आज मीना कुमारी की बरसी है।
महजबीं अल मारूफ़ मीना कुमारी को अभिनय, शायरी (तख़ल्लुस -नाज़) और गायकी विरासत में मिली थी। उनकी नानी हेम सुंदरी रविंद्र नाथ टैगोर के रिश्ते के भाई जादू नंदन टैगोर की विधवा थीं। मीना कुमारी की माँ प्रभावती देवी जो कामिनी के नाम से स्टेज डान्स करती थीं जिन्होंने मास्टर अली बख़्श से विवाह के बाद इक़बाल बानो का नाम धारण कर लिया था। इक़बाल बानो एक नर्तकी थीं।
मीना कुमारी एक आनचाही औलाद थीं जिन्हें कुछ समय के लिये यतीमख़ाने में रखा गया, अलबत्ता इसकी वजह अस्पताल के ख़र्च के लिये पैसे का अभाव भी बताया जाता है। क़िस्मत का सितम देखिये कि यही मीना कुमारी परिवार का सहारा साबित हुईं। मीना कुमारी के अनुसार उन्होंने केवल चार बरस की आयु से परिवार का ख़र्च उठाना शुरू कर दिया था। बाल कलाकार के रूप में विजय भट्ट के निर्देशन में कई फ़िल्मों में काम किया लेकिन पहचान उन्हें महबूब ख़ान की ‘बहन’ से मिली जिसमें उन्होंने नलिनी जयवंत के बचपन का किरदार अदा किया था। 1946 में ‘बच्चों का खेल’ में आग़ा के सामने उन्हें नायिका का रोल मिला जिसके बाद उन्होंने अनेकों फ़िल्मों में काम किया लेकिन वांछित सफलता अभी दूर थी। 1952 में प्रदर्शित ‘बैजू बावरा’ ने मीना कुमारी को फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड दिलाकर प्रथम श्रेणी की नायिकाओं की फ़ेहरिस्त में पहुँचा दिया।
मीना कुमारी की आवाज़ में एक क़ुदरती modulation था जिसकी तारीफ़ सभी ने की है। मीना कुमारी ने कुछ ग़लत फ़ैसले लिये जिसके उन्हें नुक़सानात भी बर्दाश्त करना पड़े। मीना कुमारी तख़ल्लुस ‘नाज़’ के माध्यम से उर्दू शायरी भी करती थीं, फ़िलिप बाउंड्स और डेज़ी हसन के अनुसार मीना कुमारी के लिये शायरी एक माध्यम था जिसके द्वारा उन्होंने स्वयं को अपनी सार्वजनिक छवि से दूर रखा और इसके द्वारा फ़िल्म इंडस्ट्री की आलोचना करके ख़ुद को वह अवाम का ध्यान आकर्षित करती हैं। मीना कुमारी की शायरी ख़ुद की ज़िंदगी और फ़िल्मी जगत के विषय में बहुत कुछ बताती है।
उफ़क़ के पार जो देखी है रौशनी तुमने
वह रौशनी है ख़ुदा जाने या अंधेरा है
सहर से शाम हुई शाम को यह रात मिली
हर एक रंग समय का बहुत घनेरा है
ख़ुदा के वास्ते ग़म को भी तुम ना बहलाओ
इसे तो रहने दो मेरा, यही तो मेरा है
-असग़र मेहदी





