हज़रत अली की पूरी जिंदगी इस्लाम है: सैयद जुनैद अशरफ किछौछवी
लखनऊ 15 मई, 2020। आॅल इण्डिया मोहम्मदी मिशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद जुनैद अशरफ किछौछवी ने अपने जारी एक बयान मंे कहा कि आज रमज़ान शरीफ 21 तारीख है। मोहम्मदी मिशन ने इसे ‘‘यौमे अली’’ के रूप में मनाया। इस दिन ‘‘अशरफी किचन’’ के भी 45 दिन पूरे किए। यौमे अली के मौके पर हज़रते अली के नाम का तर्बरूक मिशन ने बंटवाया। सैयद जुनैद अशरफ ने कहा कि मुसलमान अली को उनकी बहादुरी व जुल्फिकार से ही उनकी अज़मत समझता है। मगर अली की बहादुरी उनकी अदना सी खूबी है वह इससे कही बालातर है। अली वह जिनके बारे में नबी फरमाये, मैं इल्म का शहर अली उसके दरवाज़े, मैं जिसका मौला अली उसके मौला।
अली वह जो जिनका इल्म बुलंद, अली वह जिनकी सखावत बुलंद, अली वह जिनका फैसला बुलंद, अली वह जिनकी इमामत बुलंद, अली वह जिनका खानदान बुलंद। अली वह जब पैदा हो तो काबा में, देखें तो सबसे पहले रसूल को। जब दुनिया से परदा करे तो भी अल्लाह का घर वह रात भी शबे कद्र हो। किस्मत इसी को कहते हैं कि ज़िन्दगी हो तो अली जैसे शहादत हो तो भी अली जैसे। हज़रत अली का एक वाक्या मशहूर है कि एक बार जंग के मैदान एक मुर्शिरक को वह मारने ही जा रहे थे तभी उसने उनके ऊपर थूंक दिया, आपने उस पर से अपना वार हटा लिया, थोड़ी देर बाद उसको मार दिया। एक शख्स यह मंजर देख रहा था उसने पूछा ‘‘ऐ अली’’ आपने पहले उसे छोड़ा फिर मारा, माजरा कुछ समझ में नहीं आया, हज़रत अली फरमाते है कि मैंने उसे पहले इसलिए छोड़ा कि उसने मेरे ऊपर थूंका, अगर मैं उस वक्त उसको मारता तो यह मेरी ज़ाति लड़ाई होती। इसलिए मैंने उसे छोड़कर थोड़ी बाद मार ताकी लड़ाई ईमानी रहे। इससे हम यह सबक मिलता है कि अली की ज़िन्दगी का हर कदम शरीअते मोहम्मदी के लिए है। वह अपनी ज़ात के लिए न जिए न शहादत पाई। हमें चाहिए कि अगर हम अली की मोहब्बत का दावा करे तो उनके बताए हुए रास्ते पर चलें। गरीबों का खाना खिलाए, अपनी ज़ात से पड़ोसी को परेशान न करें। अपने रिश्तेदारों का ख्याल रखें। अपने मुल्क से मोहब्बत रखें। इस कोरोना की वबा में जितना हो सके दूसरों का ख्याल करें।

