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आर्यों का इतिहास


संघ परिवार के इतिहासकार आज कल कई नई नई तरह की खोजें कर रहे हैं,उन्हें इसका अधिकार है,और उनका यह अधिकार भला उनसे कौन छीन सकता है,लेकिन उनकी खोजों को ठोस तथ्यों के प्रकाश में स्वीकार या अस्वीकार करनें का दूसरों को भी वैसा ही अनुल्लंघनीय अधिकार है,संघी इतिहासकार इस बात पर विशेष जोर दे रहे हैं,कि आर्य भारत से बाहर से नहीं आये हैं,पर जब उनसे यह सवाल पूंछा जाता है कि आखिर आर्य थे कौन तो सांप सूंघ जाता है,इसलिए सबसे पहले तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर आर्य थे कौन.?.अंदर बाहर की बात तो बाद में तय कर ली जाएगी,
आर्यों के ऋग्वेद पर यदि एक नजर डालें तो यह पता चलता है कि यह मात्र दस परिवारों की एक रचना है,जिसमें प्रमुखता से वशिष्ठ,अंगिरस,कश्यप तथा विश्वामित्र आदि प्रमुख हैं,ऋग्वेद के 1028 सूक्तों से 34 सूक्तों में आर्य शब्द का इस्तेमाल हुआ है,उनमें से 28 भरत,वशिष्ठ, और अंगिरस परिवारों द्वारा रचित हैं,दिवोदास,वर्धश्व तथा सुदास की ओर संकेत करता है,यदि आवृत्ति दर से देखें तो 19 में से तीन सूक्तों में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है और इसका प्रयोग करने वाला भरत परिवार सबसे ऊपर आता है,इससे स्पष्ट है कि एक से ऊपर एक आवृत्ति दर केवल भरत वंश के सहयोगी पुरोहित वंशो में से ही है,वशिष्ठ और अंगिरस सहयोगी पुरोहित वंशों में से ही हैं,
वशिष्ठ और अंगिरस,यह दर्शाता है कि भरत वंश एवम उसके सहयोगी ही आर्य थे (ऋग्वेद 8-103-1)और दूसरी जगह इन्द्र को भी आर्यों का देव कहा गया है (ऋग्वेद -8-51-9),इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भरतवंश ही आर्य थे,उन्ही के राजा दिवोदास को आर्य कहा गया है,ऋग्वेद में अनेक कबीलों का उल्लेख मिलता है,जैसे सूर्यवंश,इक्ष्वाकु,तृक्षि आदि तथा चंद्रवंशी,तुर्वश,द्रहयु,अनु और पुरु,भरतवंश इस पुरुवंश की शाखा है,राम इसी इक्ष्वाकु वंश से सम्बद्ध हैं,आर्यों के वेदों की रचना किसी एक आर्य कबीले नें नहीं बल्कि सभी कबीलों नें मिलकर की थी.
बालगंगाधर तिलक के अनुसार आर्य उत्तरी ध्रुव के निवासी हैं,डा.पी.गाइल्स एवं प्रो.मैकडोनल नें मध्य यूरोप (ऑस्ट्रिया एवम हंगरी) को आर्यों का निवास स्थान बताया है,कईयों का मत है कि आर्य मूलतः बाल्टिक सागर के पश्चिमी तट के रहनें वाले नेहरिंग के अनुसार दक्षिणी रूस,मॉर्गन के अनुसार पश्चिमी साइबेरिया और पोर्कोर्न के अनुसार सफेद रूस आर्यो का आदि स्रोत है,स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू नें भी आर्यो का मूल विदेशी बताया है,अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो तत्कालीन प्रसिद्ध इतिहासकार मेगास्थनीज के अनुसार आर्य बाहर से आये हुए लोग हैं जिन्होंने सर्वप्रथम हिमालय की तलहटी क्षेत्र को अपना निवास स्थान बनाया था,जिनका सरदार दिवोदास आर्य था जो मदिरा बनानें की कला में माहिर था,जिसे सोमरस के नाम से जाना जाता था,इसी वजह से उसका लोग सम्मान करते थे,कुल मिलाकर हर दृष्टि से अभी तक सिद्ध हुआ है कि आर्य विदेशी मूल के हैं जो यहां आक्रमणकारी बनकर आये थे,लेकिन आज भारत में मौजूदा आर्य यह प्रमाणित करनें की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं कि वे विदेशी नहीं यहीं के रहनें वाले है,ये आर्य खुद को देशी सिद्ध कर पाएं इससे पहले भारत के मूल निवाशियों को अपना मूल इतिहास जरूर जान लेना चाहिए क्योंकि संघी इतिहासकार पूरी तरह भारत के मूल इतिहास को मिटानें पर आमादा है-
आजादी का आंदोलन क्या वास्तव में स्वतंत्रता का
आंदोलन था- पृष्ठ-36,38,41,42-
——मिशन अम्बेडकर.
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