नई दिल्ली, 6 अप्रैल 2025: भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और नियमन को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024, जिसे संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में बहुमत से पारित किया गया था, पर महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपनी मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही यह विधेयक अब कानून बन गया है और देश में वक्फ बोर्ड की शक्तियों और संपत्तियों के प्रबंधन में बड़े बदलाव का रास्ता साफ हो गया है।
संसद में पारित होने की प्रक्रिया
वक्फ संशोधन विधेयक 2024 को सबसे पहले 8 अगस्त 2024 को लोकसभा में पेश किया गया था। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा पेश किए गए इस बिल पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया था, लेकिन सरकार ने इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजकर सभी पक्षों से राय लेने का फैसला किया। जेपीसी ने अपनी 655 पेज की रिपोर्ट में 14 प्रमुख संशोधनों का सुझाव दिया, जिसे सरकार ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद 2 अप्रैल 2025 को यह बिल लोकसभा में दोबारा पेश किया गया।
लोकसभा में 12 घंटे की लंबी बहस के बाद 288 सांसदों ने इसके पक्ष में और 232 सांसदों ने विरोध में वोट दिया। इसके अगले दिन, 3 अप्रैल 2025 को यह बिल राज्यसभा में पेश किया गया, जहां देर रात चली चर्चा के बाद 128 सांसदों ने समर्थन और 95 ने विरोध में मतदान किया। दोनों सदनों से बहुमत हासिल करने के बाद यह बिल राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा गया था।
राष्ट्रपति की मंजूरी
5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर अपने हस्ताक्षर कर दिए, जिसके बाद यह औपचारिक रूप से कानून बन गया। राष्ट्रपति भवन से जारी एक बयान में कहा गया कि यह कानून वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया है। इसकी अधिसूचना जल्द ही जारी की जाएगी, जिसके बाद नए नियम लागू हो जाएंगे।
बिल के प्रमुख प्रावधान
नए कानून में कई अहम बदलाव किए गए हैं, जो वक्फ बोर्ड की शक्तियों को सीमित करने और संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता लाने पर केंद्रित हैं। इनमें से कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण अनिवार्य: अब वक्फ बोर्ड को अपनी सभी संपत्तियों को जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में पंजीकृत कराना होगा। इससे संपत्तियों के मालिकाना हक की जांच होगी और अवैध दावों पर रोक लगेगी।
गैर-मुस्लिम सदस्यों की भागीदारी: केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, कम से कम दो महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी अनिवार्य होगा।
सर्वेक्षण का अधिकार: पहले सर्वेक्षण आयुक्त के पास वक्फ संपत्तियों की जांच का अधिकार था, लेकिन अब यह जिम्मेदारी जिला कलेक्टर या उनके समकक्ष अधिकारी को दी गई है।
वक्फ निर्माण की शर्त: वक्फ बनाने वाले व्यक्ति को कम से कम पांच साल तक इस्लाम का पालन करने की शर्त जोड़ी गई है, जो पहले के नियमों को उलटती है।
अनधिकृत हस्तांतरण पर सजा: वक्फ संपत्तियों के अनधिकृत हस्तांतरण या अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
सरकार का दावा और विपक्ष का विरोध
केंद्र सरकार ने इस कानून को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में सुधार और पारदर्शिता लाने वाला कदम बताया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह बिल मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि अवैध कब्जों और कुप्रबंधन को रोकने के लिए है। वहीं, अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे गरीब मुस्लिमों के हित में बताया।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने इसे असंवैधानिक और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ बताया है। कांग्रेस सांसद सैयद नसीर हुसैन ने आरोप लगाया कि यह बिल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि वे इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
आगे की राह
नए कानून के लागू होने के बाद अब इसकी असल परीक्षा होगी। वक्फ बोर्ड के पास देशभर में करीब 9.4 लाख एकड़ जमीन और 8.7 लाख संपत्तियां हैं। इनके प्रबंधन में बदलाव से कई विवादों का समाधान होने की उम्मीद है, लेकिन विपक्ष और मुस्लिम संगठनों के विरोध को देखते हुए कानूनी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला जल्द ही सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकता है, जैसा कि धारा 370 के मामले में हुआ था।
फिलहाल, यह कानून भारत के अल्पसंख्यक समुदाय और संपत्ति प्रबंधन के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने जा रहा है। इसके प्रभाव को देखने के लिए सभी की नजरें अब इसके कार्यान्वयन पर टिकी हैं।
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