मेरे कुछ दीनी भाइयों ने मुझसे कहा कि आपके कब्रिस्तानो में मासूमीन के नाम का पत्थर कब्र पर लगाते हैं,
जिस पर न समझ लोग अपने नाजिस पैर जूते चप्पल सहित उस पर रखकर खड़े होते हैं,
जिससे मासूमीन के नामो की बेहुरमती होती है,
ये वो नाम है जिस पर अल्लाह और उसके फरिश्ते दुरूद सलाम भेजते हैं,
मैंने उनसे कहा कि कुछ वर्ष पहले मैंने कब्रिस्तान में देखा था कि क़ौम अपने परिजनों कि कच्ची क़ब्रओं पर निशां देही के लिए पठरा लगाकर तक़ती पर मरने वाले का नाम लिखते थे,
कब्रिस्तान में आने वालों के पैरों के नीचे तक़ती नहीं आती थी,
धीरे-धीरे लोगों के पास पैसा हो गया,
हमारे समाज में पक्की क़ब्रओं का चलन शुरू हो गया,
जिस पर मृतक का नाम वल्द व पूरा पता लिखने लगे,
जिस पर हमारे पहले के ओलीमाओ ने काफी एहतराज़ किया,
लेकिन इस वक्त के लखनऊ के ओलिमा ऐसे अहम मुद्दे पर चुप बैठे हैं,
जहां तक इस संबंध में जिम्मेदार उस कब्रिस्तान के देखभाल करने वाले व मुतावली भी है
जो ऐसे कामों को नहीं रोक रहे हैं,
मैंने उनसे कहा कि मेरे बुजुर्ग जो तबरूक मजलिस में तक़सीम करते वक्त ज़मीन पर गिर जाता था,
वो भी आंखों पर लगवा कर खिलाते थे,
जिस चीज़ की निस्बत मासूमीन से हो जाती थी,
जैसे दरगाह का फूल,धागा, अगरबत्ती की राख का बड़ा अहतराम करवाते थे,
इनमें से कुछ चीज़े बीमार के शिफा के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था,
उसकी बेहूरमती होने से बहुत डाटते थे,
अल्लाह की किताब, हदीसे रसूल व उनकी अहलेबैत, 12 इमाम, 14 मासूमों के नाम उनसे निस्बत की भी कोई भी चीज का एहतराम हमारा फर्ज बनता है,
अल्लाह माफ करें उन सब को जिससे ऐसा गुनाह हुआ है, और कब्रिस्तान के देखभाल करने वाले,
ऐसे काम होने से रोके
आशिक़े अहलेबैत
शब्बीर हुसैन
6388490320



