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नेपाल की सड़कों पर लोकतंत्र विरोधी प्रदर्शन: राजशाही की वापसी और हिंदू राष्ट्र की मांग तेज

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काठमांडू: नेपाल की सड़कों पर इन दिनों लोकतंत्र विरोधी प्रदर्शन उफान पर हैं। हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं और वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था को खारिज करते हुए राजशाही की वापसी की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकार उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही है। उनकी प्रमुख मांग है कि पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के नेतृत्व में राजशाही बहाल की जाए और नेपाल को एक संवैधानिक हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाए।
प्रदर्शन की पृष्ठभूमि और कारण
नेपाल में पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असंतोष गहराता जा रहा है, जो इन प्रदर्शनों का आधार बना है। प्रदर्शनकारी मौजूदा व्यवस्था से नाराजगी के कई कारण गिनाते हैं:
राजनीतिक अस्थिरता: 2008 में राजशाही के अंत के बाद से नेपाल में स्थिर सरकार का अभाव रहा है। पिछले 17 वर्षों में 13 प्रधानमंत्री सत्ता में आए, लेकिन कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। बार-बार सरकार बदलने से नीतिगत अस्थिरता और विकास कार्यों में रुकावट आई है।

आर्थिक संकट: देश में बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और मुद्रास्फीति ने आम जनता का जीवन मुश्किल कर दिया है। युवाओं में रोजगार के अवसरों की कमी और महंगाई ने असंतोष को और बढ़ावा दिया है।

सांस्कृतिक पहचान: नेपाल की बहुसंख्यक आबादी हिंदू है और परंपरागत रूप से राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। प्रदर्शनकारी मानते हैं कि राजशाही की वापसी उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगी।

प्रदर्शनकारियों की मांगें
प्रदर्शनकारी न केवल राजशाही की बहाली चाहते हैं, बल्कि वे नेपाल को एक संवैधानिक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं। उनका तर्क है कि वर्तमान धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था उनकी सांस्कृतिक विरासत के साथ न्याय नहीं कर रही। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह, जिन्हें 2008 में सत्ता से हटा दिया गया था, को वे एकमात्र ऐसा नेता मानते हैं जो देश को स्थिरता और समृद्धि की ओर ले जा सकता है।
सरकार का सख्त रुख
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने इन प्रदर्शनों को दबाने के लिए कड़ा रुख अपनाया है। कई शहरों में सेना तैनात की गई है और कुछ संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू लागू किया गया है। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर हिंसा और अराजकता फैलाने का आरोप लगाया है। साथ ही, ओली सरकार ने इन प्रदर्शनों के पीछे भारत सरकार का हाथ होने का सनसनीखेज आरोप लगाया है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, इस दावे का कोई ठोस सबूत अभी तक सामने नहीं आया है।
आगे क्या?
ये प्रदर्शन नेपाल के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं। जहां एक ओर प्रदर्शनकारी राजशाही को देश की समस्याओं का समाधान मानते हैं, वहीं सरकार और लोकतंत्र समर्थक इसे इतिहास में पीछे ले जाने वाला कदम करार दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह आंदोलन किस दिशा में बढ़ता है, यह नेपाल की राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय समीकरणों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
फिलहाल, देश में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है।

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