नई दिल्ली (जेएनएन)। किसी भी महामारी को रोकने के लिए वैक्सीन बनाना आसान काम नहीं है। यह लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया है। कोरोना महामारी के प्रकोप को देखते हुए दुनिया के कई देश वैक्सीन बनाने में जुटे हैं। आमतौर पर किसी वैक्सीन पर ट्रायल लंबे समय तक चलता है और इसके विकसित होने में वर्षों लग सकते हैं। पूर्व में कई महामारियों के दौरान ऐसे उदाहरण हैं, जब वैक्सीन बनने में सालों का वक्त लगा। हालांकि कोरोना महामारी में बहुत जल्द वैक्सीन के विकसित होने की उम्मीद की जा रही है। स्टेटिस्टा के अनुसार, दुनिया में प्रमुख रूप से 150 से अधिक वैक्सीन पर काम चल रहा है। इनमें से अधिकतर वैक्सीन अभी प्री-क्लीनिकल ट्रायल तक ही पहुंची है। बहुत कम वैक्सीन ऐसी हैं, जो दूसरे या तीसरे चरण में हैं। आइए जानते हैं कि कोरोना वैक्सीन की दिशा में दुनिया कितना करीब पहुंची है।
कई ट्रायल प्री-क्लीनिकल चरण में हैं। जहां प्रतिरक्षा प्रणाली पर होने वाले प्रभाव को जांचने के लिए वैक्सीन की खुराक पशुओं को दी जाती है। 19 वैक्सीन ट्रायल के पहले चरण में हैं। इसमें लोगों के छोटे समूह को वैक्सीन की खुराक दी जाती है और पता लगाया जाता है कि यह सुरक्षित है या नहीं। 11 वैक्सीन दूसरे चरण में हैं, जिसमें सैंकड़ों लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखने के साथ खुराक के प्रभाव का मूल्यांकन किया जाता है। आखिर में तीसरा चरण होता है, जिससे तीन वैक्सीन गुजर रही हैं। इसमें हजारों लोगों को शामिल किया जाता है। इसमें आखिरी बार सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है और साइड इफेक्ट्स का भी पता लगाया जाता है। ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के ट्रायल में 70 फीसद लोगों ने सिरदर्द या बुखार की शिकायत की। वैज्ञानिक कहते है कि पेरासिटामोल से यह ठीक हो सकता है।