फिलिस्तीन में जारी संकट के बीच संयुक्त राष्ट्र में तैनात एक अमेरिकी डॉक्टर ने वहाँ की भयावह स्थिति का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है। अपनी भावनाओं को संभाल न पाने के कारण उनकी आँखें छलक पड़ीं, जब उन्होंने एक घायल महिला के दर्द को साझा किया। डॉक्टर ने बताया कि उनके सामने एक ऐसी महिला को लाया गया, जिसकी आँखों में आँसू थे, मगर वह अपनी पीड़ा को शब्दों में बयान करने में असमर्थ थी। उसकी गोद में उसका सात दिन का नवजात शिशु नहीं था, जो घर के मलबे में कहीं खो गया था। इतना ही नहीं, उसके दो अन्य बच्चे भी उसी मलबे के नीचे दब गए थे।
डॉक्टर के इस बयान ने फिलिस्तीन में मानवीय संकट की गहराई को उजागर किया है। उन्होंने कहा, “जिनका हमसे इंसानी हुकूक (मानवाधिकार) का रिश्ता है, वे हमारे लिए दर्द से तड़प रहे हैं। मगर अफसोस, जिनका हमसे कलम का रिश्ता है—जो लेखक, पत्रकार या बुद्धिजीवी हैं—वे हमारे इस दर्द से गाफिल हैं।” यह कथन न केवल पीड़ितों की व्यथा को रेखांकित करता है, बल्कि दुनिया भर के उन लोगों पर भी सवाल उठाता है, जो इस त्रासदी को आवाज देने की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं।
इस घटना ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान फिलिस्तीन में जारी हिंसा और उसके मानवीय परिणामों की ओर खींचा है। क्या यह मूक दर्द अब भी अनसुना रहेगा, या इसे न्याय और सहायता की पुकार में बदला जाएगा? यह सवाल हर संवेदनशील मन के सामने है।
संयुक्त राष्ट्र में तैनात अमेरिकी डॉक्टर की आंखों से छलके आंसू: फिलिस्तीन के दर्दनाक मंजर का बयान



