पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। ब्रिटेन ने इस संवेदनशील समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित और खुला रखने के लिए एक बड़ी बहुपक्षीय पहल की है, जिसमें भारत को भी भागीदार बनाया गया है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की ओर से भारत को इस बैठक में आमंत्रित किया गया है, और भारत की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिसरी वर्चुअल रूप से इसमें शामिल हो रहे हैं। ��
यह बैठक उन 35 देशों के बीच हो रही है, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री आवाजाही की निरंतरता पर चर्चा कर रहे हैं। इस समिट का मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्ग पर आवाजाही की स्वतंत्रता बहाल करना, फंसे हुए जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, और वैश्विक तेल-गैस आपूर्ति श्रृंखला को फिर से सुचारु बनाना बताया जा रहा है। ��
क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जिससे बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस गुजरती है। इसके बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर सीधा असर पड़ता है और कई देशों की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। ��
भारत के लिए भी यह मार्ग बेहद अहम है, क्योंकि देश का एक बड़ा हिस्सा तेल आयात इसी रास्ते से होकर आता है। इसी कारण भारत की ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार की स्थिरता इस मुद्दे से सीधे जुड़ी हुई है। �
बैठक में कौन-कौन शामिल
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस वर्चुअल बैठक की अगुवाई ब्रिटेन की विदेश मंत्री यवेट कूपर कर रही हैं। बैठक में भारत के अलावा फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, जापान, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड सहित कई बड़े देश शामिल हैं। अमेरिका इस बैठक का हिस्सा नहीं है। ���
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पुष्टि की है कि यूके की ओर से भारत को इस बहुपक्षीय वार्ता में आमंत्रित किया गया है और विदेश सचिव भारत की तरफ से वर्चुअली भाग ले रहे हैं। ��
भारत की भूमिका क्या हो सकती है
भारत की भागीदारी इस बात का संकेत है कि वह पश्चिम एशिया की स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता को कितनी गंभीरता से देखता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत जैसे बड़े आयातक देश की मौजूदगी से बैठक को और अधिक व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण मिल सकता है। ��
भारत पहले भी इस संकट पर चिंता जता चुका है और भारतीय तेल टैंकरों तथा व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर आंतरिक स्तर पर समीक्षा बैठकें कर चुका है। इससे साफ है कि होर्मुज क्षेत्र की अस्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल है। �
बैठक का संभावित असर
अगर यह बहुपक्षीय पहल सफल होती है, तो होर्मुज में नौवहन फिर से सामान्य होने की दिशा में ठोस कदम उठ सकते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और समुद्री यातायात पर पड़े दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है। ��
हालांकि, मौजूदा हालात को देखते हुए यह प्रक्रिया आसान नहीं मानी जा रही है, क्योंकि क्षेत्र में सैन्य और राजनीतिक तनाव लगातार बना हुआ है। फिर भी 35 देशों की यह बैठक एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयास के रूप में देखी जा रही है।
ब्रिटिश पीएम ने होर्मुज समिट के लिए भारत को दिया न्योता, 35 देशों की बैठक में शामिल होगा भारत





