जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की खूबसूरत वादियों में 22 अप्रैल 2025 को आतंकवाद ने एक बार फिर अपना घिनौना चेहरा दिखाया।
इस कायरतापूर्ण हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई, जिनमें से हर एक इस देश की अनमोल धरोहर था।
ये लोग कश्मीर की हसीन फिजाओं में सुकून के पल बिताने आए थे,
लेकिन आतंकियों की गोलियों ने उनकी साँसें छीन लीं।
इस दुखद घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है,
और 140 करोड़ भारतीय आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए एकजुट होकर सरकार से सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।
माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के हर निर्णय को देश की जनता सर-आँखों पर लेने को तैयार है।
लेकिन इस भीषण त्रासदी के बीच एक ऐसी कहानी उभरकर सामने आई है,
जो हर भारतीय के दिल को छू रही है।
यह कहानी है सैयद हुसैन शाह की,
एक साधारण घोड़ा गाड़ी चलाने वाले की,
जो अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी कमाने के लिए पहलगाम की बाइसारन घाटी में काम करता था।
वह न तो कोई सैनिक था, न ही कोई प्रशिक्षित योद्धा,
लेकिन जब आतंकियों ने निर्दोष पर्यटकों पर गोलियाँ बरसानी शुरू कीं,
तो सैयद हुसैन शाह के भीतर का इंसान और देशभक्त जाग उठा।
उसने अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकियों से उनकी राइफल छीनने की कोशिश की,
ताकि वह अपने मेहमानों—उन पर्यटकों को बचा सके,
जिन्हें वह अपने भाइयों की तरह मानता था।
लेकिन क्रूर आतंकियों ने उसकी इस बहादुरी को बर्दाश्त नहीं किया और उसे गोलियों से भून दिया।
सैयद हुसैन शाह की माँ का वह वीडियो, जो सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर वायरल हो रहा है,
हर देखने वाले की आँखों में आँसू ला देता है।
एक बूढ़ी माँ, जिसके लिए उसका बेटा न सिर्फ़ सहारा था,
बल्कि परिवार का इकलौता कमाने वाला था,
आज अपने लाल को खोकर बेसहारा हो चुकी है।
उसकी चीखें, उसका दर्द, और उसकी आँखों से बहते आँसू पूछ रहे हैं—अब उसका बुढ़ापा कौन संभालेगा?
कौन उसे दो वक्त की रोटी देगा? वह कहती है,
“वह मेरा इकलौता सहारा था… ऐ अल्लाह, तूने यह क्या किया?”
यह दृश्य इतना मार्मिक है कि पत्थर दिल भी पिघल जाए।
सैयद हुसैन शाह की शहादत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं,
बल्कि यह उस कश्मीरियत की मिसाल है
, जिसे आतंकवाद दबाने की कोशिश करता है।
वह एक सच्चा भारतीय था, जिसने धर्म और जाति से ऊपर उठकर इंसानियत को चुना। लेकिन अफ़सोस, आज जब सारे नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं, आतंकवाद के ख़िलाफ़ बयान दे रहे हैं,
और जुम्मे की नमाज़ में आतंक की निंदा हो रही है,
तब उस बूढ़ी माँ के आँसुओं को पोंछने के लिए कोई आगे नहीं आया।
शायद सैयद हुसैन शाह का नाम या उसकी सादगी इस दुनिया की सियासत में उतना वज़न नहीं रखता।
लेकिन क्या हमारा देश,
जो वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है,
उस माँ को अकेला छोड़ सकता है?
मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से, जिन्होंने “सबका साथ, सबका विकास” का नारा दिया है, करबद्ध निवेदन करता हूँ कि सैयद हुसैन शाह की इस अनुपम बहादुरी को देश का सर्वोच्च वीरता सम्मान अशोक चक्र से नवाज़ा जाए।
यह सम्मान न सिर्फ़ उनके बलिदान को अमर करेगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि भारत अपने हर सपूत को,
चाहे वह किसी भी धर्म या वर्ग से हो,
बराबर सम्मान देता है।
साथ ही, उनकी बूढ़ी माँ, जो अब बेसहारा है,
को एक सरकारी पेंशन प्रदान की जाए,
ताकि वह अपनी बाकी ज़िंदगी सम्मान और सुकून के साथ जी सके।
यह न सिर्फ़ सैयद हुसैन शाह की आत्मा को शांति देगा, बल्कि उनकी माँ के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आइए, हम सब मिलकर इस माँ के दर्द को साझा करें। सैयद हुसैन शाह की शहादत को नमन करते हुए




