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आज विश्व गौरैया दिवस है।

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आज विश्व गौरैया दिवस है। एक ऐसा पक्षी जिससे बचपन की सुनहरी यादें जुड़ी हैं। परिंदों में सबसे क़रीब और सबसे प्रिय रही। बिना पाले ही हमेशा घर का हिस्सा रही। सुबह से शाम तक कभी छत पर, कभी आंगन, कभी खिड़की, कभी रौशन दान तो कभी बारजे पर नज़र आ जाती थी। जैसे गुज़रती हुई ज़िंदगी का हिस्सा हो। उसे देखकर कितनी सुखद अनुभूति होती थी बयाँ करना मुश्किल है। अम्मा जब भी चावल चुन रही होतीं ढेर सारी गौरैया आस पास इकट्ठा हो जाती थी। उन्हें माँ खाने को चावल की किनकी देती थी। ये सब मंज़र देखकर बचपन में जो ख़ुशी मिलती थी उसकी अपनी लज़्ज़त थी जो अब नसीब नहीं। घर पर इनकी उपस्थिति इतनी अधिक आसान और सुलभ होती थी की मन पकड़ने और पालने का करता। इन्हें पकड़ना भी आसान था सो अक्सर दौरी से ढक कर पकड़ भी लिया। उस दौरी में दाना देना और धीरे से देखना भी उसी देखने दिखाने में उड़ भी जाती थी तो कभी बड़ों के दबाव में इन्हें छोड़ना भी पड़ता था। जी करता इनके लिये अच्छा सा घर बना दें उसी में रहें हम उसमें अच्छा खाना पानी दें। इन्हें देखकर हम खुश हो जाया करें। फिर कभी ये ख्याल आता के काश हमारे इनके बीच ऐसा यक़ीन और समझ विकसित हो जाए के हम इन्हें सुबह छोड़ दें और ये शाम तक वापस आ जाएं। हम कोई इनका बुरा थोड़े चाहते हैं। यही सब बचपना था जिसे ज़िंदगी का सुनहरा वक़्त कहा जाता है। गौरैया का आना, दाने चुगना, घर के किसी भी स्थान पर पड़े पानी से खेलना और अचानक फुर्र से उड़ जाना बड़ा सुखद एहसास कराता था। वक़्त धीरे धीरे अपनी रफ़्तार से गुजरता रहा। उम्र बढ़ती गयी। भाग दौड़, चिंता बढ़ती गयी। वक़्त और उम्र के साथ हालात और ज़िंदगी जीने के तौर तरीक़े बदलते गए। कुछ नये लोग ज़िंदगी के सफ़र में जुड़ गए कुछ बेहद ख़ास जिनके बिना जीना मुश्किल वो साथ छोड़ गए जिसपर अपना बस भी नहीं था। कालचक्र का हिस्सा था। जिसे मान लेना मजबूरी भी और ज़रूरी भी था। वक़्त के साथ विकास की अपनी अलग रफ़्तार भी जारी रही। जिसने पर्यावरण पर अपना प्रभाव छोड़ा जिसकी वजह से प्रकृति और प्राकृतिक आनंद भी दूर होता गया जो इंसानी ज़िंदगी के लिए हमेशा अहमियत रखती है। इसी पर्यावरण के प्रभावित और प्रदूषित होने का नतीजा रहा के बचपन की साथी, ज़िंदगी का हिस्सा गौरैया भी हमसे दूर होती गई। हमारे बचपन में बिजली के तार, पेड़ और घर आगन में इफरात नज़र आने वाली गौरैया अब कभी कभार इक्का दुक्का ऐसे दिख जाती है। मानों कोई बिछड़ा यार मिल गया हो या फिर अचानक से कोई पुरानी याद आ गई हो। मालिक इन्हें जितनी भी तादाद में बची हों सलामत रखे। हम सबको भी इन्हें बचाने की तौफीक अता करे मालिक।
(तनवीर अब्बास शास्त्री)

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