शरीअते इस्लामिया में निकाह के ज़रीये मर्द व औरत के दरमियान एक दीनी व मज़हबी लगाव और एक मखसूस कल्बी तअल्लुक पैदा होता है। उनके दरमियान उलफत व यगांगत और उखुव्वतो महब्बत का माहौल पैदा होता है। दो अजनबी अफाद के दरमियान से अजनबीयत ख़त्म होकर उखुव्वतो महब्बत का एक पाकीज़ा रिश्ता पैदा होता है और यह रिश्ता महज़ नफ़सानी और जिन्सी ख़्वाहिशात की तकमील का ज़रिया नहीं होता बल्कि इससे मक़सूदे असली यह है कि मर्दों औरत के हम रिश्ता होने से एक कामिल और खुशगवार ज़िन्दगी वजूद में आये और नस्ले इन्सानी का सिलसिला आगे बढ़े। इसलिए रब्बे कायनात ने नौए इन्सान ही से उस का जोड़ा बनाया ताकि दोनों में उलफ्तो मोहब्बत कायम रहे और तख़लीके इन्सानी का सिलसिला दस्तूर के मुताबिक जारी रहे और नस्ले इन्सानी फलती फूलती रहे। और इन्सान दरिन्दों की तरह ज़िन्दगी न गुज़ार कर फ़रिश्ता सिफत बन जाये और अपने हम-जिन्स से मिलकर तस्कीने कल्ब हासिल करे।
निकाह मर्द के लिए सुकूने कुल्ब और गुनाहों से बचने का अज़ीम ज़रिया है। निकाह से इन्सान हज़ारों गुनाहों से बच जाता है। बिलख़ुसूस जिना से महफूज़ रहता है। इसी वजह से निकाह को निस्फे ईमान भी कहा गया है।
●कुरान:- अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है:
” और उसकी निशानियों से है कि तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स से जोड़े बनाये कि उनसे आराम पाओ और तुम्हारे आपस में महब्बत और रहमत रखी।” (सूरह रुम)
❤️हदीस:- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः “ऐ जवानो! तुम में से जो कोई निकाह की इस्तिताअत रखता है वह ज़रूर निकाह करे कि यह अजनबी औरत की तरफ नज़र करने से निगाह को रोकने वाला है और शर्मगाह की हिफाज़त करने वाला है और जिसमें निकाह की ताक़त न हो वह रोज़ा रखे क्योंकि यह शहवत को कम करता है।”
(बुखारी शरीफ जिल्द 2, पेज 758)