तेहरान: ईरान ने अपनी सैन्य ताकत का एक बार फिर प्रदर्शन करते हुए अपनी अत्याधुनिक भूमिगत मिसाइल सिटी का वीडियो जारी किया है, जिसने अमेरिका और इजरायल समेत पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ा दी है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा जारी इस वीडियो में हजारों सटीक मिसाइलों और ड्रोनों के भंडार को दिखाया गया है, जिनमें खेबर शेकन, ग़दर-एच, सेजिल, और पावेह जैसी क्रूज मिसाइलें शामिल हैं। ईरान का यह कदम अमेरिका के साथ परमाणु समझौते की चल रही बातचीत और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच आया है, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं।
ईरान की रणनीति और अमेरिका की चेतावनी:
ईरान ने यह वीडियो ऐसे समय में जारी किया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को परमाणु समझौते के लिए दो महीने की मोहलत दी है। ट्रम्प ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान नया समझौता नहीं करता, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। जवाब में, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने सैन्य क्षमताओं को और मजबूत करने का आदेश दिया है, इसे “ईरान की दीवार” करार देते हुए। खामेनेई ने कहा कि उनकी सेना किसी भी हमले के खिलाफ देश की रक्षा के लिए तैयार है।
मिसाइल सिटी: ताकत का प्रतीक या कमजोरी का संकेत?
IRGC ने इस मिसाइल सिटी को “क्षेत्रीय शक्ति का प्रतीक” बताया है, जिसमें सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन तैनात हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सुविधा ईरान की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों की क्षमता को दर्शाती है, जो इजरायल और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों तक पहुंच सकती हैं। हालांकि, कुछ विश्लेषकों ने वीडियो में दिखाई गई खुली सुरंगों और गोला-बारूद के भंडारण की कमजोरियों की ओर इशारा किया है, जो हमले की स्थिति में बड़े विस्फोटों का कारण बन सकती हैं।
अमेरिका की सैन्य तैयारियां:
ईरान की इस हरकत के जवाब में अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। यूएसएस कारल विंसन और यूएसएस हैरी एस ट्रूमैन जैसे युद्धपोतों को तैनात किया गया है, साथ ही बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर्स को डिएगो गार्सिया भेजा गया है, जो गहरी सुरंगों को नष्ट करने में सक्षम हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर हमले तेज कर दिए हैं, जिन्हें ट्रम्प प्रशासन ईरान का प्रॉक्सी मानता है।
इजरायल पर हमले और क्षेत्रीय तनाव:
ईरान ने हाल के महीनों में इजरायल पर दो बड़े हमले किए हैं। अप्रैल 2024 में ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 1 और अक्टूबर 2024 में ऑपरेशन प्रॉमिस 2 के तहत सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे गए। हालांकि, इजरायल के आयरन डोम सिस्टम ने इन हमलों को काफी हद तक नाकाम कर दिया। इसके जवाब में इजरायल ने अक्टूबर 2024 में ईरान के मिसाइल प्रोडक्शन बेस और सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिससे ईरान को भारी नुकसान हुआ।
परमाणु वार्ता पर संकट:
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर तनाव चरम पर है। ट्रम्प ने 2018 में ओबामा-युग के परमाणु समझौते से हटने का फैसला किया था, जिसके बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज कर दिया। हाल के महीनों में, ईरान के वरिष्ठ कमांडरों ने खामेनेई से 2003 के उस फतवे को वापस लेने का आग्रह किया है, जिसमें परमाणु हथियारों को इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ बताया गया था। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का कहना है कि ईरान अभी सक्रिय रूप से परमाणु हथियार नहीं बना रहा, लेकिन इसकी चर्चा तेज हो गई है।
विश्व समुदाय की प्रतिक्रिया:
ईरान के इस कदम ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। फ्रांस ने क्षेत्र में और तनाव न बढ़ाने की चेतावनी दी है, जबकि संयुक्त राष्ट्र में ईरान ने इजरायल के हमलों को “गैरकानूनी” करार दिया है। रूस और चीन ने ईरान के साथ अपने सैन्य और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने का संकेत दिया है, जिससे पश्चिमी देशों की चिंता और बढ़ गई है।
क्या है आगे का रास्ता?
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की यह आक्रामक रणनीति उसकी घरेलू और क्षेत्रीय कमजोरियों को छिपाने की कोशिश हो सकती है। सीरिया में बशर अल-असद के शासन का पतन और लेबनान में हिजबुल्लाह की कमजोर स्थिति ने ईरान की क्षेत्रीय पकड़ को कमजोर किया है। दूसरी ओर, अमेरिका और इजरायल की सैन्य तैयारियां तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं को हवा दे रही हैं।
निष्कर्ष:
ईरान की मिसाइल ताकत और अमेरिका की सैन्य तैयारियों ने मिडिल ईस्ट को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
परमाणु वार्ता का भविष्य अनिश्चित है, और दोनों पक्षों की आक्रामक बयानबाजी ने तनाव को और बढ़ा दिया है। आने वाले हफ्ते इस क्षेत्र की दिशा तय करेंगे, जहां एक छोटी सी चिंगारी भी बड़े संघर्ष को जन्म दे सकती है।
संपादकीय टिप्पणी:
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव वैश्विक शांति के लिए खतरा है। भारत जैसे देशों को इस स्थिति में तटस्थ रहते हुए कूटनीतिक समाधान की वकालत करनी चाहिए, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और ऊर्जा आपूर्ति पर असर न पड़े।
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