बात उन दिनों की है जब दूरदर्शन पे सिर्फ Sunday शाम एक हिन्दी फ़िल्म दिखाई जाती थी। परिवार के साथ मैं भी बैठ जाती थी मगर फ़िल्म समझ कुछ नहीं आती थी ????
ना hero heroin पहचानती थी, और ना ही कहानी पल्ले पड़ती थी। बस इतना समझ आता था कि कोई हस रहा है, रो रहा है, ग़ुस्से मे है या नाच गा रहा है।बस ऐसा समझिये कि ये Sunday evening की family drill thi जिसमे हमे participate करना ही पड़ता था, और कोई चारा नहीं था ????????
एक supporting actress जिसे टीवी पे देखकर मैं बहुत impress होती थी, तब उनका नाम नहीं पता था पर उनकी आँखो में ग़ज़ब का जादू था। बड़ी ही चुलबुली सी पर्सनालिटी, black eyeliner से सजी उनकी तीखी आँखें जैसे मुझे hypnotise कर देती थी ????
मैं जब भी फ़िल्म देखने बैठती मन ही मन सोचती कि काश वही आँखें देखने को मिल जाये इस फ़िल्म मे भी, और यक़ीन मानिये कई बार वो आ भी जाती थी फ़िल्म बीच फ़िल्म मे, मेरी तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता था उन्हें टीवी पे देखकर, इतनी पसंद थी मुझे कई साल बाद पता चला उनका नाम मनोरमा है




