वक्फ संशोधन बिल 2024 को लेकर संसद में जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी की रिपोर्ट पेश की जा चुकी है। सत्ताधारी पक्ष (एनडीए) इस बिल को पूरी तरह से पास करने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, विपक्ष, मुस्लिम समुदाय और सेकुलर विचारधारा वाले लोगों के विरोध के कारण स्थिति जटिल हो गई है। एनडीए के गठबंधन में शामिल छोटे दलों को भी सावधानी से कदम उठाना होगा, क्योंकि इन दलों की अपने-अपने राज्यों में अपनी अलग विचारधारा और व्यक्तिगत वोट बैंक है। ऐसे में अगर ये दल नाराज हो गए, तो सत्ताधारी पक्ष के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
दूसरा विकल्प यह है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इन छोटे दलों को अपने में मिला ले और उनकी आवाज को अपनी आवाज के साथ जोड़ दे। इससे बीजेपी अपने संकल्प पत्र में किए गए वादों पर थोड़ा समझौता कर सकती है। लेकिन इसका नुकसान यह होगा कि इन छोटी पार्टियों के संस्थापकों का प्रभाव खत्म हो जाएगा। उनकी वंशवादी राजनीति और अपनी पार्टी के जरिए बनाया गया दबदबा कमजोर पड़ सकता है। इस तरह, बीजेपी को अपने सहयोगियों के साथ तालमेल बिठाने और बिल को पास करने के बीच संतुलन बनाना होगा।
शाबू ज़ैदी




