आज नुक्कड़ नाटक दिवस है, नुक्कड़ नाटक निर्देशक और नाटककार सफ़दर हाशमी की 71 वीं जयंती। 1954 में आज ही के दिन जन्मे सफ़दर हाशमी को नुक्कड़ नाटक के मंचन के दौरान शहीद कर दिया गया था। तब उनकी उम्र कुल 34 साल थी।
संक्षेप में क्या है नुक्कड़ नाटक? यह ऐसा थिएटर है जो दर्शकों के बजाय लोगों के पास जाता है। यानी जो प्रेक्षागृह का मोहताज नहीं होता। तात्कालिक होता है, बहुत सीधा होता है। इसमें अभिनेता और दर्शकों के बीच फ़ासला नहीं होता। यह रंगमंचीय तामझाम से मुक्त होता है। देश और समाज में उमड़ घुमड़ रहे विशिष्ट सवालों को संबोधित करता है। यही कारण है कि यह किसी भी ऐसे समाज के लिए प्रासंगिक है जो असमानता, अन्याय पर आधारित है, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, मजदूर वर्ग का उत्पीड़न, बेरोजगारी आदि शामिल है।
जन नाट्य मंच के संस्थापक सदस्य सफ़दर हाशमी की 1 जनवरी 1989 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जब वह तत्कालीन कांग्रेस सरकार की जन विरोधी नीतियों की बखिया उधेड़ते नुक्कड़ नाटक “हल्ला बोल” का साहिबाबाद के झंडापुर गांव में
प्रदर्शन कर रहे थे।
गाजियाबाद नगरपालिका चुनावों को लेकर गहमागहमी का दौर था। प्रदर्शन के दौरान मंडली पर राजनीतिक गुंडों ने हमला बोल दिया। बचने के लिए कलाकारों ने मज़दूर यूनियन के छोटे से दफ़्तर में शरण ली। लेकिन गुंडे उसका दरवाज़ा तोड़ कर घुसने पर आमादा थे। सफ़दर हाशमी ने अपने साथियों को पिछवाड़े की दीवार फांद कर निकल जाने का आदेश दिया। बाक़ी तो निकल गए लेकिन सफ़दर अकेले रह गए। फिर जो होना था, वही हुआ। गुंडे उन पर टूट पड़े और उन्हें लगभग बेदम कर दिया ……और अगले दिन उनकी मौत हो गई।
इस कड़ी में ज़ोर देकर कहने की ज़रूरत है कि मौक़ा पड़ा तो सफ़दर हाशमी ने जान देकर अपने नाम का मतलब समझाने का काम किया। *सफ़दर का मतलब होता है बलवान, युद्ध के मैदान में दुश्मन की सैन्य पंक्तियों को भेदनेवाला महारथी।*
उनकी मृत्यु के दो दिन बाद उनकी पत्नी मोलॉयश्री हाशमी जनम मंडली के साथ फिर से उसी स्थान पर गईं जहां सफ़दर हाशमी को शहीद किया गया था और उन्होंने अधूरे रह गए नाटक को पूरा किया। यह सफ़दर हाशमी को सच्ची श्रद्धांजलि थी।
उस प्रदर्शन का गवाह मैं भी था जिसे देखने के लिए मज़दूर बस्ती की उस गली में दर्शक खचाखच भर गए थे। इस क़दर कि एक घर का छज्जा भरबरा कर टूट गया था। कुछ देर के लिए भले ही रुकावट हुई लेकिन मंचन पूरा हुआ।
लेकिन सवाल बाक़ी रहा। आख़िर जनम के बाक़ी सदस्य अपने नेता को अकेले भिड़ने के लिए क्यों और कैसे छोड़ गए थे? इस सवाल का जवाब भी अंधेरे से मुक्त न हो सका कि सफ़दर हाशमी के नाम पर बने संगठन सहमत (सफ़दर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट) से उनकी जुझारू जीवनसाथी क्यों और कैसे अलग रह गईं, कि क्या सहमत से असहमत हो गईं? कि क्या जनम के बाक़ी साथी भी?
और हां, उस दुर्भाग्य भरे हादसे में अकेले सफ़दर हाशमी शहीद नहीं हुए थे। राम बहादुर नाम का नेपाली मज़दूर भी शहीद हुआ था। लेकिन सफ़दर की शहादत के शोर में उसका नाम बहुत पीछे छूट गया।
कहना होगा कि सफ़दर हाशमी उम्दा और मिलनसार आदमी थे, बड़प्पन से दूर जैसे बच्चों की कोई कविता। उनके चर्चित नाटकों में शामिल थे- औरत, मशीन, राजा का बाजा, हत्यारे और गांव से शहर तक जिनके ज़रिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली।
सफ़दर हाशमी की शहादत ने बहुतों को दुख और सदमे में डाल दिया था और तत्कालीन कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा भर दिया था। यह अस्वाभाविक नहीं था।
*लेकिन इसी कड़ी में मुखरता के साथ सीपीएम की कार्यशैली पर भी सवाल उठे जिसकी अगुवाई में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार थी। यह भी गौर तलब है कि सफ़दर हाशमी की पहचान उसी सीपीएम के सांस्कृतिक चेहरे की भी थी। और उसी सीपीएम पर अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ हिंसा और हत्या की साज़िश रचने के आरोपों की लंबी सूची भी रही। इस सूची में वाम मोर्चे के सहयोगी घटक दलों के लोग भी शामिल थे। और वाम मोर्चे से अलग रहे धुर क्रांतिकारी कम्युनिस्ट भी।*
ख़ैर, सफ़दर हाशमी की बहादुरी से ‘कहने भर को’ प्रेरित फ़िल्म आई थी *हल्ला बोल*। इसमें अजय देवगन, पंकज कपूर, विद्या बालन, करीना कपूर खान वगैरह ने अभिनय किया था।
आदियोग
इंसानी बिरादरी
लखनऊ





