मुंबई, 19 जून 2025: महाराष्ट्र सरकार ने कक्षा 1 से 5 तक हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने के फैसले को वापस ले लिया है। यह निर्णय महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे और उनकी पार्टी के तीव्र विरोध के बाद लिया गया। इस मुद्दे पर राज्य में सियासी घमासान मच गया था, जिसमें विपक्षी दलों ने भी सरकार की आलोचना की थी।
महाराष्ट्र सरकार ने अप्रैल 2025 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा बनाने का आदेश जारी किया था। इस फैसले का उद्देश्य त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू करना था, जिसके तहत मराठी, अंग्रेजी और हिंदी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना था।
हालांकि, इस निर्णय का मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे “मराठी अस्मिता पर हमला” करार देते हुए कहा कि हिंदी कोई राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि एक क्षेत्रीय भाषा है। ठाकरे ने 17 जून को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर हिंदी की अनिवार्यता हटाने की मांग की थी और स्कूलों को चेतावनी दी थी कि वे इस नीति का पालन न करें। मनसे कार्यकर्ताओं ने कई शहरों में हिंदी की पाठ्यपुस्तकें फाड़ने और जलाने जैसे आक्रामक कदम उठाए।
राज ठाकरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “महाराष्ट्र में सिर्फ मराठी और अंग्रेजी पढ़ाई जानी चाहिए। हिंदी को थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर गुजरात में हिंदी अनिवार्य नहीं है, तो महाराष्ट्र में क्यों?” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला केंद्र और राज्य सरकार की मिलीभगत का हिस्सा है।
विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने भी इस फैसले की आलोचना की। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने इसे “मराठी संस्कृति पर हमला” बताया, जबकि अन्य नेताओं ने मराठी भाषा की प्राथमिकता की रक्षा की मांग की।
विरोध के बाद, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है। उन्होंने कहा, “मैंने राज ठाकरे से बात की है और उन्हें समझाया है कि नया सरकारी आदेश हिंदी को वैकल्पिक बनाता है। अगर किसी कक्षा में 20 से अधिक छात्र हिंदी के बजाय अन्य भारतीय भाषा चुनते हैं, तो उन्हें वह विकल्प दिया जाएगा।”
22 अप्रैल 2025 को, स्कूल शिक्षा मंत्री दादाजी भुसे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि हिंदी अनिवार्यता के फैसले पर रोक लगा दी गई है। सरकार ने एक नया सरकारी प्रस्ताव (GR) जारी किया, जिसमें कहा गया कि पहली से पांचवीं कक्षा तक केवल दो भाषाएं—मराठी और अंग्रेजी—पढ़ाई जाएंगी, और हिंदी वैकल्पिक रहेगी।
राज ठाकरे ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा, “सरकार ने समय रहते निर्णय वापस लिया, इसके लिए धन्यवाद। लेकिन हम सतर्क रहेंगे कि भविष्य में हिंदी को थोपा न जाए। महाराष्ट्र में सिर्फ मराठी की चलेगी।”
हालांकि, फडणवीस ने यह भी कहा कि त्रिभाषा नीति NEP का हिस्सा है और इसका उद्देश्य छात्रों के बौद्धिक विकास को बढ़ावा देना है। उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां भी इस नीति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन इसे लागू करना पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आगामी बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनावों को ध्यान में रखकर गरमाया गया, क्योंकि मनसे मराठी मतदाताओं को एकजुट करने के लिए भाषाई अस्मिता के मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर रही है।
इस फैसले से स्कूल प्रशासन और अभिभावकों में असमंजस की स्थिति थी, लेकिन संशोधित आदेश ने स्पष्टता लाने की कोशिश की है। अब देखना यह है कि क्या यह मुद्दा शांत होता है या भविष्य में फिर से सियासी तूल पकड़ेगा।
महाराष्ट्र में हिंदी अनिवार्यता का फैसला वापस, राज ठाकरे के विरोध के बाद सरकार का यू-टर्न





