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लखनऊ की चर्चा में मनाया गया पाम संडे

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लखनऊ के चर्चों में पाम संडे के अवसर पर लोगों ने हरे कपड़े पहनकर प्रार्थना की, जो जीवन और आशा का प्रतीक है। शांति, काम, और त्याग की प्रार्थना इस दिन के आध्यात्मिक संदेश को दर्शाती है, जो यीशु के बलिदान और विनम्रता से प्रेरित है।
आएये जाने पाम संडे ईसाई मानता संडे क्यों मनाया जाता है?
पाम संडे,

जिसे खजूर रविवार भी कहा जाता है, ईसाई धर्म में प्रभु यीशु मसीह के यरुशलम में विजयी प्रवेश की याद में मनाया जाता है। बाइबल के अनुसार, जब यीशु गधे पर सवार होकर यरुशलम पहुंचे, तो लोगों ने उनके स्वागत में खजूर की डालियां लहराईं और “होसन्ना” (प्रशंसा और प्रार्थना का नारा) पुकारा। यह घटना यीशु के क्रूस पर बलिदान से पहले की है और पवित्र सप्ताह की शुरुआत का प्रतीक है, जो ईस्टर तक चलता है। यह दिन यीशु को मसीहा के रूप में मान्यता और उनके बलिदान की यात्रा की शुरुआत को दर्शाता है।
इसकी प्रथा कब से शुरू हुई?
पाम संडे की प्रथा ईसाई धर्म की शुरुआती शताब्दियों से चली आ रही है। सबसे पहले इसका उल्लेख चौथी शताब्दी में यरुशलम में मिलता है, जहां यीशु के यरुशलम प्रवेश का विस्तृत पुन:अभिनय किया गया था। नौवीं शताब्दी तक यह पश्चिमी ईसाई धर्म में व्यापक रूप से मनाया जाने लगा। यह प्रथा पुराने नियम की भविष्यवाणी (जकर्याह 9:9) से भी जुड़ी है, जिसमें एक राजा के विनम्रतापूर्वक गधे पर यरुशलम में प्रवेश की बात कही गई है।
इसका धार्मिक उपदेश क्या है?
पाम संडे का धार्मिक उपदेश विनम्रता, बलिदान, और मोचन पर केंद्रित है। यीशु का गधे पर सवार होकर यरुशलम में प्रवेश करना यह दर्शाता है कि वे एक विजयी राजा नहीं, बल्कि विनम्र सेवक के रूप में आए। यह घटना ईश्वर की दृष्टि में सभी की समानता और आत्मिक उद्धार के महत्व को रेखांकित करती है। यह दिन ईसाइयों को प्रभु के प्रति समर्पण, शांति, करुणा, और सेवा के जीवन को अपनाने की प्रेरणा देता है। यीशु का यह कृत्य दर्शाता है कि सच्ची भक्ति परंपराओं में नहीं, बल्कि प्रेम और बलिदान में निहित है।
ईसाई समुदाय का कौन सा वर्ग/जाति इसे मानता है?
पाम संडे को ईसाई धर्म के सभी प्रमुख संप्रदाय मनाते हैं, जिनमें कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, और रूढ़िवादी (ऑर्थोडॉक्स) शामिल हैं। यह त्योहार किसी विशिष्ट जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व भर के ईसाई समुदाय द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। भारत में, विशेष रूप से दक्षिण भारत में, इसे “पैसन संडे” के नाम से भी जाना जाता है, और सभी ईसाई समुदाय इसे उत्साहपूर्वक मनाते हैं।

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