जन्नत अहलेबैत की हक़्क़े मिल्कीयत है, फज़ाएले अम्बिया ही फज़याले अहलेबैत हैं आदम जन्नत के मेहमान थे मालिक नहीं मिल्कीयत अहलेबैत की है यह बात आज यहां आज़ाए शहर लखनऊ के ईमामबाड़ा गुफरामआब में मौलाना सय्यद कलबे जवाद नक़वी ने मुहर्रम के अशरे की पाँचवी
मजलिस को खिताब करते हुए कही।
मौलाना ने कहा कि जन्नत में कोई गुनाह नहीं होता तरके औला होता है और जन्नत का मिज़ाज है उसे तरके औला भी पसंद नहीं आदम को निकाल दिया और कपड़े भी नहीं दिए कपड़े भी रखवालिये ऐ पालने वाले तेरी रहमत तेरी सखावत, इसका मतलब आदम जन्नत के मेहमान थे मालिक नहीं अल्लाह ने आदम के लिए जन्नत का क़ानून नहीं तोड़ा वहीँ शहज़ादी की ज़ुबान से निकला और कपडे जन्नत से आगए इस से साबित होता है कि आदम जन्नत के मेहमान थे हक़्क़ मिल्कीयत और होती है मेहमानी और, मौलाना ने कि आपके यहां कोई मेहमान आजाए आप उसके इन्तिज़ाम के लिए सब कुछ करेंगें लेकिन जब वो जाने लगेगा तो सब कुछ छोड़ कर जाएगा लेकर कुछ नहीं, दूसरी बात जहाँ अहलेबैत होते हैं वहीँ जन्नत होती है चाहे जहाँ खाना मांगवाएं चाहे जहां कपड़े, मौलाना ने मजलिस को खिताब करते हुए कहा कि जब अल्लाह ने अपना खालीफा बनाने को कहा तो फरिश्तों ने कहा परवर्दिगार हम तेरी तस्बीह करते हैं हमने कभी शिर्क नहीं किया अब पता चला कि जिसने ज़िन्दगी में कभी शिर्क ना किया हो उसे ही खालीफा बनने का अख्तियार है यह अलग बात कि वो ना बने,दावा वही कर सकता है जिसने कभी शिर्क ना किया हो, बुतों के आगे ना झुका हो, जो बुतों के आगे सजदा करते थे शिर्क करते थे उन्हें रज़िअल्लाह कहा गया यानी इनसे अल्लाह राज़ी हो गया लेकिन हम अलैहिसस्लाम कहते हैं मस्जिदे हरम के दरवाज़े पर हर सहाबी के नाम के आगे रज़िअल्लाह लिखा है लेकिन मौला अली के आगे कर्रमल्लाहु वजहु लिखा है।
मौलाना ने कहा कि फरिश्तों में एक घुसपैठिया आगया था मुनाफ़िक़ आगया था न व सजदो से पहचाना गया न तौहीद से पहचाना गया जब सजदा करने का हुक्म हुआ तो अपने इंकार से पहचाना गया अल्लाह ने पूछा क्या तू अपने को आलीन में समझता था आलीन की तशरीह अहले सुन्नत के बड़े बड़े आलिमों ने अच्छे अंदाज़ में की है दुर्रे मंसूर में ज़बरदस्त तशरीह है कि आलीन का मतलब बुलंद मरतबा लोग जिनको रब ने सजदा न करने वालों में रखा था मौलाना ने कहा एक सहाबिए रसूल सईद खुदरी ने रसूले इस्लाम से पूछा या रसूल अल्लाह आलीन कौन हैं आपने फरमाया अव्वलना मुहम्मद आख़रना मुहम्मद अली और फ़ातिमा, मौलाना ने कहा फितरूस अर्श का मुजरिम अल्लाह का मुजरिम था तकब्बूर किया था उसने सोलाह हज़ार पर थे बस तकब्बूर में उसके पर अल्लाह ने ले लिए थे ईमाम हुसैन की पैदाइश के वक़्त फ़रिश्ते जोक़ दर जोक़ उतर रहे थे फितरूस ने पूछा क्या बात है तुम लोग कहाँ जा रहे हो बताया नबी के घर नवासा आया है मुबारकबाद देने जा रहा हूँ कहा हमें भी ले चलो फरिश्तों के साथ हो लिया और जब उसने हुसैन के झूले से खुद को मसख किया पहले से ज़ियादा ताक़तवर हो गया फिर उसने दोहराया मन मिसली पहले कहने पर अल्लाह ने मसल दिया अब उसने फिर दोहराया मन मिसली अब सज़ा दोगुनी हो जानी चाहिए थी लेकिन अब वो हुसैन का आज़ाद करदा है, मौलाना ने कहा दो तरह के मुजरिम होते हैं एक अल्लाह का दुसरे हुक़ुक़ुल इबाद का यह हुसैन का मोजिज़ा है कि हुसैन ने अल्लाह के मुजरिम को पहले ही दिन माफ़ कर दिया, मौलाना ने जनाबे हुर और उनके बेटे की शहादत के मसायब पढ़े कैसे हुर ने खुद हुसैन के क़दमों में रखा और फिर हुसैन के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए आज़ादरों ने सहाबीए हुसैन को आँसू बहाकर पुरसा दिया मजलिस का आगाज़ तिलावाते क़ुरआन पाक से क़ारी मासूम ने किया।





