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शिबू सोरेन: एक राजनीतिक विरासत और संघर्ष की कहानी

शिबू सोरेन, जिन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना जाता था, एक प्रमुख भारतीय राजनेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक थे। उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को पुराने बिहार के हजारीबाग जिले के नेमरा गांव में एक आदिवासी संथाल परिवार में हुआ था। शिबू सोरेन ने अपने जीवन में आदिवासियों के अधिकारों और झारखंड राज्य के निर्माण के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया।

*राजनीतिक संघर्ष और झामुमो की स्थापना*

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन 1970 के दशक में शुरू हुआ, जब उन्होंने आदिवासियों के शोषण, विशेष रूप से महाजनी प्रथा और ‘दिकू’ (बाहरी लोगों) के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। 1973 में उन्होंने बंगाली मार्क्सवादी ट्रेड यूनियन नेता ए.के. रॉय और कुर्मी-महतो नेता बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर धनबाद में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की। यह संगठन आदिवासियों के अधिकारों और अलग झारखंड राज्य की मांग का प्रतीक बना।

*झारखंड के मुख्यमंत्री तक का सफर*

शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन वे कभी भी पूर्ण कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उन्होंने 2004 में मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री के रूप में भी कार्य किया, लेकिन चिरूडीह कांड के कारण इस्तीफा देना पड़ा। शिबू सोरेन 8 बार लोकसभा सांसद और 3 बार राज्यसभा सांसद रहे।

*निधन और श्रद्धांजलि*

शिबू सोरेन का निधन 4 अगस्त 2025 को नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में हुआ। उनके निधन पर कई प्रमुख नेताओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद, और कांग्रेस नेता राहुल गांधी शामिल थे। झारखंड विधानसभा और राज्यसभा में भी शिबू सोरेन के सम्मान में श्रद्धांजलि दी गई।

*विरासत और प्रभाव*

शिबू सोरेन की विरासत और प्रभाव आज भी झारखंड में महसूस किया जाता है। उनकी स्थापित झामुमो और उनकी राजनीतिक विरासत आज उनके बेटे हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड में मजबूत सरकार के रूप में जीवित है। शिबू सोरेन के निधन ने झारखंड और देश के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में एक बड़ा शून्य छोड़ा है, लेकिन उनकी विचारधारा और आंदोलन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।

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