ़रीद अब्बासी”
वरिष्ठ पत्रकार, राष्ट्रीय अध्यक्ष: इंडियन प्रोग्रेसिव.  . जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

ऐसा मैंने हर साल मोहर्रम के दौरान लोगों से सुना पढ़ा है। आज कल बरेलवी मसलक के इमाम अहमद रज़ा ख़ान आला हज़रत के फ़तवे का ज़िक्र हो रहा है।
जोकि ख़ुद इमॉम हुसैन् इब्न्ए इमॉम अ़ल्ईय्ए मुर्तज़ा अलैय्हिस्सलाम और इमॉम हसन इब्न्ए अल्ईय् अलैय्हिस्सलाम से मोहब्बत करने वाले ताज़ियादार थे।
जिनके मज़ार पर आज भी उर्स होता है और फूलों और चादर चढ़ाई जाती है।
ताज़िया लफ़्ज़़ ताज़ियत से बना है ताज़ियत का मतलब अफ़सोस ज़ाहिर करना उनसे जो अल्लाह के रसूल मोहम्मद्ए मुस्तफ़ा स्वल्अल्लॉहो अलैय्इहे व ऑल्एही वसल्लम के ऐह्लअल्बैय्त हैं।
आक़ा कह रहे हैं। फ़ात्एमा स्वल्वात्उल्लॉह अलैय्इहा मेरे जिगर का टुकड़ा है।
जिसने फ़ात्एमा स.अ. को अज़ीयत दी उसने मुझको अज़ीयत दी।
अब सवाल यह उठता है,के फ़ात्एमा
के वह दो आखों के नूर हसन,हुसैन शहीदों की जिनके बारे में रसूल्ए ख़ुद्ऑ स्वल्अल्लॉहो अलैय्इहे व ऑल्एही वसल्लम इरशाॅद फरमा रहे हैं कि इमॉम हसन अ.स., और इमॉम हुसैय्न अ.स. मेरीे आँखों के नूर है ये वही हैं, जिनके लिए आपने सज्द्ए को तूल दे दी, और आक़ा कह रहे है
हुसैय्न्ओ मिन्नी व अना मिन्अल् हुसैय्न।
हुसैन मेरा मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ।
क़ुर्ऑन्ए पाक, पारा नंबर 33 आयत नम्बर 56.
अल्लॉह रब्ब्एकरीम और उसके फ़रिश्ते अपने रसूल पर दुरुद ओ सलाम भेजते हैं,
ऐ ईमान वालों तुम भी उन पर दुरुद ओ सलाम भेजा करो,
लोगों ने आक़ा से पूछा ये दुरुद सलाम कैसे भेजा जाए, तो आपने फ़रमाया :
अल्लाहुम्मा स्वल्ले अल्आ  मोहम्मद्इन् व अल्आ आल्ए मोहम्मद्इन् कमा सल्लैय्य्इता अल्आ  इब्राहीमा व अल्आ आल्ए  इब्राहीमा इन्नाक्आ हमीदुन्म्मजीद, अल्लाहुम्मा बारिक् अल्आ मोहम्मद्इन् व अल्आ आल्ए मोहम्मद्इन् कमा बारिक अल्आ इब्राहीमा व अल्आ आल्ए इब्राहीमा इन्नक्आ हमीद्उन्मजीद।
इससे कोई भी क़ुरऑन पर ईमान रखने वाला मुसलमान इन्कार नहीं कर सकता, क्योंकि हम वही काम कर रहे हैं,
जो अल्लाह और उस रब्ब्एकरीम के फ़रिश्ते मलक् करते आ रहे हैं।
ताज़िये से मोहब्बत वैसे ही है जैसे ख़ान्अए काबा और बैत्उल मुक़द्दस मदीना शरीफ़ की फ़ोटो वाले कैलेंडर से, नक़्श वग़ैरह् से। करते हैं। हम हज और उमरे के दौरान लाई हुई तस्बीह, टोपी और सज्दअ्गाह् का भी एह्त्एमाम करते हैं।
ऐसे हम ताज़िये की ताज़ियत्ओ अफ़सोस ज़ाहिर करते है।
फूल चढ़ाना इत्र लगाना हमारी मोहब्बत्ओ अक़ीदत की निशानी है।
शुरुआती दौरए इस्लाम में ढोल बजाकर ( चूंकि ढोल तेज़ आवाज़ करता है ) लोगों को नमाज़ के वक़्त से आगाह् किया जाता था। जिसकी जगह धीरे-धीरे लाउड्स्पीकर ने ले ली।
जुलूस निकलने से पहले ढोल, ताशे इस वजह से बजाए जाते हैं,कि लोगों को मालूम हो जाए कि जुलूस निकल रहा है।
रही बात रोने की तो यह एक नेचुरल प्रोसेस है,
क़ुरऑन्ए पाक में लिखा है हज़रत याक़ूब अपने बेटे यूसुफ़ की जुदाई में इतना रोए कि उनकी आंखों की रौशनी चली गई।
ख़ुद आक़ा अपने चचा जनाब्ए हमज़ा की शहादत पर रोए,
आक़ा जब अपनी वाल्एदा जनाब्ए ऑम्एना रज़्इअल्लॉहू अ़न्हा की कब्र पर पहुंचे तो आपने गिरयओज़ारी बर्पा किया ( ख़ूब याद करके — रोए )।
ज़्यादातर इस्लामिक किताबों में लिखा है।
क्या आज मुसलमानों का ईमान इतना कमज़ोर है ,जो कुछ बिके हुए लोगो के कहने पर आपस में ना इत्तेफाक़ियां पैदा कर लेते हैं।
“क़ुरऑन्ए पाक”, पारा नंबर 6 आयत नंबर 159, जिन लोगों ने अपने मज़हब/धर्म को टुकड़े-टुकड़े कर दिया और ख़ुद गिरोह्बन्द हो गए।
आपका उनसे कोई संबंध नहीं उनका मामला तो बस अल्लाह के हवाले हैं ।
फिर वह उन्हें बता देगा जो कुछ वह किया करते थे।
और हम बहकावे में आकर गिरोहों में बंट जाने वाली बातों पर चर्चा करना शुरू कर देते हैं।
भाइयों हमारी कब्र में हमारे आमाल(कर्म) होंगे और हम होंगे,
तमाम सवाल हमारे आमाल के मुत्आल्लिक़ ही होंगे।
हमारे अमल ( कर्म ) होने चाहिए के रोज़्ए मैह्शर अल्लाह और उसके रसूल के सामने हाज़िर हो सके।

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