शाहजहाँ की यादगार इमारतों के साए में भले ही #जहाँआरा बेगम को अक्सर भुला दिया जाता है, लेकिन 17वीं सदी के #मुगल वास्तुकला को आकार देने में उनकी अहम भूमिका रही है। इतिहासकार हरबर्ट चार्ल्स फानशॉ अपनी किताब “मुगल आर्किटेक्चर” (1902) में लिखते हैं कि जहाँआरा को न सिर्फ डिजाइन की गहरी समझ थी बल्कि मुगल सौंदर्यशास्त्र की भी बारीक पसंद थी.
उनका प्रभाव सबसे ज्यादा 1648 में उनके पिता द्वारा स्थापित नई राजधानी शाहजहानाबाद के ढांचे और नक्शे में दिखाई देता है। जहाँआरा ने शाहजहानाबाद की अठारह इमारतों में से पांच बनवाने में अहम भूमिका निभाई, जिन्हें औरतों ने बनवाया था। उनका सबसे मशहूर योगदान बेशक चांदनी चौक है, जो शाहजहानाबाद की रग-रग में बहता मुख्य बाज़ार है।
फ्रांस्वा बैर्नियर, एक फ्रांसीसी डॉक्टर जो मुगल दरबार में सेवा करता था, ने अपनी किताब में चांदनी चौक की तुलना पेरिस के शानदार पाले रॉयल से की थी । जहाँआरा के समय चांदनी चौक में एक खूबसूरत सराय (सड़क के किनारे का सराय) और बारीकी से सजाए हुए बाग़ भी हुआ करते थे। चांद की रोशनी को दर्शाती हुई बीच की नहर, जिसकी बैर्नियर ने भी तारीफ की थी, इस व्यापारिक केंद्र की खूबसूरती को और बढ़ाती थी।
जहाँआरा की विरासत सिर्फ शाहजहानाबाद की दीवारों तक ही सीमित नहीं है। उन्हें 1648 में बनकर पूरी हुई #आगरा की भव्य जामा मस्जिद के निर्माण का भी श्रेय दिया जाता है। पूरी तरह से अपने ही ख़र्च से बनवाई गई। उसी तरह, उन्होंने जामा मस्जिद से जुड़े एक मदरसे (इस्लामी शिक्षा का विद्यालय) की भी स्थापना की, जो उनकी आस्था और तालीम दोनों के लिए जुनून को दर्शाता है।
जहाँआरा का स्थापत्य प्रभाव भले ही सीधा नज़र ना आए, लेकिन वो निर्विवाद है। उनके सूझ-बूझ भरे फ़ैसलों और कुशल संरक्षण ने मुगल भारत की भव्यता को निखारने में मदद की। उनकी ये विरासत आज भी हमारे बीच है – हलचल भरे बाज़ार, शांत उद्यान और शानदार मस्जिदें, जो हमें आज भी मंत्रमुग्ध कर देते





